मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह240 / 157
प्रचलित अप्रचलित अन्य साखी

साखी-65

संभराथल आयो श्याम, शुचियारां साचो धणी

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

संभराथल आयो श्याम, शुचियारां साचो धणी

एकलवाई आप, श्री जंभेश्वर जीवां धणी

जंभेश्वर जीवां धाणी नैं, आवियो हरि आप

भगवैं बानैं विष्णु आयो, जपो स्वयंभू जाप

वखत दोय अरू करो संधया, निवण करो लो नाम

शुचियारां साचो धणी, संभरथल आयो श्याम (१)

सार हुई संसार, जंभेश्वर जुग आवियो

पूरवले परताप विष्णु भक्तां पावियो

विष्णु भक्तां पावियो नैं, प्रीत परसां पाव

दुनी आय दीदार देखे, अन्तर अधिक उमाव

दिल मांही भ्रांति मेटी, साधां देसी पार

जंभेश्वर जुग आवियो, सुण्यो चौचक सार (२)

स्वर्गे बोलै दीन, महिमा अति मेले मिली

जमाती रा झूल, साखी शब्द सुर संभली

साखी शब्द सुर संभली नैं, परचीया मन पात

उत्तर पश्चिम पूर्व दक्षिण, आवे जुड़े जमात

भाव कर मन भेट धारहीं, चौंतरे कर चीन्ह

महिमा अति मेले मिली, स्वर्गे बोलै दीन (३)

संता हुवो सहाय, धन्य साधां परस्यो धणी

घृत गूगल महकार, ज्ञान गोष्ठि कीजे घणी

ज्ञान गोष्ठि कीजे घणी नैं, सदा शील सन्तोष

एक मन सूं एक सतगुरु, दीये साधां मोक्ष

दीन तो दीदार परसैं, परस लागैं पाय

नित्य साधां परस्यो धणी, सतगूरु करै सहाय (४)

अब लीजो अपणाय, इण टाणे सूं मत टालियो

क्षमा करो सुरराय, पत बानें की पालियो

पत बानें की पालियो नैं, क्षमा करो सुरराय

दावण पकड़यो आपको, निरहारी तोहि नाम

दास 'लक्ष्मण' आस थांरी, भूधर आयो भाव

जम जोखै सूं टालियो, सतगुरु करै सहाय (५)