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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह20 / 156

साखी छंदां की राग आसावरी-20

तरण तारण जम्भराज आवियो, तेतीसां प्रतिपाल

कवि: अज्ञात कवि

कवि परिचय — अज्ञात कवि

इस साखी में कवि ने गुरुदेव की महिमा का गान करते हुए नौ अवतारों का वर्णन तथा कार्य का संक्षेप रूप में दिग्दर्शन किया है। यह साखी प्राचीन किसी हजूरी भक्त द्वारा वर्णन की गयी है इसलिये इसका महत्व है।

तरण तारण जम्भराज आवियो, तेतीसां प्रतिपाल । बारां क्रोड़ समावसी, दैतां रो खौं काल । दैतां रो खौं काल आयो, जम्भ सारे वारतो । जगै जोति चांद सूरज, करै सबरी आरतो । तखत सांई रच्यो साचो, कण तत सबद सुणावियो । करोड़ बारा लेण आयो, तरण तारण जम्भराज आवियो ।१।

संसार सागर से पार उतारने के लिये जाम्भेश्वर जी आये है। स्वयं विष्णु सर्व सृष्टि के पालन पोषण कर्ता है। तेतीस करोड़ पार पहुंचाने के अपने वचनों को निभाया है। इस समय इस कलयुग में तो बारह करोड़ को पार उतारेंगे उन्हें तो परमात्मा के स्वरूप में मिला देंगे किन्तु दैत्य जनों का तो नाश ही होगा। इस प्रकार से दैत्यों के नाश होने का समय आ गया है। भक्तों की आशा वार्ता तो पूर्ण ही करेंगे। गुरुदेव की देह तथा मुखमण्डल सूर्य चन्द्र की भांति प्रकाशमान हो रही है। मानों सारे जगत की ही आरती उतारी जा रही है। इस संसार के कण-कण में वही तो समाया हुआ है। उसी की ही आरती की जा रही है। वह सांई परमात्मा सच्चा आसन लगाकर विराजमान हुए है और कण तत्व बताने वाले शब्द सुना रहे है। इन्हीं शब्दों द्वारा प्रहलाद के बिछुड़े हुए बारह करोड़ का उद्धार करेंगे। इसी प्रयोजन से यहां पर आये है ।१।

फिरी दुहाई राय विसन की, गुण गन्द्रफ जांकै मीत । चीणम चीण गढ़ मां कटकिया, तुम क्यों सोवो नचीत । तुम रेण कांय नचीत सोवो, सोहड़ सांवत है खड़ा । भयाचीत भड़हड़ा परबत, पोली आगै ढहि पड़ा । प्रथम आगली रीस उपनी, श्याम सुरतां किसन की । छोड़ी पूरब नुव्यां पछंम, फिरी दुहाई राय विसन की ।२।

सभी जगहों पर विष्णु की ही दुहाई एवं जय जयकार हुई है। गन्धर्व, देव आदि सभी परमात्मा के ही मित्र तथा सहयोगी है। आगे कवि यहां पर चीन देश में आयी हुई प्राकृतिक विपति, तूफान, भूकम्प आदि का सांकेतिक भाषा में वर्णन करते हुए कहते है कि चीन देश में बसने वाले उन भयंकर राक्षसों का विनाश भी तो विष्णु ने ही अपनी प्राकृतिक शक्तियों द्वारा किया था। ऐसी चीन गढ़ में विपति आयी थी। हे प्राणी ! तूं क्यों निश्चित होकर सो रहा है। बड़े-बड़े सांवत राजा महाराजा भी उस मृत्यु के डर के मारे थर-थर कांप रहे है। कभी वह काल आयेगा तो बड़े-बड़े पर्वत, महल पोल सभी कुछ ढ़ह पड़ेंगे। पूर्व में भी कई बार ऐसा हो चुका है। न जाने कोई कभी का कर्म उदय हो जाये और प्रकृति का प्रकोप बढ़ जाये तो फिर कुछ भी हो सकता है। कृष्ण आदि अवतारों का वह सदा ही सौम्य रूप ही तो सामनें नहीं रहता कभी उनके विकराल रूप का भी सामना करना पड़ता है। इस प्रकार से पूर्व देश को छोड़कर पश्चिम देश को झुकाया था और विष्णु की ही माया है जिसे बड़े-बड़े सांवत राजा महाराजा भी उस मृत्यु के डर के मारे थर-थर कांप रहे है। विष्णु की ही आखिर में जय जयकार हो गयी थी ।२।

कलि कालंग जगावियो, गरब करो मन थोड़ा । दुलभ संक माने नहीं, दाल चरे कठ घोड़ा । दाल चरे कठ घोड़ा, आवै सोहड़ सांवत मुहि मिलै । लंक गढ़ में एक रावण, सुरां असुरां नर दलै । लख रावण लख महारावण, कुंभकरण सा भाइयों । उजीणी नगरी हुई गहमह, कलि कालंग जगाइयो ।३।

इस कलयुग में आकर गुरुदेव ने कालंग अर्थात् कलयुग को ही जगाया है। कलयुग के बढ़ते प्रभाव को कम किया है। कलयुग से कहा कि तूं अपनी ताकत के आधार पर अधिक गर्व कर रहा है। मैं तेरा प्रभाव जानता हूं और इसका इलाज भी जानता हूं। अन्य साधारण पुरूष से तो यह कलयुग घोड़े की भांति काबू में आने वाला नहीं था। क्योंकि इसके प्रभाव से कुछ पाखण्डी लोग काठ के घोड़े को भी दाल चराने लगे थे अर्थात् ठग विद्या में प्रवीण थे। ऐसे लोग समाज में आते और अपना करिश्मा दिखाकर अपनी धाक जमाते और अपनी ही पूजा करवाते थे। ये तो बहुत ही छोटे लोग थे किन्तु गढ़ लंका में भी एक मायावी राक्षस रावण था। तथा अन्य भी रावण तथा कुम्भकरण महिरावण सदृश लाखों योद्धा उनके पास में थे। सभी मिलकर सुर असुर मानव आदि को नष्ट कर दिया करते थे। उसी प्रकार उज्जैन नगरी में भी हलचल मची थी किन्तु समय आने पर विष्णु ने ही सभी का सफाया कर दिया था। तो फिर इस कलयुग की क्या करामात है ।३।

दुल दुल पाखर मेल्ह करै, आखिर देह लगाम । तिहिं चड़ि आवै महमंद, हनफियो महदी साह सलेम । महदी साह सलेम चड़ियो, जुलफे कार झंपऐं । थरा हरे धरती मेरू अम्बर, लोक तीनों कंपऐं । सजे गरूड़ वाहण चढ़े जम्भराज, छपन कोड़ी जादु मिले । साध पुगी लेवे लेखो, मेल्ह पाखर दुल दुलै ।४।

कलयुग रूपी उदण्ड घोड़े पर काठी रखकर लगाम डाल दी थी और इसके उपर सवार भी हो चुके थे। अब कलयुग रूपी घोड़े पर चढ़कर स्वयं विष्णु ही नाना रूप अर्थात् अवतार लेकर आयेंगे तथा आये भी है वे किसी भी रूप अथवा नाम से जाने जा सकते है। वही विष्णु ही महंमद साह सलेम आदि नामों से आये है वही आगे कलंकी नाम से भी आयेंगे। उनके यहां पर आने से धरती के उपर रहने वाले पापी तो क्या पर्वत मेरू आकाश आदि सभी कंपायमान हो जायेंगे। वही विष्णु ही मानों सुसज्जित गरूड़ पर सवार होकर आये है और अपने बिछुड़े हुए छप्पन करोड़ यादवों से मिले है। उन्हें उनके कर्त्तव्य कर्म का बोध करवाया है तथा उनको पाप का दण्ड भी दिया है ।४।

अलख निरंजण मनसा यों धरी, नव फेर कियो कबूल । श्री हरि श्याम ओलख्यो, दसवें फेर अमूल । दसवें फेर अमूल कालिंग, खलक खालक ध्याइयों । फुरमाण राय विसन को, मोहे सम्भर वर पाइयो । संख पूर सति विधि सूं, छतर सिर जुग जुग धरे । नाचे नारद करै अखाड़ौ, अलख मनसा यूं धरे ।५।

उसी अलख निरंजन परमात्मा ने ही अब तक नौ बार अवतार धारण किया है और अपने वचनों को निभाया है। परमात्मा की इच्छा ही इसमें प्रमाण है। इस समय जाम्भेश्वर जी के रूप में स्वयं हरि श्याम आये है जो पहचाने जा सकते है। आगे पुनः दसवें कल्कि अवतार की बारी है। जब भी प्राणी भूल करता है तो वही खालक इस खलक में भागकर आते है। राय विष्णु का सिद्धान्त इस जगत में स्थापित करते है और विजय प्राप्त करके ही वापिस जाते है। यहां पर विधि-विधान से पूजित होकर विजय सूचक शंख बजाकर के अपने सिर पर हर्ष उल्लास से मुकुट धारण करते है। यह कार्य युगों-युगों से हो रहा है। जब संसार में भक्ति की स्थापना हो जाती है तो नारद जी भी भक्तों के साथ नृत्य करते है और उस अलख पुरूष को हृदय में धारण करके कृत्य-कृत्य हो जाते है ।५।