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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह21 / 156

साखी छन्दां की राग आसावरी-21

मैं गुरु पेख्या री माय, सोई सतगुरु त्रिभुवण को राव री

कवि: अज्ञात कवि

कवि परिचय — अज्ञात कवि

ये हजूरी कवि थे। इस साखी में कोई कन्या अपनी मां से कह रही है कि हे मां ! गुरु की सेवा ही भगवान की सेवा है परन्तु कई लोग न जानें क्यों निंदा भी करते है। इस साखी में भक्ति तथा गुरु महिमा का वर्णन हुआ है।

मैं गुरु पेख्या री माय, सोई सतगुरु त्रिभुवण को राव री । उन लिख दिया री मेरी माय, सोई जाप जपूं उमाव री । अधिक उमावहो साध प्राणी, थूल अंत न पाइयो । गिगन मंडल लोक तीनों, जिन बिन थंभ रहाइयो । गिरि मेर पर्वत पवण पाणी, चंद सूर जिण सिरजियां । जीव काजै विष्णु जंपो, मेरी मांय सतगुरु पेखियां ।१।

एक कन्या अपनी माता से कह रही है कि हे माता ! मैनें आज सतगुरु के दर्शन किये है। ये कोई साधारण गुरु नहीं थे। वे तो स्वयं तीनों भवनों के राजा थे। उन गुरु ने तो मेरे हृदय में विष्णु का जप लिख दिया है। इस समय मैं वही जप रही हूं। इससे मेरे हृदय में उमंग की लहरें उठ रही है। इस समय मुझे अत्यधिक प्रसन्नता हो रही है, तथा अन्य भी साधु सन्तों को भी प्रसन्नता हो रही है इसका कोई अन्तपार नहीं है। जिस गुरु का मैनें दर्शन पाया है उसी गुरु ने ही तो तीनों लोक एवं सम्पूर्ण गगन मंडल बिना ही खम्भे ठहरा रखा है। तथा गिरि पहाड़, सुमेरू हिमालय, पवन, पानी, सूर्य, चन्द्र आदि सभी कुछ उन्हीं का ही बनाया हुआ है। हे मेरी मां ! अपने जीव की भलाई के लिये विष्णु का ही जप करें वही विष्णु ही सतगुरु के रूप में मैने देखा है ।१।

यो है विणजारो री मेरी मांय, बिणज करण आयो संसार री । यो है सराफीड़ौ री मेरी माय, परिखि लहो चुणि मोती री । लियो मोती विसन जोति, साच वाणी भाव ही । ब्रह्मज्ञान ध्यान केवल, सकल सार लहावही । कलिकाले वेद अथर्वण, सहज पंथ चलावियो । संभराथलि जोत जागी, जुग विणजण आवियो ।२।

हे मेरी मां ! यह विष्णु ही गुरु जाम्भोजी के रूप में यहां संसार में एक व्यापारी की भांति व्यापार करने के लिये आये है। ये विष्णु बहुत ही चतुर व्यापारी है, धोखा नहीं खा सकते। इसलिये जो अच्छी अच्छी वस्तुएं है उन्हें ही ठीक मूल्य देकर लेंगे अर्थात् जो हीरे मोती सदृश भक्त जन है उन्हीं को ही ले जायेंगे तथा जो काच सदृश नकली है उन्हें नहीं अपनायेंगे। ऐसे जो मोती है उन्हें ही लिया है क्योंकि वे तो स्वयं विष्णु ज्योति स्वरूप है उन्हें धोखा नहीं दिया जा सकता। उनकी वाणी सच्ची है तथा सभी को अच्छी भी लगती है। इसलिये आकर्षित हो जाते है। उनकी वाणी ब्रह्मज्ञान एवं ध्यान बतानें वाली है अथर्वेद की ही वाणी है। इस कलयुग में सार बतलाकर यह सहज पंथ चलाया है। यह ज्योति सम्भराथल पर जागृत हुई है और चुन-चुन कर हीरा-मोती लेने के लिये आये है ।२।

कई कई निंद करै मेरी मांय, वद दुनि गुरु साधा पायो । तिन वैकुण्ठा री मेरी माय, धजां क जीव सु अवसर लायो । लाय अवसर राय त्रिभुवन, चरित किया संसारियां । द्वीप द्वीप खंड खंड, आप अजा चारियां । निरहारी सबद भेदी, सुख में दुख में सारीका । कर्म रेखा विसन भेंटियो, संसार निंदक बिंदका ।३।

हे मां ! इस संसार में कुछ लोग तो निंदा भी करते है तथा उनसे वाद-विवाद तथा अहंकार भी करते है किन्तु इनसे विपरीत जो साधु सज्जन पुरूष है उन्होंने गुरु को पाया है। उस गुरु ने यहां आकर वैकुण्ठ लोक की ध्वजा फहरा दी है। सभी को अवसर प्रदान कर दिया है। यह अवसर प्रदान करके इस संसार में अनेकों दिव्यचरित्र भी किये है। यहां तक कि इस मरूभूमि के प्रत्येक खंड प्रखंड में गऊवें एवं बकरियां भी चराई है। इस संसार में निराहारी रहकर अनेकों चरित्र किया है, लौकिक व्यवहार को निभाया है। सुख-दुख में समान भाव से रहने की कला सिखाई है। हमारा भाग्य ही अच्छा था जो साक्षात् विष्णु से ही भेंट हुई है किन्तु अन्य संसारी लोग तो स्वभाव से ही निंदक है। उन्हें तत्व ज्ञान से क्या प्रयोजन है ।३।

यो है जीव लिया मेरा जीव, बार हुई चित चेत सबेरा । उन रथ जोतिड़ा री मेरी माय, आया सरस धोरी लेण हारा । सरस धोरी लेणहारा आयो, मच्छ कच्छ वाराह हुए । नरसिंह वामन परशराम, बोहड़ी प्रभ न पाइयें । गोरख जाम्भा कान्ह, लिछमण प्रसिद्ध परलई । पांच सात नव कोड़ी बारां, वार बारा की हुई ।४।

हे मेरे जीव ! तुमनें इस जिन्दगी को तो जी लिया है अब बाकी क्या रह गया है, अब तो समय सचेत होनें का आ गया है। निंद्रा से जागने का समय हो चुका है। इस शरीर रूपी रथ को चलाने वाला मालिक स्वयं ही इसे जब लेने के लिये आ गया है तो फिर चिंता किस बात की है। सरस धणी यानि स्वामी ही लेने के लिये आये है। ऐसे पहले भी कई बार आये है। वह विष्णु ही मच्छ, कच्छ, वाराह, नरसिंघ, वामन, परशुराम, राम-लक्ष्मण, कृष्ण, बुद्ध, गोरख के रूप में आये थे। अबकी बार इस समय जाम्भोजी के रूप में वे ही पुनः आये है। हे मेरी मां ! पांच, सात, नव तो पार उतार चुके है अब बारह करोड़ पार उतारने की बारी है उसमें तूं और मैं भी शामिल है ।४।