मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह237 / 157
प्रचलित साखी समूह चार

साखी-62

साइयां जुग दातार, पाणी सूं पिंड करणा।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

एक जीभ मुख्य नावड़ो अलप आव ईणि ठाय।

हरि गुण सायर ते धणों मौ मुखी क्यों रस माय।।

ज्यों पन्खी समन्द ते नीर चांच छलों ले।

सायर ऊंणो नथीयौं हरि गुण पारख एह।

ज्ञान खड़ग पायौ परहर जीता काम क्रोध अहंकार ।

वील्ह कहै हूं डरयू घणो में गुण साभल्यो सतगुरूतणों। ७ ।

साइयां जुग दातार, पाणी सूं पिंड करणा।

गरभ रह्यो दश मास, दूभर दिन छलणा।

साइयां बाहर काढ, दशवंत तो करणा।

जद पूगा दश मास, बालक अतवरणा।

लागो कलु को बाव, वै दिन विसरणा।

बाजै विड़द बधाव, कीजै कोड घणा।

रूड़ी राजकुंवारि, अधिका आभरणा।

अरथ गरथ धन माल, दीजै धर सरणा।

सोवण सेज सुखवास, पाटू पाथरणा।

चढि चालै चक डोल, घोड़ा ऊदगणा।

जब पूगी जम डांग, गाफिल थरहरणा।

परवाणा पति शाह, ऐदी जम करणा।

सूंक न मांडै हाथ, जालम देह धरणा।

अन पाणी सूं सोस, दांतण क्या करणा।

मात पिता सुत नारि, बांधव चार जणा।

कियो पिछोकड़ि वास, ले गया बीच वणा।

मेल्यो धरण उतारि, बांधव वीसरणा।

कोयल करै किलोल, बैठी अंब वणा।

बोलै मधुरा बैण, दुनियां नै दुःख घणा।

तलै उतारयो जाय, धरती तो सरणा।

आप जो मरणा होय, औरानै क्या झुरणा।

सत बोले शिवदास, भक्ति हरि उर धरणा।