साखी-56
देव तणी परमोध में, कसवै समो न कोय
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
देव तणी परमोध में, कसवै समो न कोय
सैंसो तो सारां सिरे, अरू स्वर्गा में होय ।
हाथ जोड़ सैंसो कहै, मांगे सीख जमात
घर आये को दीजिये, सुण सैंसा यो बात ।
एक बात मो सों कह्यो, एक बात सौ बार
मेरे घर को जगत गुरु, जाणै जब संसार ।
आंजस कर सैंसै कही, देव न आई दाय
सतगुरु आप पधारिया, पत्री (पतरी) लिवी उठाय ।
आवाज करी हरि आवंता, हाजर हो सोई लाव
सतगुरु ऊभा बारणै, परखण आया भाव ।
नारी सारी आंगणै, कीया बैठी ठाट
भिक्षा न घालै भाव सूं, ऊभा जोवै बाट ।
लहणायत ज्यूं क्यों खड़यो, समझायो सौ बार
कह्यो न मानै सामियो, है तो किसो विचार (बड़ो गिंवार)।
जर झाली ठमको दियो, नारी कीयो जोर
भनाय चला घर आपणै, पत्री (पतरी) केरी कोर ।
प्रभाते सैंसो आवियो, देव तणे देवाण
सुण सैंसा सतगुरु कहै, यो सैनाण पिछांण ।
ओ पटंतरा सांभलो, सैंसा गयो निधाय(सरमाय)
मूंधो मुंह सैंसो पड़यो, सांभल सकै न कोय ।