कवि परिचय — जोधो रायक
इनका जीवन काल 1500-1570 मध्य अनुमानित है। ये हजूरी कवि थे। ये संभवतः रायक जाति से सम्बन्धित रहे होंगे। इन्होनें अपने गुरु भाईयों से जुमलै में आने का आह्वान किया है। जहां गुरुदेव विराजमान है। राग हंसो में गेय 17 पंक्तियों की एक साखी इनकी यह प्राप्त है।
सार हंस राजा हो जी, बैठो तखत रचाय ।१।
हे देव ! आप तो सार रूप हंस राजा हो, जिस प्रकार पक्षियों का सर्वश्रेष्ठ राजा हंस होता है। उसी प्रकार आप भी तो मनुष्यों का राजा हो। इसलिये आप यही संभरा नगरी पर ही तखत आसन लगाकर बैठो जी ।१।
गुण बेलड़ियां हो जी, तुम कित बसियां रात ।२।
हे देव ! आप तो गुणों की बेलड़ियां हो जी, जिस प्रकार नागर बेल दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ती है और सुवासित करने वाली है उसी प्रकार आप भी तो आगन्तुक मोमणों को आनन्दित करते हो। आपका यश भी उतरोतर बढ़ता ही जा रहा है। आप इतने दिनों तक कहां रहे। आपके बिना तो यहां मानो दिन भी रात्रि जैसा ही था ।२।
हम वासो वसियो हो जी, खालक के दरबार ।३।
हमें काम पड़यो हो जी, मोमण था शुचियार ।४।
हमनें तो खालक परमात्मा के दरबार में ही रात्रि में निवास किया है। हमारा अन्य कुछ भी कार्य यहां आने का नहीं था। हम तो उस परमात्मा के भक्त बनकर शरण ग्रहण करने के लिये यहां आये है ।४।
मोमण आवैला हो जी, कर कुरज्यां ज्यों डार ।५।
अन्य भी भक्त अवश्य ही आयेंगे, जिस प्रकार कुरज पक्षी पंक्ति बनाकर एक स्वर में मधुर गाना करती हुई उड़ती है उसी प्रकार प्रिय भक्त भी एक पंक्ति बनाकर सुमधुर करूणामय गायन करते हुए आयेंगे जी ।५।
मोमण मिलैला हो जी, लांबी-लांबी बांह पसार ।६।
यहां सम्भराथल पर आकर मोमण आपस में एक-दूसरे का आलिंगन लंबी-लंबी भुजाएँ फैलाकर करेंगे। उस समय उनका प्रेम देखते ही बनेगा ।६।
मोमण बैसेला हो जी, हंसा रै उणियार ।७।
तथा भक्तजन यहां सम्भराथल पर देव दर्शनार्थ आयेंगे, जिस प्रकार हंस मान सरोवर पर आते है और बैठे हुए शोभायमान होते है उसी प्रकार भक्त भी इस सम्भराथल पर शोभायमान होंगे ।७।
मोमण बोलैला हो जी, कर मोरा जां झिंगार ।८।
यहां पर बैठकर शब्दोच्चारण करेंगे जिस प्रकार मयुर बोलते है। सभी भक्त तेजस्वी है उनकी ध्वनि भी उच्चस्वर एवं मधुर है ।८।
भुंय लाधी छै हो जी, जे कण ल्योह निपाय ।९।
इस समय ज्ञानी भक्तों को सुधरी हुई धरती का खेत मिल गया है, इसमें अपनी इच्छानुसार कण तत्व की उपज कर सकेंगे अर्थात् सतगुरु की प्राप्ति हो चुकी है इसलिये अब तत्व की प्राप्ति कर लेंगे ।९।
कण चुणि चुण्य ल्यो हो जी, राच्यो न रहो संसार ।१०।
हे भक्तों ! अब ज्ञान रूपी कण इधर-उधर बिखर रहा है इसलिये चुन करके एकत्रित कर लो। जीवन में ज्ञान को स्थान दो, केवल संसार की मोह माया में ही अटके मत रहो ।१०।
राजा कर्ण भलो थो हो जी, कंचन को दातार ।११।
राजा विदुर भलो थो हो जो, साहेब को शुचियार ।१२।
राजा कर्ण अच्छा दानी था जिन्होनें स्वर्ण का ही दान दिया तथा विदुर भी वैसा ही महादानी था जो साहब भगवान का प्रिय भक्त तथा बड़ा ही पवित्रात्मा था ।१२।
जीवड़ा के काजे हो जी, राजा हरिचंद बेची नार ।१३।
अपने जीव की भलाई के लिये सत्य का पालन करते हुए हरिश्चन्द्र ने अपनी प्रिया भार्या को ही बेच डाला था ।१३।
पांचूं पाण्डु भला था हो जी, धन्य कुंता दे माय ।१४।
इसी प्रकार से पांच पाण्डव भी बहुत ही उच्चकोटि के महापुरूष हुए तथा उनकी माता कुन्ती को भी बार-बार धन्य है जिन्होनें ऐसे पुत्र रत्न पैदा किये तथा उन्हें संस्कारित करके योग्य बनाया ।१४।
ढहि वृक्ष पड़ैला हो जी, धरण सहै भूंय भार ।१५।
जिस प्रकार वृक्ष सूख जाता है तो धरती में ही विलीन हो जाता है, उसी प्रकार से यह शरीर भी अन्त में धरती में ही मिल जाता है ।१५।
जमला जागैला हो जी, कांसी के झणकार ।१६।
शरीर गिर पड़ेगा तो यमदूत भी जग जायेंगे, सचेत हो जायेंगे और जीव को पकड़कर ले जायेंगे। जीव भी जिस प्रकार से कांसी की आवाज कांसी में ही समा जाती है और चोट करने पर प्रगट होती है, उसी प्रकार जीव का भी आवागमन होता है। कहा भी है- 'कंसे शब्दे कंस लुकाई, बाहर गयी न रीऊं'।
जोधो रायक बोलै हो जी, कलि दसवै अवतार ।१७।
जोधोजी रायक कहते है कि सम्भराथल पर इस समय कलयुग में यह दसवां अवतार हुआ है।