मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह238 / 157
प्रचलित साखी समूह चार

साखी-63

सिंवरो उत्तम रो राव, सांई राजा मन जपिये।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सिंवरो उत्तम रो राव, सांई राजा मन जपिये।

देकर दिल को साच, जुमलै रलिमिलिये।

जित पीकर अमी कचोल, खेवट ज्यूं दुलियो।

चरियो चरणै जोग, अवचर परहरियो ।

अवचर बाढ़ेला रोग, आफरि ना मरियो।

ज्यों ज्यों कहे म्हारो श्याम, आगे पग धरियो।

देख हरीड़ा बाग, चोरी बंदा ना करियो।

चोरी है आणराय, जीवड़ा भल डरियो।

ठाढो बेलू को रेत, झबकूला पवण घणा।

चित बरसो आजो की रात, कालो का दिवस तणा।

बरषत आंखिन खोलि, नीपजेला जीव सरया।

डूंगर तरला वास, दीसे तरु जै हरया।

जित वै दीसै चतुर सुजाण, आवो बंदा जाय घरां।

सागर लाहरां लेह, ऊंडो देखि डरग्या।

संबल थो जां पास, सोई मोमण पार लंघ्या।

सबल बिहूंणा वीर, झूरवै तीर खड़्या।

झुरवै दिवस अरु राति, घायल ज्यूं कर रह्या।

अगर चंदन की नाव, बेड़ो म्हारो श्याम सज्यो।

बोले समसदीन खेवट पार लंघ्यो।