कवि परिचय — अज्ञात कवि
संवत् 16 शताब्दी की एक जुमलै की साखी हजूरी कवि द्वारा रचित है यह साखी जुमलै में प्रथम गायी जाती है ऐसी परंपरा है।
साधे मोमणे कियो छै इलोच, जुमलो रचावियो ।१।
इण जुमलै नै पूजैली करोड़, गुरु फुरमावियो ।२।
साधुजन एवं भक्तों ने मिलकर विचार किया कि जब श्री देव की विद्यमानता नहीं रहेगी तब हमारा तथा हमारी पीढ़ी की क्या दशा होगी। गुरुदेव ने यह फरमाया कि आप सभी मिलकर बैठो और जुमला यानि सत्संग करो, इसी जागरण की परंपरा को करोड़ों लोग पूजा करेंगे, अर्थात् अपने जीवन में अपनाकर अपने कर्त्तव्य कर्म का निर्धारण करेंगे ।२।
दिल म्हां दुसमण पाल, तो जुल जुमलै आवियो ।३।
हे मोमण ! जुमलै में अवश्य ही आओ, आते समय साथ में अपने दुश्मनों को साथ लेकर न आयें, ये पूर्वाग्रह, इर्ष्या अहंकार आदि को छोड़कर ही आयें। तभी आने का लाभ होगा ।३।
मोमणो मेल्हो मन की भ्रान्त, कुफर चुकावियो ।४।
हे मोमणों ! मन की भ्रांति यहां आकर मिटा दीजिये, तभी यहां आना सफल होगा ।४।
पांचे करोड़ै गुरु पहलाद, मुखी रे कहावियो ।५।
आगे बतला रहे है कि इसी सत्संग के प्रभाव से प्रहलाद जी ने अपनी प्रजा संगी साथियों का उद्धार किया था जो पांच करोड़ थे ।५।
साते करोड़े हरिचन्द राव, आच्छो करण कमावियो ।६।
सात करोड़ को लेकर हरिश्चन्द्र भवसागर से पार उतर गये क्योंकि उन्होनें तथा उनकी प्रजा नें सत्य का पालन किया था, संत पुरूषों की संगति की थी ।६।
नवे करोड़े दहुठल राव, सुरग सिधावियो ।७।
इसी प्रकार से नौ करोड़ के मुख्य प्रधान राजा युधिष्ठिर हुए। जो अपनी प्रजा को लेकर पार पहुंच गये ।७।
इब के बारे गुरु जम्भ देव, कलि मां आवियो ।८।
इस बार स्वयं विष्णु ही जाम्भोजी के रूप में यहां पर आये है, इस कलयुग में अवतार लेकर प्रहलाद के बिछुड़े हुए साथियों को अवश्य ही मिलायेंगे। ऐसी गुरुदेव की प्रतिज्ञा है ।८।
आयो गुरु लियो छै पिछाण, भलो हुवै लो भावियो ।९।
गुरु आये है सभी का पिछाण भी करेंगे तथा सभी का भला भी करेंगे ।९।
सम्भराथल लियो मेल्हाण, तखत रचावियो ।१०।
इस समय सम्भराथल पर आकर विराजमान हुए है। यदि कोई मिलना चाहे तो अवश्य ही भेंट करें ।१०।
कुपातर से अलगा टाल, सुपह रे बतावियो ।११।
गुरुदेव सुपात्र एवं कुपात्र का निर्णय करके जो सुपात्र है उन्हें तो कृपा करके मार्ग बताकर पार उतारते है। किन्तु कुपात्र को तो दूर से ही हटा देते है क्योंकि शैतान की कुबधा ही खेती ।११।
सासतर वेद विचार, उतम पंथ चलावियो ।१२।
गुरुदेव ने शास्त्र वेदों का विचार करके तथा वर्तमान की लोक परिस्थिति देखकर समयानुसार उतम पन्थ चलाया था ।१२।
गुरु म्हारो बैठो खेवट तांण, अबूझ बूझावियो ।१३।
हमारे गुरुदेव इस समय नौका तैयार करके बैठे हुए है, जो कोई भी नौका पर सवार हो जायेगा उसे तो निश्चित ही भवसार से पार उतार देंगे तथा जो अबूझ अज्ञानी है उसके अज्ञान को नष्ट कर देंगे ।१३।
गुरु म्हारे फेरयो सांभल ज्ञान, सुपह बतावियो ।१४।
हमारे गुरु ने ज्ञान का डंका बजा दिया है, सुमार्ग बता दिया है, इस समय भी यदि कोई सचेत न हो सका तो फिर सदैव सोता ही रहेगा ।१४।
गुरु म्हारै अमला रा मलिया मांण, अनु नवावियो ।१५।
जो अमली लोग थे अर्थात् नसेड़ी अहंकारी आदि, उनके अहंकार को मिटा दिया। जो कभी किसी के सामने नमन करना झुकना नहीं जानते थे, उन्हीं लोगों के अहंकार को मिटा दिया ।१५।
पहलादा सूं कोल संभाल, वाचा पालण आवियो ।१६।
गुरुदेव का यहां मरूभूमि में आने का यही प्रयोजन था, क्योंकि प्रहलाद से वचन सतयुग में किया, उसी वचन को पालने के लिये अपनी प्रतिज्ञा निभाने के लिये यहां आये है- 'प्रहलाद सूं वाचा कीवी, आयो बारां काजै' ।१६।
जांरा देवजी सारेला काज, गुरु जम्भ ध्यावियो ।१७।
देवजी उस सज्जन के कार्य तो अवश्य ही पूर्ण कर देंगे जिसने देवजी का ध्यान मनन तथा श्रवण किया है। जब तुम स्वयं अपने आप पर कृपा करोगे, शुभ कार्य में प्रवृत होंगे तो परमात्मा भी आपकी सहायता अवश्य ही करेंगे ।१७।
जे ध्यायो जम्भेश्वर देव, तां फल पावियो ।१८।
जिसने भी श्रीदेव जाम्भेश्वर जी का ध्यान किया उसने फल अवश्य ही प्राप्त किया है, ऐसी कवि की पक्की धारणा है। कर्म का फल तो ध्रुव सत्य है ।१८।