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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह16 / 156

साखी कणां की-16

गुरु कायमा

कवि: अज्ञात कवि

कवि परिचय — अज्ञात कवि

सौलहवीं शताब्दी की यह रचना अनुमानित है। यह कणां की साखी है। इन दस पंक्तियों की साखी में कवि नें विष्णु का जप और संसार की असारता बतलाई है।

गुरु कायमा ।टेक। दिल मां दया सेवियो साधो मोमणों, परदेशी संसारी ।१।

सै देशीड़ा आगल हुवैला, सुक्रत लेह सिधारी ।२।

हमारे सतगुरुदेव इस समय सम्भराथल पर कायम है, अर्थात् प्रत्यक्ष रूपेण दर्शन दे रहे है। हे साधों ! हे मोमणों ! दिल में दया भाव रख कर छोटे-बड़े सभी की सेवा करें। प्राणी मात्र की सेवा ही ईश्वर सेवा है। यह जीव इस संसार रूपी देश में आया हुआ है, कहा भी है- घर आगी इत गोवलवासो, गोवलवास कमायले जीवड़ा। इस परदेशी का क्या विश्वास है। यह कब यहां से प्रस्थान करके इस देश से अलग हो जायेगा। इसलिये यहां से जाते समय सुक्रत लेकर ही जायें, इस संसार में रहकर ही सुक्रत कमाया जा सकता है ।२।

सुक्रत सुरग सुहेला हुइये, मन मां देख विचारी ।३।

पुण्य कर्म से ही स्वर्ग लोक भी शोभायमान हो जायेगा, वहां आगे बधाई बंटेगी, स्वागत होगा, आप वहां जाकर नरक को भी स्वर्ग में बदलने की क्षमता रखते है। इसलिये मन में देख विचार करें ।३।

गरथ बिहुंणा जिसा व्योपारी, क्रिया बिहुणा हारी ।४।

जिस प्रकार से कोई व्यापारी व्यापार करने के लिये परदेश में चला तो जाता है परन्तु पास में रूपये धन आदि नहीं है तो वह व्यापार कहां से करेगा, ठीक उसी प्रकार से क्रिया विहीन नर की दशा होगी। यहां से अन्तिम प्रस्थान करते समय कुछ पारलौकिक धन साथ अवश्य ही लेकर जायें ।४।

संबल बिहुणा कोस न चालिये, घर है भूंयजल पारी ।५।

बिना ताकत के एक कोश भी रवाना न होना, अर्थात् आगे परलोक में प्रस्थान करते समय धर्म सुकर्म का संबल लेकर ही जायें क्योंकि आगे जिस घर को वापिस जाना है वह घर अति दूर सात समुद्र से पार है, उस अथाह समुद्र को कैसे लांघ सकोगे ।५।

दिन दिन आव घटै सौणि मनवां, ज्यौं छक्यो तिथि सारी ।६।

हे मन राजा ! इस शरीर की आयु क्षण, मास करके घटती जा रही है। इस बात का कभी ख्याल किया है? जिस प्रकार से सम्पूर्ण तिथियां घटती जा रही है वही दशा तेरे इस पंचभौतिक की भी हो रही है ।६।

खालक राजा लेखो मांगै, पूगी मौत हंकारी ।७।

अहंकारी मृत्यु जब शरीर को तोड़ मरोड़ करके जीवात्मा को लेने के लिये आ जाती है तो उसे ले ही जाती है, तथा खालक परमात्मा के ही सेवक यमराज के सामने खड़ी कर दी जाती है। वहां पर स्वयं उससे जीवन का लेखा जोखा मांगते है ।७।

विसन जी की सेवा मनसा मेवा, मिले अतिवर नारी ।८।

विष्णु की सेवा भजन करना ही मानसिक मेवा है, किन्तु हे मन ! तुमने सेवा की ही नहीं, उस मीठे मेवे की तरफ ध्यान ही नहीं दिया, किन्तु इसके विपरीत संसार के विषय भोगों में ही उलझा रहा, वही सुख भोगता रहा, वहां सुख कहां था, वह तो एक मात्र झलक ही थी ।८।

विसन जपंता पाप न रहसी, पोह उतरि व्योपारी ।९।

सुरां सूं मेलो कान्ह दिसावर, गोठि मिलो दीदारी ।१०।

हे व्यापारी ! विष्णु-विष्णु ऐसा जप करेगा तो तेरे पास पाप नहीं रहेंगे, और पाप से रहित हो जायेगा तो तुझे आगे का रास्ता साफ दिखलाई देगा, उसे पकड़ करके पार उतर जायेगा। हे मानवों ! तुम्हारा यह अवसर है कि देवताओं से भेंट करने की युक्ति अवश्य ही समझो, इसके लिये कृष्ण द्वारा कही हुई गीता ही आपके लिये निर्देश है। उसे जानने के लिये संगोष्ठि में जाकर बैठो, वहां तुम्हें उस दीदार के दर्शन अवश्य ही हो जायेंगे ।१०। कहा भी है- कान्ह दिशावर जे कर चालो।