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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह12 / 156

साखी-12 'छन्दा की'

सो दिन लिख दे रे जोयसी, हंसराय करै पयाणों ।

कवि: लालचन्द नाई

कवि परिचय — लालचन्द नाई

जन्म विक्रम संवत् 1580 अनुमानतः है ये बीकानेर के किसी गांव के है। लूर में इनका नाम आता है इसलिये हजूरी कवि होना प्रमाणित होता है। इनकी एक साखी छंदा की मिलती है जो राग गवड़ी में गेय है। इस साखी के प्रसंग में ऐसा कहा जाता है कि किसी प्रसिद्ध ज्योतिषी द्वारा लोगों के भविष्य ग्रहों का प्रभाव बताते देखकर कवि ने यह साखी उसको लक्ष्य करके कही थी।

सो दिन लिख दे रे जोयसी, हंसराय करै पयाणों । धंधो अधिक निवारिये, सब जुग होय बिडाणों । जग बिडाणों मन पछताणों, विसन-विसन ध्याइये । पुण्य मार्ग धर्म क्रिया, दियो सोई पाइये । सुकरत पाछो लाछ लिछमी, संग कछु न होयसी । जां दिन हंस करै पयाणों, सो दिन लिखदे जोयसी ।१।

हे ज्योतिषी ! यदि तूं भविष्य की बात बतलाता है तो वह दिन बतला दे जिस दिन यह जीव रूपी हंस यह शरीर छोड़कर यहां से प्रस्थान करेगा। यदि नहीं बतला सकता तो फिर क्यों पाखण्ड करता है। कोई भी बतला भी कैसे सकता है क्योंकि मृत्यु का कुछ भी समय निश्चित नहीं है। यदि मृत्यु से पूर्व ही पता लग जाये तो काम धन्धे बहुत ही ज्यादा है उन्हें निपटाया जा सकता है। अथवा कार्य अधिक होने से इस हंस को रोका भी जा सकता है किन्तु इस जगत को ऐसा दण्ड दिया गया कि अब तक किसी को स्थिर नहीं रहने दिया गया है। अनेक-अनेक चलता दीठा, कलि का माणस कौन बिचारूं' यह जगत बिछुड़ जायेगा। मन में तो केवल पछतावा ही रह जायेगा, इसलिये हे ज्योतिषी ! विष्णु-विष्णु इस मन्त्र का जप करते हुए परमात्मा का ध्यान कर, पुण्य का मार्ग एवं धार्मिक क्रिया तथा कुछ दिया हुआ दान ये ही सुकृत है, इन्हीं का सुमधुर फल मिलेगा। पुण्य कर्म तो किया नहीं परन्तु पाप कर्म के द्वारा अर्जित की गयी धन माया, स्त्री आदि साथ में कुछ भी नहीं जायेगा, हे जोयसी ! वह दिन लिख दे, जिस दिन यह हंस राजा इस शरीर से निकल करके प्रस्थान करेगा ।१।

तिल तिल घड़ी महूरता, सोई दिन नेड़ो आवै । इणि कलि बहुला पंडिता, सो दिन कोई न बतावै । दिन न बतावै जद लैण आवै, जब जीव संकट पड़े । राव राणा खान खोजां, तास सूं कोई न अड़े । पकड़ गुन्ही ज्यूं चलावै, ता दिन कुण छुड़ावसी । तिल तिल घड़ि महूरतां, सो दिन नेड़ो आवसी ।२।

क्षण-प्रहर, दिन-रात, पक्ष-मास, वर्ष इस प्रकार से समय व्यतीत होता जा रहा है। मृत्यु नजदीक आ रही है। इस कलयुग में बहुत से पण्डित है किन्तु वह मृत्यु का दिन निश्चित रूप से कोई भी नहीं बता पा रहा है। यह आश्चर्य ही है। जब लेने के लिये यम के दूत आते है तो यह बेचारा जीव महा संकट में पड़ जाता है। यदि दिन निश्चित हो तो कुछ उपाय किया जा सके परन्तु कोई बतानें वाला भी नहीं है। इस दुनियां में बड़े-बड़े शूरवीर राजा है, खान है, खोजी है, पंडित विद्वान है किन्तु मृत्यु के सामने कोई भी नहीं लड़ सकता है, सभी हार मान लेते है। यम के दूत इस जीव को पकड़कर अपराधी की भांति हाथ में बेड़ियां डालकर जबरदस्ती आगे करके पैदल ही चलाते है, कवि कहता है कि इस भारी कष्ट से कौन छुड़ा सकता है। इसलिये हे मानव ! सावधान हो जा, वह दिन तिल-तिल, क्षण-क्षण व्यतीत होता हुआ नजदीक आ रहा है ।२।

नख चख सूं जीव नीसरे, तां दिन को डर भारी । नाणों किण रो सैणों, छोड़ चाल्या कुड़ी प्यारी । कुड़ी प्यारी हंस छोड़ चाल्यो, हेत हुरमत सब गई । नितवार चंदण खोल करतो, छिन एक में गंदी भई । परहरो माया लाछ लिछमी, पूत प्रीतम नारियां । नख चख सूं जीव नीसरे, तां दिन को डर भारीयां ।३।

जब वह जीवात्मा शरीर से बाहर निकलेगा तो इसके बाहर निकलने के नौ दरवाजे हैं। नेत्र, कान आदि न जाने किस दरवाजे से बाहर निकलेगा, उस दिन का डर भारी है। जैसा हम इस जीव से प्यार करते है, अपनें शरीर और जीव का गहरा सम्बन्ध स्थापित करते आ रहे है। वैसा यह जीव शरीर कुटुम्ब परिवार को अपना बन्धु नहीं मानता, इसलिये यह शरीर आदि कुटुम्ब को छोड़कर चला जाता है। पूर्व का प्रेम प्यार लालन-पालन सभी कुछ धरा ही रह जाता है। झटिति छूट जाता है। इस शरीर पर नित्य प्रति चंदन तेल फुलेल लगाता था, इसे बड़े सलीके से सजा संवारकर रखता था किन्तु यह जीव जब चला गया तो वही देह गंदी बदबूदार हो गयी, यह कार्य एक क्षण में ही हो गया। इसलिये हे मानव ! यह जो बाह्य चाकचिक्य दौलत पुत्र परिवार ये सभी धोखा देने वाले है, एक दिन छूट जायेंगे, अतः इनसे लगाव मत रखो। जिस दिन नख-चख आदि दरवाजों से निकलेगा, उस दिन का भारी डर है ।३।

फंद पड़यो जम दूत को, तब मूरखों पछताणों । सांई जी रो सुमरण ना कियो, बूझत ही सकुचाणों । सकुचाय जीव नै जबाब न आवै, कहो किस विध छूटिये। तेरा संग साथी नहीं कोई, गयो जम पूर ही कूटिये। देख माया गरब करतो, सीस मुकुट मोती जड़े, कह लालचन्द पछताण लागां, जमदूत के पानै पड़े ।४।

फिर क्या हो सकता है, जो कार्य पहले होने वाला था अब न हो सकेगा। जीव को आगे ले जाकर धर्म कर्म के बारे में पूछा जायेगा तो फिर वहां कुछ भी जवाब नहीं दे सकेगा, मुख से जबान नहीं निकलेगी, संकुचित हो जायेगा। इस शरीर के छूट जाने पर भी आगे सूक्ष्म शरीर जीवात्मा सहित जाता है क्योंकि परमात्मा का स्मरण तो किया नहीं, अब दुःखों से कौन छुड़ा सकता है। वहां संकुचित हुआ जीव जवाब नहीं दे सकेगा, वहां पर पूछा जायेगा कि कहिये अब कैसे छूटोगे, यहां पर तो तेरे संग साथी कोई नहीं है। वहां मृत्यु लोक में थे वे छुड़ा देते किन्तु अब यहां कोई नहीं है, पीछे ही रह गये है। यहां तो जबरदस्ती मार पड़ेगी। वहां संसार में तो धन माया को देखकर अहंकार करता था, अपने सामने किसी को कुछ भी नहीं समझता था। तेरे सिर पर स्वर्ण मुकुट था, जिसमें अनेकों मोती जड़े हुए थे किन्तु अब वहां से सभी कुछ कहां गये, साथ में लेकर क्यों नहीं आये। कवि लालचन्द कहते है कि अब तो जीव वहां यमपुरी में पछताने लगा क्योंकि कठोर भयावने यमदूतों के हाथ चढ़ गया था, अब कोई भी उपाय छूटने का नहीं था ।४।