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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह239 / 157
प्रचलित साखी समूह चार

साखी-64

तोड़ कालिंगड़े रो सीस, विष्णु आवेलो।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

विसन धै तूठो पार, विसन वैकुण्ठ वसावै

विसन को जपतां नांव निगुणनर हासो आवै

रहस्या जागर जांहि जित को भूत खिलावै

रहंसि विणासै जीव, लोभ करि हत्या कंमावै

दयैह अनेक दान गल काटै सुकरता गुवै

विसंन भगत ऊ दो कहै, अनंत जुनि भूला भुवै

तोड़ कालिंगड़े रो सीस, विष्णु आवेलो।

उत्पति धुंधुकार, पवन चलावेलो।

दिल्ली और मुलतान, तखत रचावेलो।

धरण तांबे की होय, ठणकी बजावेलो।

सहसें किरणे सूर, फेरि तपावेलो।

शरणै रहसी साध, असुरां दझावेलो।

मेघाडंबर छात, छांह करावेलो।

दुलदुल होय असवार, तमक नचावेलो।

खड़क तिधारो हाथ, विष्णु संमावेलो।

दल पंचाधा जोड़ि, निकलंक आवेलो।

जादम छपन करोड़ि, हलधर आवेलो। ,

कोड़ लियां संग पांच, प्रहलाद पधारेलो।

साते हरिचंद राव, रोहितास आवेलो।

पांच पांडु साथ, अहमंन आवेलो।

होय वृषभ सवार, महादेव आवेलो।

परम हंस चढ पंथ, ब्रह्मा आवेलो।

होय गरुड़ असवार, विष्णु पधारेलो।

सहस अठासी सिध, नेमनाथ आवेलो।

पदम अठारह साथ, अंगद आवेलो।

चोह जुग का सिध साध, गोरख आवेलो।

चोसठ जोगणी साथ, वीर बुलावेलो।

डगडग डेरू वाय, आण भिड़ावोलो।

सिर कालंग को तोड़ धरण डुलावेलो।

वसुधा कुंवारी को ब्याह, परणनै आवेलो।

मेंहदी साह सलेम हाथ रचावेलो।

एक लख असी हजार, महमद आवेलो।

अथर्वण वेद उचार, ब्याह बधावेलो।

अणव रइस जइद, संगति बुलावेलो।

कोड़ तेतीसों जोड़, प्रहलाद बधावेलो।

आरतो संवीरी हाथ, विष्णु करावेलो।

अनन्त कोड़ि वसांण विमान चलावेलो।

भवजल खेवणहार, नरसिंह आवैलो।

पोंहता पारगिराय बैकुंठ बसावैलो।

बोल्या लाखा साथ, आगम गावैलो।