कवि परिचय — अज्ञात कवि
राग आसावरी में गेय एक छंदा की यह साखी है। इस साखी में गुरुदेव की महिमा का गुणगान किया है। जन साधारण के लिये मोक्ष की प्राप्ति हो इसके लिये सुक्रत करने का कवि ने आह्वान किया है।
सतगुरु आयो मोमणों महरि करि, सुरनऊ विनऊ साच । सतयुग कोल संभालिया, बारां पालण वाच । वाचा तो पालण विसन आयो, सहज सतपंथ चालियो । गुरु ज्ञान रूपी धर्म बहुविध, मुक्ति मार्ग दिखावियो । मानों हकीकत वरत अनहद, करो गुरु फरमावियो । कलिकाल कवल कीयो, महर कर गुरु आवियो ।१।
हे मोमणों ! कृपा करके स्वयं विष्णु ही यहां पर सुरनर के रूप में आये है। कहा भी है "सुरनर तणो सन्देशो आयो" मैं बार-बार सच्चे दिल तथा मन से प्रणाम करता हूं। सतयुग में प्रहलाद के साथ किये हुए वचनों को पूरा करने के लिये ही आये है। यहां पर बारह करोड़ का उद्धार करके अपना वचन पूरा करेंगे। यहां पर तो निश्चित ही अपने वचनों को निभाने के लिये ही आये है और सहज ही में विष्णु पथ पर यह बिश्नोई मार्ग बताया है गुरु ने ज्ञान द्वारा नाना पन्थों का सार निकालकर एक धर्म में समावेश कर दिया है और हमें मुक्ति का मार्ग बता दिया है। गुरु द्वारा बताया हुआ मार्ग वास्तव में सत्य है और हकीकत है इसलिये मान्य है। यह अनहद नाद रूपी शब्द इस समय चल रहा है यत्र तत्र सुनाई दे रहा है। यह भी व्यतीत हो रहा है। समय रहते हुए ग्रहण कर लेना चाहिये। जैसा गुरु ने कहा है वैसा ही करना चाहिये। कलयुग में कृपा करके स्वयं विष्णु ही गुरुदेव के रूप में आये है। सतयुग में दिये हुए वचनों का पालन किया है ।१।
सुगुरु कुगुरु बहु आंतरो, सांभलि प्राणी भेव । अनन्त गुणों गुरु परखी लहो, दोष विवरजत देव । देव दोष अठारै बरज्या, जांसे कलंक न लाग ही । गुरु ज्ञान केवल वाचा अवचल, जोति जुगजुग जागही । अतिपात संभाल रे जीव, जांह संग दुतर तीरो । अवर गुरु की न करो सेवा, सुगुरु कुगुरु बहु आंतरो ।२।
सुगुरु और कुगुरु में बड़ा ही अन्तर है। हे प्राणी ! संभलकर चलना कहीं धोखा न हो जाये कुगुरु के जाल में फंस गया तो सर्वनाश हो जायेगा। यहां पर सम्भराथल पर विराजमान गुरु में अनन्त गुणों का भण्डार है परीक्षा कर लेनी चाहिये। ये देव तो सभी दोषों से रहित है इसलिये सुगुरु है। स्वयं देव ने "कैते कारण क्रिया चूक्यो" शब्द द्वारा अठारह दोष गिनाये है और मानव के लिये वर्जनीय बताये है। ये दोष जिनमें नहीं है उसे कोई भी कलंक नहीं लगेगा। किन्तु कुगुरु में ये सभी दोष होते है। सतगुरु को कैवल्य ज्ञान देते है, उनकी वाणी अवचल, अटल एवं सत्य है। उनकी ज्योति तो युगों-युगों तक जलती रहेगी और अपने प्रकाश से सर्व साधारण को जगाती रहेगी। रे जीव ! अब तो संभलकर चल अति हो रही है। अभी नहीं तो फिर कभी नहीं यह समय गुरु के साथ नाव में बैठकर पार उतरने का है। इसलिये अवर गुरु की सेवा न करें। क्योंकि सुगुरु और कुगुरु में बड़ा ही अन्तर है ।२।
अवसर जिहां न चेतियो जी, भले न लाभे वेर । थोड़े रे जीवण कारणै, मनों न कीजै मेर । न कर मेरा नहीं तेरा, कलपि भार न लीजिये । छाड़ि मन मुख होय गुरुमुख, जो गुरु कहै सो कीजिये । काम, क्रोध, कुलोभ परहर, ध्यान मन सूंधे करें । जुग चोथे विसन प्रगटे, चेत जीव इण अवसरे ।३।
यह अवसर आया हुआ है इसमें भी यदि सचेत न हो सके तो फिर ऐसा समय बार-बार फिर नहीं आयेगा। थोड़े से जीने के लिये इस संसार की वस्तुओं में मत फंसो, मन से मेरा न समझो । न यह मेरा और न कह तेरा, यह मेरा और तेरा कह कर ही बीच में खाई डालना है। अपने की रक्षा और पराये का विनाश यह भावना रखकर क्यों कलाप कर रहा है। व्यर्थ में ही दुःख का बोझ उठा रखा है। मनमुखी कार्य को छोड़कर गुरु मुखी होकर कार्य करें। कहा भी है- "गुरु मुखी मुरखों चढ़े न पोहण मन मुखी भार उठावे ।" जैसा गुरु ने कहा है वैसा ही करें। काम, क्रोध, कुलोभ त्याग करके मन से प्रभु का ध्यान करें यही मन को साधने का उपाय है। इस चौथे युग में स्वयं विष्णु प्रगट हुए है। हे जीव ! इस अवसर पर सचेत हो जा ।३।
तेतीसां सूं मेल करावो, सुरां मिलावण काज । जिण खंडी जंवर न संचरै, ऋषियां निश्चल राज । जहां ऋषियां राज निश्चल, सदा कोड़ि सुहावणा । हूर कांमणी करै केली, रतन गढ़ रलि आंवणां । दुख दारिद्र पिसण नांही, जम न कौ पहुंचै कले । सोई पंथ संभाल रे जीव, चाल मन तेतीसां मिले ।४।
हे गुरुदेव ! आपनें जो समय-समय पर तैतीस करोड़ का उद्धार किया है, हमें उनसे मेल करा दो। वहां वे देव स्वरूप में ही है। उनसे हम मिलेंगे तो बड़ी ही प्रसन्नता होगी। वहां पर इस जीव को खंडित करने के लिये यमराज न पहुंच सके, वहां पर तो हमारे ऋषियों का राज ही निश्चल यानि अडिग है। जहां पर ऋषियों का राज होगा। वहां पर यमराज का क्या काम है। वहां तो सदा ही प्रेम शोभायमान होता है। वहां पर अनेक अप्सरायें नृत्य गान करती है। उनकी रतन सदृश सौम्य काया है ये सभी मिलजुल कर आती है और महोत्सव मनाती है। प्रेम का संचार करती है। वहां पर किसी प्रकार का दुख दरिद्र नहीं है। और न ही कलयुग का प्रभाव ही है। और न ही यमदूत ही पहुंच पाते हैं। ऐसा स्वर्गीय सुख दिलाने वाला यह बिश्नोई पंथ है। रे जीव ! इस पंथ पर संभलकर चल तुम अवश्य ही उन्हीं तैतीस करोड़ देवताओं से भेंट कर सकोगे ।४।