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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह232 / 157
प्रचलित साखी समूह तीन

साखी-57 राग भंवरो

जां थलियां देवजी भंवरो अवतरचो, जां थलियां छै गाढो नूर

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

जां थलियां देवजी भंवरो अवतरचो, जां थलियां छै गाढो नूर

भगतां रै मन चांदणो, दिल में ऊगो सूर ।टेर। ।

अलीयल टोली भंवरो रम रह्यो, रह्यो दिसावर छाय

बाग बिहूणो भंवरो क्यों है, फूल रह्या कुम्हलाय।

आवो रे भंवरा घर चिणां, आयो रे सावणियै रो मास

भीजण लागी भंवरा पांखड़ी छीजण लागो मांस ।

घण गरजै दावण खिंवै, चात्रग मने उदास

सर छलिया सरिता बहे,रटत पियास पियास।

तोडूं तोडूं भंवरा पींजरो, भांज करूं चकचूर

मोमण सुरगे नावड़घ्यो, तूं कांय रहियो झूर ( मजूर ) ।

हीरा विणजो साधो मोमणा, बोहड़ि न चढस्यां हाथ

म्हे जपस्यां निस्तारसी, रमस्यां झुलरियै रे साथ ।

भंवरा एक सनेसड़ो, मोमणा ने कहियो जाय

पींजरि नांहीं प्राणियो, थाहि दिस लहिया जाय

मेलो गुरु प्रहलाद सूं, मेलो हरिचंद राय

मेलो पांचो पाडवां, धन्य कुन्तादे माय ।

सुरगे सोरंभ अति घणी, मोरि रही वणराय

चंपो मरवो केवड़ो भंवर रह्या रंग लाय ।

जां बूठो तहां ( तां ) बावियो , जांरा सुपह सुवाया खेत

ते जन भंवरा निपजे, जांरा जंभ गुरु सूं हेत ।

करि सुकरत सुरगे गया, ते जन पोंहता पार

वीनतड़ी 'रामो' कहै, म्हारी आवागवण निवार ।