कवि परिचय — अज्ञात कवि
हजूरी इस साखी में कवि ने विशेष रूप से अपने ही मित्रों को सचेत करते हुए कहा है कि गुरु जम्भेश्वरजी ने संसार सागर से पार उतारने के लिये धर्म रूपी नौका उपस्थित कर दी है। जिसे भी पार उतारना है वह अवश्य ही सवार हो जाये अन्यथा चौरासी लाख जीयां योनी में डूब जायेगा।
आखिर आखिर लेखो मोमण मांगिये, घर घर फिरै नकीबा । खेवट आयो जम्भराज नाव ले, चड़सी जां से नसीबा । चड़े जांसे नसीब रे जीव, महल दूतर तारियां । कवल महमद आय पूगा, उसताज वग्य हंकारिया । पांच बखत निवाज रोजा, कवल काजी रंजिया । इमान राखो सिदक चालो, आखिर लेखो मांगिया ।१।
हे मोमण ! आखिर तो यानि मृत्यु के पश्चात् इस जीवन के पाप पुण्य का लेखा जोखा मांगा ही जायेगा और जब लेख सामने उपस्थित हो जायेगा तो कर्मों की गठड़ी खुल करके सामने आयेगी तब उसमें पाप के अतिरिक्त कुछ भी सामने नहीं आयेगा। पाप के कारण बन्दर रीछ बनाकर नाक में नाथ नकेब डालकर घर-घर मदारी घुमायेगा। इस समय तो खेवट राज जाम्भेश्वर जी नाव लेकर आ गये है परन्तु उस पर सवार तो कोई बड़े भाग्यशाली ही होगा। यदि कोई भाग्यशाली नाव पर चढ़ेगा तो उसे निश्चित ही भवसागर से पार उतार देंगे। यहां पर हिन्दू मुसलमान का सवाल ही नहीं है। "ज्यों ज्यूं आवै सो त्यूं थरप्या" मुसलमानों को उनकी राह बताते है, महमंद का हवाला देकर समझाते है कि पांच समय की नमाज पढ़ो और रोजा रखो, इमान रखना और सद्मार्ग पर चलना ही उनका धर्म अच्छा है। इसी प्रकार से काजी मुल्लों को भी संतुष्ट किया है ।१।
दुलम देश पिराणियां, अंबाराय सहेटा । विसन सवारी लाडली, मुख मेलो जीव सहेटा । मुख मेलो जीव सहेट, लाडी अष्ट धात सहरिय । लेखो लेखै दोर प्रेसता, खत देख दुतर तारिय । अमि अमृत भोग मनसा, जै हक साच पिछाणियां । कबज कर ले चालो जीव कुं, दुलम देश पिराणियां ।२।
हे प्राणी ! इस देश शरीर को छोड़ने के पश्चात् आगे जिस देश में तुझे जाना है वह अति दूर है। बीच में घना जंगल एवं दुर्गम मार्ग है। विष्णु की दी गई सवारी अर्थात् नियम धर्म कर्म को साथ लेकर जाना अन्यथा मनमुखी होकर चलेगा तो चूक जायेगा। परमात्मा ने यह नियम धर्म रूपी नांव बड़े ही मनोयोग से बनायी है। यह नाव है जिस पर चढ़ कर तुम्हें जाना है वह अष्ट धातुओं की बनी हुई है। इसलिये बीच में आने वाले तूफानों से तुम्हारी रक्षा करेगी। जब धर्म की नौका पर सवार होकर आगे पहुंचेगा तो इस नौका को देखकर हिसाब-किताब पूछने वाले प्रेस्ता दूत भी तुम्हें छोड़ देंगे और पार उतारने में सहायक ही होंगे। परमात्मा के वैकुण्ठ धाम को जब पहुंच जायेगा तो मन वांछित अमृत पान करेगा जिसे पीकर अजर अमर हो जायेगा। इसलिये हे प्राणी ! इस जीव को सावधानी से जीवन जीने की विधि सिखाते हुए वापिस अपने घर को ले चलो, जहां से आया है वहीं वापिस पहुंचना है। ध्यान रहे कि वह देश अति दूर तथा दुर्लभ है ।२।
चड़ि नै चोबार लाडली, गोखड़ी पहर पटंबर झूनां । साथि म्हारा आवण कहि गया, कदि मिलसी बाग बिछुना । बाग बिछुनां मिलै क्यों करि, क्रोड़ बारा जोड़णी । कलि काल करण क्रिया, मोह माया तोड़णी । जम्भगुरु देवा करूं सेवा, अतिपात सहारिय । वैकुण्ठ साहा मन उमाहा, लाडी चड़ी-खड़ी चौबारियां ।३।
लाडली कन्या की भांति बुद्धि ही ऐसी जीवात्मा की सहयोगी मित्र है। जो जीवात्मा को पार उतारने के लिये अनेक उपाय रचती है। जिस प्रकार से लाडली कन्या अपने प्रिय जन की प्रतीक्षा करती है, चौबारे यानि महल की छत पर चढ़ जाती है और सभी तरह का श्रृंगार कर लेती है और अपने प्रियतम की सेवा के लिये आतुर दिखाई देती है उसी प्रकार से संसार की मोह माया से उपर उठकर माया जाल को तोड़कर ज्ञान ध्यान से अलंकृत होकर अपने प्रियतम ज्ञान स्वरूप परमात्मा से मिलने की प्रतीक्षा करती है। बुद्धि कहती है कि हमारे साक्षी सतचित आनन्द स्वरूप परमात्मा है उनसे मिलना कब होगा। जब यह बाग सूख जायेगा तो वह भंवरा यहां आकर क्या करेगा ? यदि वह विष्णुदेव मिले तो निश्चित ही मैं बारह करोड़ से जाकर जुड़ जाऊं। बिना प्रियतम के तो अपने आप इस कलयुग की मोह माया तोड़ना कठिन ही है। मोह टूटे बिना तो जम्भेश्वर देव की सेवा होना अति कठिन ही है। बुद्धि लाडली कन्या की भांति वैकुण्ठ लोक में जाने के लिये अति उत्साह से चौबारे पर खड़ी प्रतीक्षा कर रही है ।३।
खेत मुक्त घर जाइये, आवागवण न होई । रतन काया सुरगे उजली, मनसा कर रस होई । कर मनसा होय सब कुछ, हिरदै सागुण पेखिये । तेतीस करोड़ देवता, तां मांहि सतगुरु पेखिये । कजौ संभल चढ़ो बेड़े, हेत कर के ध्याइये । आवागवण न होय रे जीव, खेत मुक्ति घर जाइये ।४।
इस संसार रूपी खेत में आकर कमाई करके स्वकीय प्रयास से मुक्त होकर वापिस अपने घर को पहुंचे। जिससे जन्म मरण का चक्कर छूट जाये। यह पंच भौतिक देह गिर जायेगी तो आगे प्रस्थान के लिये रतन सदृश दिव्य काया मिलेगी उस काया से इच्छित भोग्य रसों की प्राप्ति हो सकेगी। इसलिये मन से किया हुआ संकल्प अवश्य ही पूर्ण होता है। उसी परमात्मा को हृदय में अवश्य ही देखें वही आनन्द स्वरूप का दर्शन होगा। तेतीस करोड़ देवता में सतगुरु जाम्भोजी को ही देखें। इसलिये कमर कसकर तैयार हो जाओ। सतगुरु के बेड़े पर चढ़ जाओ क्योंकि बेड़ा संबल है। हे जीव ! तेरा बार-बार जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त होना मिट जायेगा और सदा के लिये मुक्त हो जायेगा ।४।