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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह233 / 157
प्रचलित साखी समूह तीन

साखी-58

मेलो कर मोटा धणी, गिण तेतीसां ज्ञान

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

मेलो कर मोटा धणी, गिण तेतीसां ज्ञान

दर्शन दीजो देवजी, विष्णु विछोहा भान ।

पन्दरासौ अरु तिराणवें, बदि मंगशिर वमेख

तिथि नौमी निरखी निर्मली, ओल्हे हुवा अलेख ।

लालासर की साथरी, पौंहचि कियो प्रवाण

इलमां अंधियारो हुवो, जाणे भोम वरत्यो भाण ।

जल बिन मरे ज्यूं माछला, सारस मरै सनेह

हरि पाखो हरि जन मरै, दूनी तियागे देह ।

झूरे पपइयो बूंद बिन, बालक पखोजे माय

तो बिन जग जीवां धणी, भक्तां ऐसी विहाय ।

कृष्ण चरित्र कलियुग हुवो, सुणियो चौचक सार

पूरब पच्छिम कालपी, गिणियों गंगा पार ।

सिरजणहारो साध को, सदा संवारे काम

तके जन आया तालवै, मेलो थरप्यो मुकाम ।

पहिले मुंहि तांतू खड़ी, उरे उतारी आथ

एक संहस अरू चारसौ, खड़या सवेरि साथ ।

गोविंद भक्त गुणावती, अन्तर हुवो उडाण

एक सहंस अरु आठसौ, सीधा सन्त सुजाण ।

अपरंपर बिण आदमी, उरे सही री आंच

छव सौ भींयासर खड़या, सू जोवे सौ पांच ।

साधु स्वर्गे नावड़्या, सही बिस्वा बीस

टोहे संग स्वर्गे गया, सौ ऊपर चालीस ।

जग जीवत मृतक हुवा, निंव चाल्या होय खाक

धारु संग स्वर्गे गया, सांभलिया सौ लाख ।

झीमां जप जीवांधणी, अन्तर पूगी आस

जीव अताले उधरी, प्रगट लाख पचास ।

स्वर्ग गया सांसो मिटयो, खालक मेटी खोड़

अतली संग स्वर्गे गया, करता केई किरोड़ ।

चाखू चोकस सांभल्या, दूदे समप्र्यो शीश

राणो संग स्वर्गे गया, सो जाणे जगदीश ।

हाथू अरु नाथू निरखि, कसवां किसन सहाय

चलाण कियो चलित, पहुंता स्वर्ग पुलाय ।

हरि बिन हरिजन ना रहे, उर इधकी अणराय

विष्णु भक्त किरतो भलो, खड़यो घणां खड़ाय ।

करमांणी जाणीं कहै, करां न कुल की काण

बाड़ाणी भीषर खड़या, चढ़िया स्वर्ग विवांण ।

गोदारे गुरु ओलख्यो, समधा सन्त सुजाण

सोनी किसन भादू सही, सायर अर सुरताण ।

जग्गो जमाते प्रगटयो, झोरड़ साध बखाण

लक्ष्मण अरु पांडु परखि, खड़या खरींगे जाण।

गंग पारी गंगा खड़या, सिंवरो सिरजणहार

कुलचंद संग स्वर्गे गया, दाख्या दोढ़ हजार ।

कहिये कनबज कालपी, करता सारे काज

साधु खड़या सब सातसौ, महामुखी महाराज ।

बाल वृद्ध तरणी तरुण, काया तजे केतान

कुण जाणे कितना खड़या, गोविंद करसी ज्ञान ।

करि काठी वूही कंवल, तका हुई तरवार

घर का घर ही में खड़या, वण का वणी मंझार ।

तहां बींछड़ वांसै रहा, अन्तर अधिक उदास

परमेश्वर पूरी करो, अन्तर्यामी आस ।

है-है-कारो बरतियो, इलाफिरी जुग आण

कांप्या सुर नर देवता, हिन्दु मुसलमाण ।

श्वेत पुवंग पूरो पुरुष, दीठो समझ सवेर

दिन तीजो केशो कहै, रह्या फिरी जुग रेर ।