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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह234 / 157
प्रचलित साखी समूह तीन

साखी-59

पतवो लिखदे जी हो ब्राह्मणां, कह ऊधो समझाय

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

पतवो लिखदे जी हो ब्राह्मणां, कह ऊधो समझाय

तुम बिन दूभर जीयो द्योसड़ो( देशड़ो), हरि बिन रह्यो न जाय ।

कह जन ऊधो गोविन्द कब मिलै, वृन्दावन रो राव

रंग रो वीनइयो नंदलाल जांणोजी, श्रीरंग मिलाव ।

ऊधो माधोजी सूं यों कह, ऐसी कछू हमें न सुहाय

वीठला बहु दिन जीहो लाविया, रह्यो द्वाराका छाय ।

मोहनी मूरति जीहो माधवा, चतुर्भुज बसियो म्हारे चीत

देखो भाई नागर नंद रो कान्हवो, सगुण श्यामजी सूं प्रीत ।

सो संभर सो मथुरा द्वाराका, सब रंग जंभ अचंभ

कामणगारो है कान्हवो, पियो म्हारो पारब्रह्म ।

देखो भाई नागर नंद रो कान्हवो, चंचल चतुर सुजान

मेरोमन लागो हरिजी श्याम सूं,जाको हर मुरली सूं धयान ।

हरजी रा मीठा मीठा बोलणा, ओ म्हारे जीवड़े रो मूल

तन मन भक्तां सेती रम रह्यो, भेद न जाणै मूरखो थूल ।

गोकुल केरो जीहो ग्वालियो, ओ छै म्हारै जीवड़ रो आधार

सोला सहस्त्र गोपियां में, रह्यो छै बालमियों ब्रह्मचार ।

मेलो कीजै मन रा माधावा, तेरा जन कोड कराय

वां मिलियां हम जीवैं, बिन मिलियां मर जांय ।

बाल स्नेही म्हारो सायबो, अति ही पियारो पीव

हरि मुख देखण के कारणै, तलफत म्हारो जीव ।

देखो भाई नागर नंद रो कान्हवो, पियो मेरो परम दयाल

'आलम' प्रभुजी रो लाडलो, गिरधारलाल गवाल ।