झूमखो राग मल्हार-13
मेरा लाल नै, ऐसो हरजी रो झूमखो, पांचूं परमल भारी । ए पांचूं जे बस करै, साइ पतिवरता नारी
कवि: आसनोजी
कवि परिचय — आसनोजी
विक्रम संवत् 1500-1600 के मध्य है ये महलाणा गांव के सोढ़ा जाति के भाट थे। जाम्भेश्वर जी के धर्म नियम से प्रभावित होकर शिष्य बन गये थे। ये गायन विद्या में प्रवीण थे। जाम्भोजी ने यह कार्य भी उन्हें सौंपा भी था। कालान्तर में बही लिखने का कार्य भी करने लगे थे। अभी भी इनके वंशज महलाना में यह कार्य कर रहे है। लूर में इनका नाम आता है। हरजस के अन्तर्गत इनका गाया हुआ मल्हार राग में एक झूमखो है जो फूलों का एक गुलदस्ता है वह गुरुदेव को समर्पित किया है। कवि के पास गुरु को समर्पित करने को और सबसे बड़ा उपहार क्या हो सकता है।
मेरा लाल नै, ऐसो हरजी रो झूमखो, पांचूं परमल भारी । ए पांचूं जे बस करै, साइ पतिवरता नारी ।१।
इस शरीर में रहनें वाला जीवात्मा ही मेरा लाल है। इस बात को मन बुद्धि कहती है क्योंकि इनके लिये तो जीवात्मा से बढ़कर और कोई प्रिय लालन-पालन करने के योग्य नहीं है। इस लाल का हरिजी ने यह पंच तत्व का दिव्य मानव शरीर दिया है। यहां पर यह शरीर ही रंग बिरंगे फूलों का झूमखा-गुच्छा है, इस शरीर रूपी झूमखे में पांच पुष्प यानि पांच ज्ञानेन्द्रिय है। जो सुवास अर्थात् ज्ञान ग्रहण करती है। आगे कवि कहता है कि इन पांच ज्ञानेन्द्रियों को जो वश में करले वही पतिव्रता स्त्री है। अर्थात् वही जीवात्मा परमात्मा का प्रिय भक्त है। जीव और ईश्वर पत्नी तथा पति के रूप में कहे है ।१।
इव गुणवंती कामणी, निगणो मेरो नांह । एकणी वास वसंतड़ा, अब क्यों मेल्हयौ जाय ।२।
यह जीव तो गुणों वाला है अर्थात् इस जीव रूपी स्त्री के तो सत्व रज और तम ये तीनों गुण सदा ही रहते है परन्तु वह परमात्मा पतिदेव तो निर्गुण है। निर्गुण और सगुण का मेल कैसे होगा, कभी दोनों एक भी हो जाते है अभ्यास द्वारा, किन्तु जब भी अभ्यास खंडित होता है तो पुनः अलग हो जाते है। कवि कहता है कि ऐसी वियोग अवस्था जीव रूपी पत्नी के लिये असह्य ही है। प्रथम रस का पान किया, अब उसे कैसे त्यागा जा सकता है, इसलिये मिलने की इच्छा बनी रहती है ।२।
धण पुराणी जीव नुवो, निति उठि झगड़ो होय । धण पिछाणै पीव नै, आवागुवण न होय ।३।
पत्नी रूप जीव तो पुराना है और पति परमेश्वर सदा नया ही है, अर्थात् हमारा इस जीव से तो परिचय जन्म जन्मान्तरों का है परन्तु परमेश्वर का परिचय तो इस मानव देह में आने से ही हुआ है। इसलिये परिचय नया है तथा नया होने से स्थायी नहीं हो पा रहा है। उसे स्थायी टिकाऊ बनाने के लिये नित्य प्रति भजन, उपासना करते है, अर्थात् उसी से ही झगड़ा करते है। यह कार्य नित्य प्रति संध्या समय में तो अवश्य ही होता है। कवि कहता है कि जो पत्नी यदि पति को पहचान ले, अर्थात् जीव ईश्वर को ठीक प्रकार से जानकर अनुभव कर ले तो फिर कभी बिछुड़ना नहीं होगा, अर्थात् जन्म मृत्यु के चक्कर से छूट जायेगा ।३।
पाल पुराणी जल नुवों, हंसा केल कराय । बालापण की प्रीतड़ी, चुण-चुण हरि चुगाय ।४।
तालाब तो पुराना है और उसमें आया हुआ जल नया है, उसमें हंस क्रीड़ा कर रहे है, हंस इसी तालाब पर ही क्यों आया क्योंकि इसे बाल्यावस्था से ही प्रेम है। यहां पर आकर केवल मोती रूपी हरि नाम को चुगता है, अर्थात् यह जीवात्मा तो प्राचीन है किन्तु यह शरीर नया है। इस नये शरीर में यह जीव रूपी हंस क्रीड़ा कर रहा है, इस शरीर से ही प्रेम हो गया है क्योंकि जब से सृष्टि रची गयी थी उस प्रथम अवस्था से ही इस मानव शरीर से इस जीव को सदा ही प्रेम से लगाव रहा है, क्योंकि हंस को मोती सदृश ज्ञान आनन्द की प्राप्ति इस शरीर से ही होती है, अन्य शरीरों से दुर्लभ है ।४।
गिगन मण्डल मां कोठड़ी, घुरै दमांमा घोर । मन मधकर सूं मिल रह्यो, छेद्या कर्म कठोर ।५।
दसवें द्वार त्रिकुटि को गगन मण्डल कहा है, वहां पर अनहद नाद रूपी अनेकों बाजे बज रहे हैं। सप्त स्वरों की झणकार वहां सुनी जा सकती है। उस स्थान को एक कोठड़ी कहा है। उसी कोठड़ी यानि त्रिकुटि में यह चंचल मन जा कर ठहर गया है। उन्हीं बाजों की मधुर ध्वनि सुनने में मस्त हो गया है। समाधी को प्राप्त होकर शांत हो गया है। उसे आनन्द की लहरों से शांति मिल चुकी है, ऐसी अवस्था आने से सभी कर्म फल कट जाते है, कहा भी है- 'ज्ञानाग्नि सर्व कर्माणी भस्मसात् कुरूते अर्जुन' ।५।
बंक नाल नीझर झरै, अमर मरे नहीं जीव । पलटि जोगणि जोगी हुवै, सुन्य महारस पीव ।६।
वहां त्रिकुटि में तीन नदियों का संगम है, यथा गंगा, यमुना, सरस्वती या इडा, पिंगला तथा सुषुम्ना कही गयी है। इनमें प्राण जब सुषुम्ना में चला जाता है तो मन स्थिर हो जाता है और उसी सुषुम्ना यानि बंकनाल से अमृत का स्राव प्रारम्भ हो जाता है। यह मन वहीं बैठकर अमृत पान करता है और अपने सुख का अंदेशा जीवात्मा तक पहुंचा देता है, वही आनन्द एवं अमृत पान की स्थिति है, ऐसी अवस्था में पहुंचकर जीव अजर अमर हो जाता है। पहले तो यह जीव जोगणी था, अर्थात् पत्नी के रूप में था किन्तु अब अमृत पान करके यह भी योगी पुरूष बन जाता है, अर्थात् अपने पति परमेश्वर के सदृश ही सत्चित आनन्द रूप हो जाता है क्योंकि इसने भी तो शून्य से अमृत रस का पान कर लिया है और अमर हो गया है ।६।
गंग जमन सुरसती, त्रिवेणी तटि असनान । चंद सूरजि अंतरै, अठसठि तीरथ थान ।७।
गंगा यमुना सरस्वती इन तीनों के मिलान को ही त्रिवेणी कहा जाता है, इस त्रिवेणी के तट पर स्नान सुलभ हो जाता है। जिसने भी महा अमृत का पान योग अभ्यास द्वारा किया है, वह सदा ही स्नान करता है। सूर्य चन्द्र भी उसके लिये आकाश में दूरस्थ होते हुए अति निकट हो जाते है, अर्थात् सूर्य चन्द्र भी उसके लिये सहायक सिद्ध होते है तथा अड़सठ तीर्थ भी उसके लिये वहीं पर ही आ जाते है। उसे कहीं भी भटकने की आवश्यकता नहीं होती, अर्थात् संसार में उसके लिये अप्राप्य कुछ भी नहीं होता ।७।
कणि ओ झूबखो गावियो, किण अह किया बखांण । जा घटि अंणभै उपजै, जाका अह इहनाण ।८।
कवि कहता है कि झूमखा किसने गाया है और कौन इसकी व्याख्या करता है। स्वयं उतर भी देते है कि जिसके हृदय में इस अमृत पान का अनुभव हुआ है वही तो गा सकता है और व्याख्यान भी कर सकता है। जिसके हृदय में अनुभव हुआ है उनकी यह पहचान है कि वह गा भी सकता है और दूसरों को समझा भी सकता है। कवि का दावा है कि यह झूमखा बिना अनुभव के नहीं कहा जा सकता ।८।
अरध उरध वसेर हो, भंवर गुफा एक ठांव । पांच पचीसूं वसि करे, संभू जांको नांव ।९।
पंच महाभूत आकाश, वायु, तेज, जल और धरणी इन्हीं से शरीर की रचना होती है, ये ही पांचों इस शरीर में ओत-प्रोत है। कवि कहता है कि एक भंवर गुफा स्थान है जहां भंवरा यानि जीवात्मा रहता है। वह उस गुफा में बड़ी ही युक्ति से रहता है, वह स्थान हृदय ही हो सकता है। कहा भी है- 'ईश्वर सर्व भूतानां हृद् देशे अर्जुन तिष्ठति', हृदय नांव विष्णु को जंपो। उस गुफा के ऊपर नीचे इन्हीं पांच तत्वों का बसेरा है। कवि कहता है कि जो साधक इन पांच तत्व एवं इनकी पच्चीस प्रकृतियों को स्वभावों को वश में कर लेता है वह स्वयंभू ही हो जाता है। जीव ईश्वर की एकता हो जाती है ।९।
अगम निगम जहां गम नहीं, वरन विवरजत दीठ । आसानन्द ऐसी कहै, पीयो अमीरस मीठ ।१०।
जहां तक वेद शास्त्र आदि की पहुंच नहीं है। ये तो इधर ही व्यवहारिक ज्ञान तक ही सीमित है। क्योंकि न तो उसके कोई रूप रंग गुण धर्म ही है जो दृष्टि गोचर हो सके, कहा भी है- 'वर्ण विवरजत', कवि आसानन्द कहते है कि ऐसा दिव्य अगोचर परमात्मा का स्वरूप ही अमृत रस है तथा बड़ा ही मधुर है, उसे अवश्य ही पान करो। अमृत पान से तुम्हारा जीवन धन्य हो जायेगा ।१०।