कवि परिचय — अज्ञात कवि
सौलहवीं शताब्दी की इस साखी में विशेष रूप से अतिथि सत्कार का महत्व बतलाते हुए भगवान के भक्त द्वारा साधु की सेवा तथा आनें की प्रतीक्षा का वर्णन है साथ ही प्रचलित सगुनों पर भी प्रकाश डाला है। यह अपने आप में निराली साखी है।
मेरी अंखियां फरूकै जी, काग करूंकै आंगणै ।१।
एक सखी भक्त दूसरी अपनी पड़ोसण सखी से कह रही है कि आज तो मेरी आंखें फड़क रही है अर्थात् बार-बार झपक रही है तथा कौवा आंगन में आकर बोल रहा है। यहां अवश्य ही कोई अतिथि आयेंगे। यह सगुन होता है किसी के आने का, ऐसी मान्यता है ।१।
पड़ोसण बूझै जी, पाहुंणा कोई आयसी ।२।
ऐसी वार्ता सुनकर उससे पड़ोसन पूछती है कि यह तो बतलाओ कि आज तुम्हारे ऐसे कौन से पाहुने बटाऊ आनें वाले है ।२।
घोड़लियां खुर बाजै जी, बैला के बाजै घुंघरूं ।३।
इस प्रश्न का जवाब देती हुई गृहिणी कहती है कि हमारे यहां पर तो मोमण भक्त साधु जन ही आ सकते है और हमारे प्रिय अतिथि कौन हो सकते है। जरा कान खोलकर सुनो, घोड़ों की टाप सुनाई दे रही है और बैलों के पैरों में बंधे हुए घुंघरू बज रहे है। हे सखी ! शीघ्र ही अब पहुंचने वाले है ।३।
साधु मोमण आयै जी, धन्य दिहाड़ौ धन्य घड़ी ।४।
आज का दिन और घड़ी हमारे लिये धन्य है जो इस शुभ अवसर पर हमारे घर पर साधु भक्त आयेंगे ।४।
काठ चंदण मंगाऊं जी, छोल घड़ांऊं पालकी ।५।
हे सखी ! सर्व प्रथम उनके बैठने के लिये आसन चाहिये। वह आसन कोई साधारण लकड़ी का पाट तो क्या होगा उसके लिये तो चंदन की लकड़ी मंगवा कर उस लकड़ी को सुधार कर अच्छे कारीगर से सुन्दर पालकी बनाऊं तभी सत्कार हो सकेगा ।५।
पाट रेसम बणाऊं जी, दावण द्यौ मखतूल की ।६।
उस पालकी तथा पाट पर रेशम की तथा मखमल की गद्दी बिछाऊंगी। उस पलंग की दावण भी मखमल की डोरी की ही बनाऊंगी ।६।
सलेफ बिछाऊं जी, आलम सांई गींदवों ।७।
आलमसाई सर्वश्रेष्ठ गद्दा बिछाकर ऊपर रेशम की चादर बिछाऊंगी ।७।
साधु मोमण पोढ़े जी, धन्य दीहाड़ो धन्य घड़ी ।८।
उस सुन्दर पलंग पाट तथा पालकी पर साधु भक्त जन पोढ़ेंगे झूलेंगे यही मेरी शुभ कामना तथा भावना है। वह ऐसा समय आयेगा तो मैं धन्य-धन्य हो जाऊंगी ।८।
कोरा चरूं चहोड़ूं जी, जल मंगाऊं गंग को ।९।
जब साधु मोमण शांति पूर्वक विराजमान हो जायेंगे तब मैं उनके लिये भोजन की व्यवस्था करूंगी। उसके लिये तो मुझे सर्वप्रथम जल लाना होगा। नये घट को लेकर मैं स्वयं जाकर गंगा जल भर लाऊंगी और उस पवित्र जल से भोजन तैयार करूंगी ।९।
झीनवै का चावल जी, दाल हरि हरि मूंग की ।१०।
झीनव अर्थात् सर्वश्रेष्ठ चावल जो पवित्र देश में उत्पन्न होते है वे ही मंगाऊंगी और हरे हरे मूंग की दाल बनाऊंगी ।१०।
गायां को घृत मंगाऊ जी, दही मंगाऊ भूरी भैंस को ।११।
गऊवों का घृत मंगाऊंगी और दही भूरी भैंस का लाकर जिमाऊंगी ।११।
कासमीरी थाली जी, लोटो मंगाऊ मुंहम को ।१२।
काश्मीर से थाली मंगाऊंगी और लौटा महम का मंगाऊंगी ।१२।
साध मोमण जीमै जी, अंचल झोली बीझणों ।१३।
सभी वस्तुएँ तैयार हो जायेगी तब साधु मोमण भोजन करने के लिये बैठेंगे और मैं अपने ही आंचल रूपी पंखे से हवा करूंगी पंखा झलूंगी ।१३।
पड़ोसणी बूझै जी, पाहुंणा क्या लाइयां ।१४।
अब आगे पड़ोसण पूछ रही है कि हे सखी ! तूं इतनी सेवा करेगी तो तेरे लिये साधु मोमण क्या लायेंगे ? तुझे उपहार क्या देंगे, तेरी सेवा का प्रेम श्रद्धा का क्या होगा ? ।१४।
म्हानै सुरग बतावै जी, रतन काया पहरायसी ।१५।
इस प्रश्न का उतर देती हुई कहती है कि हे सखी ! ये साधु मोमण तो हमें स्वर्ग जाने का मार्ग बतलाते है और ये ही इस संसार को छोड़कर जायेंगे तो हमें रतन काया दिलवायेंगे। इसी रतन काया को लेकर ही हम स्वर्ग में जा सकते है अन्यथा तो दुर्गति ही होगी। यही मेरी सेवा का फल है। कहा भी है- रतन काया सोभंति लाभे पार गिराये जीव तिरै ।१५। यहां पर एक श्रद्धालु भक्त अपनी भक्ति की पराकाष्ठा बतला रही है। श्रद्धा भावना को इस साखी द्वारा प्रगट किया है। अतिथि सेवा परंपरा की एक झलक इस साखी द्वारा मिलती है इसलिये इस साखी का अपना ही महत्व है।