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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह11 / 156

साखी कणां की-11

आवो मिलो जुमलै जुलो, सिंवरो सिरजणहार

कवि: केशोजी देहडू

कवि परिचय — केशोजी देहडू

जीवन काल 1500-1580 अनुमानित है ये हजूरी कवि केशोजी थे। इनकी मात्र एक ही साखी मिलती है। राग सुहब में गेय कणां की साखी है। इसे जुमलै की तीसरी साखी के रूप में मान्यता प्राप्त है।

आवो मिलो जुमलै जुलो, सिंवरो सिरजणहार ।१।

जन साधारण को सम्बोधित करते हुए केशोजी कह रहे है कि आओ मिलकर जुमले में बैठो और ज्ञान श्रवण करो तथा सिरजनहार भगवान विष्णु का स्मरण करो ।१।

सतगुरू सतपन्थ चालिया, खरतर खण्डाधार ।२।

सतगुरु जाम्भोजी ने यह बिश्नोई सतपंथ चलाया है। इस मार्ग पर चलो तो अवश्य ही मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी किन्तु इस पन्थ पर चलना कठिन अवश्य ही है, जिस प्रकार तरवार की धार पर चलना कष्ट साध्य है उसी प्रकार इस पंथ पर चलना भी है। कहा भी है- 'क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्या' धर्म के मार्ग पर चलना तो छुरे की धार पर चलना है, प्रारम्भ में कठिनता तो होगी तो उसका फल बड़ा ही मधुर होगा इसलिये कठिन होते हुए भी त्याज्य नहीं है किन्तु ग्राह्य है ।२।

जम्भेश्वर जिभिया जपो, भीतर छोड़ विकार ।३।

जाम्भेश्वर भगवान विष्णु का जप जिभ्या द्वारा जपो, 'यज्जपस्तदर्थ भावनम्' जप के साथ ही जिसका जप किया जाता है उसका ध्यान भी करना चाहिये। तभी वह जप कहलाता है। भीतर के विकार काम-क्रोधादि का त्याग करे तभी जप सफल होगा ।३।

सम्पति सिरजणहार की, विधिसूं सुणो विचार ।४।

यह धन दौलत की संपति जिसे अपना मान रखा है वास्तव में यह सिरजनहार भगवान विष्णु की ही है। उन्होनें ही प्रदान की है, उन्हीं की ही निजी संपति है। हम क्यों व्यर्थ में ही झूठे मालिक बनकर अभिमान करें, यह बात विचार करने योग्य है ।४।

अवसर ढील न कीजिये, भले न लाभे वार ।५।

यह मानव जीवन एक अवसर मिला है कुछ करने के लिये, बन्धन से छूटने के लिये, यदि इस बार भी ढील दे दी गयी तो फिर बार-बार यह मानव देह रूपी अवसर नहीं मिलेगा ।५।

जमराजा वांसे वहै, तलबी कियो तैयार ।६।

यमराज वहां से अपने स्थान से तुम्हें लेने के लिये चल पड़े है, पीछे तलब हिसाब किताब लेने वाले अपने चित्र गुप्त को तैयार करके आ रहे है, वहां तो किसी प्रकार की ढील नहीं है किन्तु तुम्हारी तरफ से ढील चल रही है। तुम जाने के लिये अब तक तैयार नहीं हुए हो। अर्थात् मृत्यु सदा ही ले जाने के लिये तैयार खड़ी है, जब भी अवसर मिलेगा तभी ले जायेगी, इसलिये इस जीवन का विश्वास करना ही बहुत बड़ा धोखा है ।६।

चहरी वस्तु न चाखिये, उर पर तज अहंकार ।७।

चहरी अखाद्य वस्तु जैसे मांस मदिरा आदि एवं अपवित्र भोजन जलादि ग्रहण नहीं करना चाहिये। उसे तो हृदय से घृणा करके परित्याग देना ही ठीक है, अन्यथा मन बुद्धि शरीर सभी को नष्ट कर देगा ।७।

बाड़े हूंता बीछड़ा जांरी, सतगुरू करसी सार ।८।

सेरी सिवरण प्राणियां, अन्तर बड़ो अधार ।९।

प्रहलाद के बाड़े के बिछुड़े हुए जीवों की सतगुरु अवश्य ही सहायता करेंगे, तुम्हें गुरुदेव के जुमलै में सम्मिलित होने की आवश्यकता है। हे प्राणी ! तूं मानव देह में आया है। इस देह को प्राप्त करके भगवान विष्णु का स्मरण मनसा, वाचा, कर्मणा द्वारा करें। यदि इस देह के द्वारा परमात्मा को याद नहीं किया और यह शरीर जर्जरित होकर नष्ट हो गया तो फिर आगे तेरी क्या दशा होगी। इस जीवात्मा को बैठने के लिये कोई शरीर तो चाहिये, वह तो तुझे यह मानव देह का तो नहीं मिलेगा। इससे तो तूं बहुत ही दूर चला जायेगा, अन्य भले ही निकृष्ट योनी का शरीर मिले ।९।

पर निन्दा पापां सीरे, भूल उठावै मार ।१०।

परलै होसी पाप सूं, मूरख सहसी भार ।११।

परायी निन्दा करना शिरोमणी पाप है। इसलिये जो भी पराई निंदा अनहोनी बात जो किसी को नीचा दिखाये ऐसी वार्ता करके अपने को महान सिद्ध करता है तो वह समझो दुनियां के पाप का भार अपने कन्धे पर उठाये हुए, कितने दिनों तक चलेगा। एक दिन प्रलय को प्राप्त हो जायेगा। मृत्यु का ग्रास बन जायेगा, तब मूर्ख यमदूतों की मार सहन करेगा ।११।

पाछै ही पछतावसी, पापां तणी पहार ।१२।

पीछे बहुत ही पछतायेगा, अपने कुकर्मों के लिये रोयेगा किन्तु फिर क्या हो सकता है, समय बीत जाने पर फिर पीछे पछतावा ही तो रहता है ।१२।

ओगण गारो आदमी, इला रै उर भार ।१३।

अवगुणों से भरा हुआ आदमी इस धरती पर भार है। यह धरती, वृक्ष, पहाड़, नदी, नाले, पशु, पक्षी से भार नहीं मरती किन्तु दुष्ट पापी के भार से दब जाती है। तभी भार उतारने के लिये स्वयं विष्णु ही सम्भराथल पर आये है ।१३।

कह केशो करणी करो, पावो मोख द्वार ।१४।

कवि केशोजी कहते है कि कर्त्तव्य कर्म करोगे तो मुक्ति का द्वार खुलेगा अन्यथा तो दुख नरक का द्वार तो खुला ही पड़ा है ।१४।