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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-66

सिले पछिम रे देश, हिंवरतुरी पलाणसी

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

गुरू सा गहरा कवन, समुद्र जूं थाह न होई।

ऊंचो जाण आकाश, पार पावै नहीं कोई।।

मीठो शक्कर समान, अमृत सूं अधिकेरो।

चौड़ा चारों खूंट, भारी मेरू सुमेरो।।

जिण हरजी भाई म्हां, अधिक तौल नाप आयो नहीं।

श्री जन्भ अचंभ गुरूदेव को पार किणीं पायो नहीं।।

सिले पछिम रे देश, हिंवरतुरी पलाणसी

सतगुरु होयसी साथ, खड़ लसकर गढ आवसी

खड़ा लसकर कोटि दिल्ली, दाणों सूं जुध मांडसी

सुरां असुरां खबर करसी, नाज निरंतो बांटसी

खरच खालक देवे मुकति, दाणों के दल दीजसी

जोड़ कर जगदीश आयो, सिले पछिम रे कीजसी (१)

सहंसे किरणे सूर, सतगुरु फेर तपावसी

शरणे रहसी साधा, असुरां देव दझायसी

असुर दाझै हुवै धाणी, आंच लागै आकरी

कोपियो करतार मारे, देखि दूलम यों डरी

कालिंगे को काल करसी, आंके कलि के आयसी

धरणी हूं तां नव नेजां, सूरज फेर तपावसी (२)

दुल दुल चढिसी देव, जुधा करसी जीवां धणी

चीणम चीण कटक कोजां, फर हरसी घणी

फरहरे फोजां धरणी धूजै, आसमान ऊपर थरहरै

पवन सूं पर्वत डोलै, छत्र निकलंक सिर धरे

पांच सात नव कोटि बारां, जाय एकबीसां मिले

तिथारो तिण वार सजसी, देव चढसी दुल दुले (३)

मिलै तेतीसो क्रोड़, करै उमाहो पार को

नाचै अपसरा पात, मेलो गुरु दीदार को

मेलो तो गुरु दीदार को, सुंदरि एकमन होय खड़ी

साधां को सुख अनन्त देसी, रतन काया हीरां जड़ी

कामणी करतार मेलो, रूप रंभा अति भली

तां बीच बासो कह 'केशो', क्रोड़ तेतीसूं मिली (४)