साखी-60
देव दया कर दाखवै, पापां करण प्रछेद
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सवैया
विश्रोइयां धर्म जोये, रूंख पर भजै काया
विश्रोइयां धर्म जोय, मृग क्यूं मोर भाया
विश्रोइयां धर्म जोय, सब दुनिया सूं न्यारा
विश्रोइयां धर्म जोये, सिनान पणि करे सवेरा
विसत भजत छाडै नहीं सावधान अति होय
जन हरजी संसार में, विश्रोइयां धर्म जोय
देव दया कर दाखवै, पापां करण प्रछेद
जन बाड़ेता वीछड़या, तहां बतावे भेद।
बागड़ कनवज कालपी, सांभलि सारे रीति
राखै सिदक तलाव सूं, घटै नहीं प्रतीति।
शहर बसै जो कालपी, खेमा नाम कहाय
देव दीवावै सीखवै, तीर्थ परसण जाय।
खेमां तो कामण कीयो, जग मां दीठो जोय
जो परसां सो जीवणो, अन्ति मरेवो होय।
डेरापुर कामण बसै, अन्तर अधिक की आस
सुण कर धर्म तलाब को, परसण साथ पियास
घर मंदिर माता पिता, भूवा भतीजा बीर
तज तीर्थ ने नीसरी, सकल चुकायो सीर।
मतो कर भक्तजन चाल्या, पैंडे चल्या पुलाय
कुणं जाणे कितनां दिनां, पहूंता जांभोलाव।
भाव भक्ति जप तप कियो, दया धर्म आचार
शील सन्तोष क्रिया सरस, पावै मोक्ष द्वार।
खड़ग लिया माता पिता, घी मींठड़ियां सुत फूल
पहिंलि मूंही फुलवो खड़यो, कीयो वचन कबूल
दूजल मिठियां खड़ी, मांडयो कंघ करार
राऊ खड़ग समाहियो, तन बूही तरवार।
तीजल कै रूपो कहे, विधि सूं वचन विचार
मांग हुक्म जाणी खड़यो, जाणे जन्म सुधार।
चोथल के खड़गो खड़ी, तन मन कीयो त्याग
बड तीरथ मरणो हुवो, धन्य तिहारो भाग।
पांचवे पेमा पाछे पड़ी, अर्थ लगाई आथ
स्वर्ग भवन कामण गई, सुत पति को ले साथ।
छठवीं भगीयां खड़ी, मने चुकायो माण
स्वर्ग भवन कामण गई, नित नवेला हांण।
सातवें सिंवरे श्याम नै, करता जी करधार
विष्णु भक्त खेमो खेड़यो, चाल्यो जनम सुधार।
आठवें अटकल भावती, शिर निवायो तन साज
जाणी भक्त जाणे विष्णु संग, मिलियो सीधो काज।
नवमीं खड़यो रिड़मलो, खरतर खंडाधार
सिर साटै स्वर्गे गया, भुगतै सुख अपार।
दसवें सिंवरे श्याम ने, नारायण निरंकार
तन त्याग्यो स्वर्गे गयो, तन बूही तरवार।
ग्यारवें गुरु सिंवर सुखी, सिर न्यायो धर धीर
कायो कंवल जुंवलो हुवो, कियो स्वर्ग सूं सीर।
बारबें बावल आपणैं, प्रेमो सिंवरै पीव
कंवल बदन कुटका कियो, चढयो विवाणे जीव।
तेहरवें दुर्गा देव सूं, नवण करै अरदास
सास सरयो बीछडयो, कियो अमरापुर वास।
चौदवें मिले जमात सूं, शीश निवायो आय
विष्णु भक्त बहुता खड़या, झूलर पहुंता जाय।
पार गिराये वे गया, बीच बैंकुठे वास
इकबीसां कोड़यां मिल्या, अन्तर पूगी आस।
रिलमिलै तन झिलमिलै, कोकत केल किलोल
तन दीपै जाणै कणी, काया स्वर्ग संचोल।
कंबरा कला गुरु चौगुणी, मन सुद महल मलूक
मनसा भोजन मन रलि, अंचवे अमी अचूक।
स्वर्गे सुख अनन्त है, कहतां लहूं न पार
दिन दिन रलि बधावणां, नित नव मंगलाचार।
सतरा सौ दसोत्तरे, तिथि ग्यारस बदी जेठ
बड तीरथ मरणो हुवो, पूगी आइस ठेठ।
कलि काले काया तजी, जिहिं का यह आचार
सिर दीन्हो केशो कह, स्वर्ग गया शुचियार।