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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह15 / 156

साखी कणां की-15

गुरु भाईयों

कवि: अज्ञात कवि

कवि परिचय — अज्ञात कवि

यह सौलहवीं शताब्दी की रचना है। यह कणां की साखी प्राप्त है। इस छोटी सी साखी में कवि ने गुरुदेव की महिमा का वर्णन किया है।

गुरु भाईयों ।टेर। दीवलौ दीन दिलां मां ध्याइयै, हुइये सुरा सारीखा ।१।

हे गुरु भाइयों ! दीपक सदृश स्वयं ज्योति स्वरूप परमात्मा को अपने दिलों में हृदय में राखो, उन्हीं का ध्यान स्मरण करो, कहा भी है- 'हृदय नाम विष्णु का जंपो हाथे करो टवाई' परमात्मा का ध्यान करते हुए आप भी स्वयं तद स्वरूप हो जाइये। ध्यान में ऐसी ही विशेषता है कि वह अपने को जिस रूप का ध्यान करता है उन्हीं रूप में बना देता है ।१।

राजिये राज तज्यो जीव काजै, गुरु सिख मांगी भीखा ।२।

बड़े-बड़े राजाओं ने भी अपनी भलाई के लिये जीव का कल्याण करने के लिये राज-पाट छोड़ दिया और गुरु की शिक्षा ग्रहण की, तथा गुरु के कथनानुसार जीवन यापन करते हुए भिक्षा मांगकर जीवन निर्वाह किया, कहा भी है- करोड़ निनाणवें राजा भोगी गुरु के आखर कारण जोगी ।२।

चंद छिपै निस होय अंधियारौ, गुरु विण एह परीखा ।३।

जब चन्द्रमा छिप जाता है तो घोर अन्धकार छा जाता है, उसी प्रकार गुरु के बिना संसार में अज्ञान अन्धकार छा जाता है। चन्द्र सदृश गुरु के विद्यमान रहने से अन्धकार नहीं रहता, यही सद्गुरु की परीक्षा है ।३।

कांही अनेसो कांही मनेसो, सब सुणियों इहि गुरु की सीखा ।४।

सद्गुरु जब सच्ची यथार्थ बात बोलते है तथा कभी किसी को फटकार भी सुनाते है तो किसी को प्रसन्नता होती है, अन्य किसी दूसरे को दुःख भी होता है। किन्तु गुरु किसी की परवाह नहीं करते, कवि कहते है कि इतना होनें पर भी गुरु तो सभी के हित की बात कहते है। उन्हीं को अवश्य ही सुनिये। वे तुम्हारा अपमान नहीं करते किन्तु सीख देते है। सच्चाई सदैव कड़वी ही होती है ।४।

साथ चले हम सीर जे भाइयो, करतब झूरी झीखा ।५।

हे गुरु भाईयों ! हम सभी मिलकर एक साथ चलें। हम सभी एक ही पन्थ के राही है। हमारा धर्म कर्म गुरु एक ही है। हम अपनें कर्तव्य कर्म से रहित होकर आपस में व्यर्थ के विचार में न फंसें ।५।

हांसल जमां मूवां जीव जाणै, जदि गुरु मांगे जी का ।६।

इस संसार में हम आये थे तो कुछ सिर पर ऋण का कुछ बोझ था। उस कर्जे को हमने उतारा या नहीं? हासिल यानि कर जमा किया या नहीं? इस बात का जवाब तो जीव यहां से इस शरीर को छोड़कर जायेगा तब उससे पूछा जायेगा। यह कार्य भी गुरुदेव की आज्ञा से ही होगा ।६।

जुमलै गोठि मिलो संग साधो, अवधूं में कांय देखो देखा ।७।

हे सज्जनों ! जुमले जागरण सत्संग में मिलकर बैठो, साधु की संगति करो, अपने जीवन के बारे में विचार विमर्श करो, क्यों किसी दूसरे की तरफ देख रहे हो। क्या किसी अवधू के दर्शन से तुम्हारा कल्याण हो जायेगा? कहा भी है- गोरख दीठा सिद्ध न होयबा ।७।

सतगुरु सांई सब तुझ तांई, पाप धर्म का लेसी लेखा ।८।

हे भाई ! सतगुरुदेव ही स्वयं परमात्मा है और उनकी दृष्टि से सभी को देखती है, फिर क्यों छुपकर पाप करने की हिम्मत करता है। वह तो पाप पुण्य का हिसाब कर लेंगे ।८।

गुरु फुरमाई टलै न भाई, गुरु सबदां ही मेखां ।९।

हे भाई ! जैसा गुरु ने कह दिया है वह कभी टलने वाला नहीं है। देशकाल वस्तु से अपरिच्छिन्न है, उनके कहे हुए शब्द लोहे की लकीर है अथवा लोहे की खूंटी या मेख है, जहां पर भी गाड़ दी वहीं पर ही मजबूत हो जायेगी, कभी उखड़ने वाली नहीं है ।९।

गुरुवट छूटी करणै पहलै, रहै न एका रेखा ।१०।

यदि गुरु का मार्ग छूट गया और मनमुखी हो गया तो फिर कर्ण जैसी गति हो जायेगी, कहा भी है- मनमुख दान जू दीन्है करणै, आवागवण जू आइयो। यदि एक भी धर्म नियम टूट गया तो फिर एक टूटने से सभी टूट जायेंगे ।१०।