कवि परिचय — अभियादीन
जन्म संवत् 1500-1570 के मध्य जीवन काल अनुमानित है। ये नागौर के गृहस्थ मुसलमान थे। जाम्भेश्वर जी की वाणी तथा सिद्धि नियम धर्म से प्रभावित होकर शिष्यत्व स्वीकार किया था। इनकी रचना 14 पंक्तियों की कणां की एक साखी मिली है जो स्वयं को पहचानने की चेतावनी देती है।
दीन मीठो मैवो, जुग करि देखो खारो ।१।
सत्चित आनन्द रूप परमेश्वर ही मीठा मेवा है। परमात्मा के अतिरिक्त तो सम्पूर्ण संसार ही कड़वा है। इस जगत में राग द्वेष सुख दुःख इर्ष्या आदि भरे हुए कड़वाहट के तालाब ही है ।१।
ग्यान इम्रत मेवौ, मोमणां नै दीन पियारो ।२।
सद्गुरु देव से प्राप्त ज्ञान ही अमृत का मेवा है। उस मेवे को छोड़कर ऐसा कौन होगा जो संसार का विषपान करेगा। भक्त लोगों को तो दीन धर्म ही प्यारा है ।२।
झूठ चारी अरू झगड़ो, कहर क्रोध निवारो ।३।
उस अमृत की प्राप्ति के लिये गुरु की शरण ग्रहण करो तथा व्यर्थ का वाद-विवाद झगड़ा कलह क्रोध को छोड़ना होगा ।३।
खोहणी दाणों खीणां, वादो अरू अहंकारो ।४।
छोड़ी मंडप अरू मेड़िया, आयो जुंवर अहंकारो ।५।
इस व्यर्थ की कलह क्रोधादि से तो महाभारत जैसे युद्ध में कई अक्षौहिणी सेना खप गई थी। वे सभी मरने वाले राक्षस ही तो थे क्योंकि वे व्यर्थ के वाद-विवादी और अहंकारी थे। इन्हीं कुकर्मों से वे लोग महल घर बार छोड़कर चले गये जिस राज्य के लिये लड़ रहे थे वही पीछे छूट गया उन लड़ने वालों को मृत्यु पकड़कर ले गई ।५।
दूजा रहण नै रहसी, यो ही गयो संसारो ।६।
जिन्होनें स्वयं अपने रहने के लिये मन्दिर महलों का निर्माण करवाया था किन्तु उन्हीं में अब दूसरे ही लोग रह रहे है। वे तो बेचारे सुख का स्वपन देखते ही चले गये। एक क्षण भी नहीं ठहर सके ।६।
अह बागर बाड़ो, कांय हरियावा चारो ।७।
परायी वस्तु धन या हरे भरे खेत घास को देखकर उस पर मन क्यों ललचाते हो और उसको हड़पने की कोशिश क्यों करते हो। जबरदस्ती करके परायी वस्तु हड़पना यह कहां तक उचित है? ऐसा क्यों करते हो क्या वह वस्तु तुम्हारे साथ जायेगी ।७।
हरिया वै अकेलो, मोमणां नै का पछेयारो ।८।
हो सकता है अभी तो इस कुकर्म कराने में तुम्हारे सहयोगी हो परन्तु यहां से जब रवाना होगा तब सर्वथा अकेला ही जायेगा। समय व्यतीत हो जाने पर फिर भक्तों से प्रेम किया तो भी क्या काम आयेगा ।८।
दूजा कथन कांय मानो, हकीकत कांय निवारो ।९।
परमात्मा विष्णु ने जब समझाया था वह तो तुमने नहीं मानी किन्तु किसी अन्य कुकर्मी जन ने जो बात कही वही स्वीकार की तो तुमने वास्तविक बात को छोड़ दिया ऐसा क्यों किया, ऐसा नहीं करना चाहिये था ।९।
रंग पाह उतर गयो, दुनियां नै रच्यो पसारो ।१०।
उतम संग से चढ़ा हुआ उतम रंग तो कुसंग करने से एक तरह से उतर गया और कुसंग से चढ़े हुए रंग ने पसारा किया है। जिससे पूर्णतया संसारी हो गया है। सचेत नहीं रह सका जिसका फल दुःख के सिवाय और क्या हो सकता है ।१०।
पोह अलगो मेल्हयो, बीच करि गयो अंधियारो ।११।
जो मार्ग पकड़ा था उसे तो छोड़ दिया यदि मार्ग मार्ग जाता तो प्रकाश था अपने गन्तव्य स्थान तक पहुंच जाता परन्तु अब तो बीचोबीच ही लटक गया न आगें जा सका और न ही पीछे वापिस लौट ही सकता बीचोबीच ही अन्धकार में पड़कर अंधा हो चुका है अब क्या उपाय हो सकता है ।११।
से तो वांसे रहिया, जांको तकै छो लारौ ।१२।
जिसका तुमनें सहारा लिया था वे भी पीछे ही रह गये। कमजोर का सहारा कभी सफलता नहीं दिला सकता। जो स्वयं कमजोर है वह दूसरों को शक्ति प्रदान कहां से करें ।१२।
से तो पारि पहुंता, जांह को न थे उभारो ।१३।
इसके विपरीत वे साधु जन जो परमात्मा की शरण ग्रहण की थी वे तो उतम संग से पार पहुंच गये, जन्म मरण के चक्कर से छूट गये क्योंकि उन पर किसी प्रकार का भार नहीं था उन्होनें अपना भार अपने स्वामी को सौंप दिया था ।१३।
दीन अमियां बोलै, उरिन राखो देई पारो ।१४।
हे देव ! मैं अभिया कवि प्रार्थना कर रहा हूं कि मुझे पार उतार देना मैं कहीं बीच में ही न रह जाऊं ऐसे ही कहीं भटक गया तो फिर चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार छा जायेगा।