साखी-61
बूचो बारां क्रोड़ि में, कियो बैकुंठे वास
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सवैया
एक सहैं दुख भूख एक उपगार पयपै।
एक चडै सुखपाल एक सिर यार संमपै।
एक सकाया सुचग एक देष्या दुरगछी
एक छुडावे बदि एक बेचै जल म%छी।
एक मरै एक उधरै ठाह बतावे ठांव का।
एक गुरु दोय आंतरा, परताप जको हरि नांव का।।
बूचो बारां क्रोड़ि में, कियो बैकुंठे वास
इलमांही इणि एचरे, जुग लियो जस वास।
मेड़ताटी का मानवी, परगट पोलावास
जिण नगरी बिश्नोई बसै, रूंखां तणी निवास।
सरवर नीर सुहावणा, तरु रहिया धर छाय
बन बिगताले राखियो, मंझ मेड़ताटी मांय।
राखे बिश्नोई खेजड़ी, जे चाले गुरु राह
राव रखावे तो रहै, कां पाले पातशाह ।
जहां दीठा तहां कही, बनराबन उणिहार
ब्रह्म गऊ गुरु खेजड़ी, अै तुलसी ततसार।
रेण नै राजोद मां, दूदे तणी ओलाद
निगुरो गुरु माने नहीं, बिरछ बढावे कर वाद।
बाढ बिरछ होली कीवी, फिर फिर दीठा गोंढ
आई खबर जमात मां, खोज गया राजोद।
चीरी मेल्हे चौखलै, चौगांवां मिलिया आय
नरसो नृसिंघदास रो, संक न मानै काय।
करमचन्दनै कालो चड़यो, दुर्जन लियो सराप
मेड़तिया सूं मेड़तो, उतरियो इणि पाप ।
बुधहीणां ब्राह्मण बाणिया, पतबारो परधान
सिरै धन आवै सिर साटै, सिर साटै सम्मान।
सिर साटै लाभै स्वर्ग, जै सिर दीन्हो जाय
उत तागाबाला तुमकिया, बूचे बीड़ो लिगो उठाय।
न्यात जमातै परगटयो, दरगे अरु दरबार
सीख करे परवार सूं, मांडयो कंध करार।
कंध करारो मांडियो, रतना तेग संवार
तीन हुकम बूचै किया, तन बूही तरवार।
काया कंवल जुंवो हुयो, स्वर्ग गयो शुचियार
अखी अवचल अेचरो, साख रही संसार।
झीणां कंठां झबकती, पदमल करे पियार
हस्त नखत तीज दिन, होली मंगलवार।
सुक्रत कर स्वर्गे गयो, केशो कह विचार।