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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह231 / 157
प्रचलित साखी समूह तीन

साखी-56

देव तणी परमोध में, कसवै समो न कोय

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

देव तणी परमोध में, कसवै समो न कोय

सैंसो तो सारां सिरे, अरू स्वर्गा में होय ।

हाथ जोड़ सैंसो कहै, मांगे सीख जमात

घर आये को दीजिये, सुण सैंसा यो बात ।

एक बात मो सों कह्यो, एक बात सौ बार

मेरे घर को जगत गुरु, जाणै जब संसार ।

आंजस कर सैंसै कही, देव न आई दाय

सतगुरु आप पधारिया, पत्री (पतरी) लिवी उठाय ।

आवाज करी हरि आवंता, हाजर हो सोई लाव

सतगुरु ऊभा बारणै, परखण आया भाव ।

नारी सारी आंगणै, कीया बैठी ठाट

भिक्षा न घालै भाव सूं, ऊभा जोवै बाट ।

लहणायत ज्यूं क्यों खड़यो, समझायो सौ बार

कह्यो न मानै सामियो, है तो किसो विचार (बड़ो गिंवार)।

जर झाली ठमको दियो, नारी कीयो जोर

भनाय चला घर आपणै, पत्री (पतरी) केरी कोर ।

प्रभाते सैंसो आवियो, देव तणे देवाण

सुण सैंसा सतगुरु कहै, यो सैनाण पिछांण ।

ओ पटंतरा सांभलो, सैंसा गयो निधाय(सरमाय)

मूंधो मुंह सैंसो पड़यो, सांभल सकै न कोय ।