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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह17 / 156

साखी छंदां की-17

रे मन मीठा लोभ पइठा, लिखूं सूं मन्यसा काची

कवि: अज्ञात कवि

कवि परिचय — अज्ञात कवि

सौलहवीं शताब्दी। इस साखी के चार छन्द है। इस साखी में मन को समझाते हुए कवि कहता है कि हे मन ! तूं सांसारिक वासनाओं को त्यागकर अमृत रूपी परमात्मा की तरफ बढ़-

रे मन मीठा लोभ पइठा, लिखूं सूं मन्यसा काची । हिरदे ज्ञान लिख ले मनवा, विसन महुरत वाची । बैठो हंस काया गढ़ बोले, नर निरहारी दीठो । किरिया सार काया कसौटी, लोभ पड़यौ मन मीठो ।१।

रे मन खारा विरचण हारा, विरचि काया गढ़ लेलो । जीव सत को साथ सुहेलो, साच कहूं मन सुध चालो । कांय मन फिरे अकेलो, पांचां मांहि मुखी था रे जीव । कूड़ कपट सोह निवारी, हरख्यौ हरि जंपै नहीं पीव ।२।

कवि अपने ही मन को समझाते हुए कहते है कि रे मन ! तूं मीठा बनकर लोभ में प्रवेश कर गया है तूनें अपनी चालाकी से मुझे लोभ में डुबा दिया है। हे मन ! मैं तेरी ही करामात लिख रहा हूं। मुझे अपने ही दिल में तेरी तस्वीर दिखाई दे रही है। जिस प्रकार से कांच के दर्पण में मुख दिखाई देता है। इसलिये मैं तेरी कार गुजारी को ठीक से समझ रहा हूं। रे मन ! हृदय के द्वारा उत्पन्न हुए ज्ञान को लिख ले, अपने लिये थोड़ी देर चंचलता को त्याग करके विष्णु का जप करले। काया रूपी गढ़ में हंस रूपी जीवात्मा बैठा हुआ यह बात बोल रहा है तुझे सीख दे रहा है उस हंस को सांसारिक विषयों से कुछ भी प्रयोजन नहीं है क्योंकि वह तो नर-निरहारी है। सभी को इस रूप में प्रत्यक्ष भी होता है इस संसार में शुद्ध क्रिया कर्म ही सार है और जीवन में शुद्धाचरण ही कसौटी है इसी से कसकर जीवन को पवित्र बनाया जा सकता है। किन्तु हे मन ! तूं तो संसार के लोभ में मीठा बनकर फंस गया है। रे मन ! तूं तो कभी मीठा बनकर इस काया गढ़ को खींच कर ले जाता है तो कभी खारा बनकर भी जबरदस्ती खींचता है। मुझे मालुम है कि तूं ऐसी करामात करता है। मैं सत्य कहता हूं कि इस जीव और सत्य सनातन परमात्मा का साथ ही सदा शोभायमान हो सकेगा। इसलिये हे मन ! शुद्धता और सत् क्रिया का पालन करते हुए आगे बढ़ो। आकाश, वायु, तेज, जल और धरणी ये पांच तथा पांच ज्ञानेन्द्रिय पांच प्राण एवं पांच कर्मेन्द्रिय इनमें मुख्य श्रेष्ठ जीवात्मा ही है कहा भी है 'पंच आत्मा परिवारूं' हे मन ! तूं अकेला ही क्यों भटक रहा है। इन पांचों की मण्डली के साथ ही संयोग करके आत्मा से क्यों नहीं जुड़ जाता। रे मन ! तूं झूठ कपट मोह को छोड़कर इन्हीं दुःखों से छूटकर क्यों न हर्षित होकर उस परमात्मा सर्वेश्वर स्वामी को भजता ।२।

रे मन झूठा करि पांच अपूठा, ज्यों चालो त्यूं चाली । मन हठ माण मेर जे छाड़ो, कूड़ कपट सोह पाली । पालो पवंण प्रीति घण संचो, नर निरहारी दीठो । हरि पखो कांय हुजति साझौ, मन झगड़ालू झूठो ।३।

रे मन ! तूं झूठा है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, इर्ष्या इन पांचों से सम्बन्ध क्यों जोड़ा है इनको पीठ क्यों नहीं दिखा देता, इन्हें पीछे छोड़कर जैसा मैं चलता हूं, सतचित आनन्द स्वरूप की तरफ बढ़ता हूं तूं भी उसी तरफ क्यों नहीं बढ़ता। यदि स्वकीय मन का हठ है कि यह मेरा है, यह छोड़कर यदि आगे बढ़े तो स्वतः ही झूठ-कपट की वासना निवृत हो जायेगी। व्यर्थ के वाद-विवाद एवं अहंकार की पुष्टि के लिये सौ झूठ एवं अहंकार का सहारा लेना पड़ता है। मन और प्राणों का गहरा सम्बन्ध है इसलिये कहा है कि पवण को रोको अर्थात् प्रणायाम करो। उससे मन भी रूकेगा प्राण वायु को स्थिर करना ही मन को रोकना है। तथा दूसरा उपाय बतलाया है कि परमात्मा के प्रति प्रेम भाव का अधिकता से संचार करो तो उस नर रूपी निरहारी भगवान का दर्शन हो जायेगा। हरि स्मरण कथा चरित्र के अतिरिक्त क्यों व्यर्थ की बातें करते हो यह मन तो तर्क रूपी कैंची को हाथ में लिये हुए है सभी को ही काटता जा रह है यानि झूठा झगड़ा करना इसका स्वभाव हो गया है ।३।

सत करि बंदा पर हरि निंदा, पांचो जुमलो कीजै । दसबंद देव तणों कांय राखो, दरगै लेखो लीजै । जिहिं मन खोटा तिहिं मन तोटा, नै करि पराई निन्दा । हिरदै जो हरख्यौ हरि जंपो, सो सत सीधा बंदा ।४।

हे बंदा ! सत्य का ही व्यवहार करना सदा घर में बैठकर पांच साखी गाकर जुमला करना या पांच भाई-बन्धु, मोमण बैठकर स्वयं ही जागरण सत्संग करते रहना, अपनी कमाई से दसवां भाग परमात्मा के अर्पण यज्ञ, दान द्वारा करते रहना, दसवां हिस्सा अपने कार्य में न लगाना अन्यथा इसका हिसाब आगे लिया जायेगा। जिसका भी मन खोटा है यानि बाहर कुछ और अन्दर कुछ और धोखाबाज है उसी के ही सदा घाटा रहेगा इसलिये किसी की निंदा करना ही महापाप है। सीधा सरल बंदा तो वही है जो हिरदै में हरि का स्मरण हर्षित होकर करता है। अन्यथा किसी के दबाव से या देखा देखी माला घुमाता है वह सत पुरूष तथा भक्त नहीं है ।४।