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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह8 / 156

साखी-8

सांइयां जुग दातार, पांणी सूं पिण्ड करणा

कवि: शिवदास जी

कवि परिचय — शिवदास जी

जन्म संवत् 1500-1570 अनुमानित है। ये जाम्भोजी के शिष्य सदा ही साथ रहने वाले हजूरी कवि थे। इन्होनें एक साखी की रचना की है जो राग सुहब में गेय है।

सांइयां जुग दातार, पांणी सूं पिण्ड करणा ।१।

सम्पूर्ण जगत के रचयिता सांई सभी के स्वामी ईश्वर है। परमात्मा ने ही अनेक भिन्न-भिन्न आकृति के शरीरों की रचना रजवीर्य रूपी जल से की है। ऐसे विचित्र सृष्टि के रचयिता को बार-बार प्रणाम है ।१।

गरभ रह्यो दस मास, दूभर दिन छलणा ।२।

शरीर की रचना होने के पश्चात् वह जीव दस महीने तक गर्भ में ही रहता है। वहीं पर ही फूलता-फलता है, वे दिन जीव के लिये अति कष्टदायक होते है, फिर भी उन्हें पूरा पता तो करना ही पड़ता है ।२।

निंवण निंवै तदि जीव, सांई तो सरणा ।३।

गर्भवास में पड़ा हुआ जीव उस समय अनेकों प्रकार की विनती करता है, हे प्रभु ! अब तो तुम्हारा ही आसरा है। आप ही मेरी रक्षा करने वाले है ।३।

सांइयां बाहिर काढ़, दसबंद तो करणा ।४।

हे सांई ! मुझे अति शीघ्र इस गर्भ रूपी नरक से सुरक्षित बाहर निकालें। संसार में जन्म लेकर अपनी कमाई का दसवां भाग अवश्य ही दान पुण्य में खर्च करूंगा ।४।

जद पूगा नौ मास, बालक अवतरणा ।५।

जब नौ महीने पूर्ण हो जाते है तो बालक जन्म लेता है। संसार की हवा लगती है ।५।

लागो कलि को बाव, वै दिन विसरणा ।६।

उसे कलयुग की हवा लगती है तो गर्भ की बातों के किये हुए वायदे को भूल जाता है। जब प्रथम बार रोता है तो यही संकेत देता है कि वहीं के वायदे वहीं रह गये ।६।

बाजै बिड़द बधाव, कीजै कोड घणा ।७।

बालक का जन्म होता है तो फिर गाना-बजाना उत्साह होता है, बधाइयां बंटनी प्रारम्भ हो जाती है। सभी परिवार के लोग आते है और बहुत ही प्यार करते है ।७।

अरथ गरथ धन माल, दीजै धर सरणा ।८।

उसी प्यार में अपना धरती में गड़ा हुआ धन भी ले आते है और उस बच्चे के निमित सभी कुछ अर्पित कर देते है। जन्म लेने के साथ ही उसे धनवान बना दिया जाता है ।८।

रूड़ी राज कुंवार, इधिका आभरणा ।९।

हमारा राजकुमार बहुत ही सुन्दर है तथा इसे सजाने संवारने के लिये अनेकों स्वर्ण अलंकार भेंट किये जाते है ।९।

सोवण सेज सुख वास, पाटू पाथरणा ।१०।

सोने के लिये सुन्दर सेज पलंग बिछाया जाता है, उस पलंग पर सुन्दर सुकोमल पथरणा आदि बिछाये जाते है ।१०।

चड़ि चालै चक डोल, घोड़ा उदगरणा ।११।

जब बालक कुछ बड़ा हो जाता है तो उसकी सवारी के लिये अच्छे से अच्छा घोड़ा लाकर देते है। राजकुमार घोड़े पर चढ़कर बड़ा ही सुन्दर दिखाई देता है ।११।

जब पूगी जम डांग, गाफिल थर हरणा ।१२।

परवाणा पतिसाह, एदी जम करणा ।१३।

इतने सुन्दर दिखने वाले राजकुमार पर भी यम के दूत दया नहीं दिखाते। एक समय ऐसा भी आता है कि यम के दूतों का झुण्ड वहां पहुंच जाता है, तो फिर गाफिल मूर्ख पापी जन, वह कुमार थर-थर कांपने लगता है। कहा भी है- "थरहर कांपै जीवड़ो डोलै, उत माई पीव कोई न बोलै।" आगे ले जाकर यम के दूत जीव को अपने पातशाह यमराज को सौंप देते है, वहां पर यमराज पीछे की कमाई का हिसाब-किताब देखता है, वहां पर पुण्य का खाता बिल्कुल ही खाली मिलता है। गर्भ के वास में किये हुए वचनों को भी नहीं निभा सका, ऐसे पापी को तो घोर नरक में डाला जाता है ।१३।

सूंक न मांडै हाथ, जालमै देह धरणा ।१४।

आगे कर्मों के अनुसार शरीर प्राप्ति बतलाते हुए कवि कहता है कि यदि जीव किसी बड़े या छोटे पद पर पहुंचकर घूस-रिश्वत के लिये हाथ बढ़ाता है तो उसे भयंकर विशाल हाथी या मगरमच्छ आदि देहों की प्राप्ति होगी, जो कभी पेट भरकर घास चारा आदि नहीं पा सकेगा, सदा भूखा ही रहना पड़ेगा ।१४।

अन पांणी सूं सोच, दांतण क्या करणा ।१५।

या फिर ऐसा शरीर मिलेगा कि कभी भी खाने को नहीं मिलेगा, अथवा शरीर में कोई भयंकर रोग हो जायेगा। पेट में अन्न का कण भी नहीं जा सकेगा। मूंह खोलने की भी नौबत नहीं आयेगी ।१५।

मात-पिता सुत नार, बांधव चार जणां ।१६।

अब आगे बतला रहे है कि जीवात्मा को तो यम के दूत पकड़कर ले जायेंगे, उन्हें यथा कर्मानुसार दण्ड प्रदान करते है। परन्तु पीछे मृत शरीर की क्या दशा होती है। कभी इसी पर स्वर्ग के अलंकार सेज आदि सुख सुविधायें थी, किन्तु आज उसे माता-पिता, पुत्र, नारी आदि परिवार के चार आदमी कंधे पर उठाकर ले चलते है ।१६।

कियो पिछोकड़ वास, ले गया बीच बणां ।१७।

चलते-चलते मार्ग में उतार कर एक जगह पुनः विश्राम लेते है और वहां पर भी अधिक देर न रुक कर फिर उसे उठाकर चलते है, और उसे घने वन में गांव से दूर ले जाकर वहां पर ही उनका अन्तिम संस्कार करते है ।१७।

मेल्यो धरण उतार, बांधव बीसरणा ।१८।

इतनी देर तक तो वह मृत शरीर चार आदमियों के कंधे पर था, परन्तु अब कंधे से उतार कर धरती पर रख दिया जाता है। अन्तिम धरती की ही शरण ली जाती है। अपने प्रिय भाई बन्धु सभी कुछ पीछे छूट गये है, उसे तो अकेला ही जाना होगा ।१८।

कोयल करै किलोल, बैठी आंब बणां ।१९।

बोलै मधुरा बैण, दुनियां नै दुख घणां ।२०।

कवि कहता है कि वहां पर श्मशान भूमि में आम की वणी में कोयल बैठी हुई किलोल कर रही है और मधुर वाणी बोलती हुई मानो यह कह रही है कि दुनियां में दुःख बहुत है, जो कोई भी मोह माया के वशीभूत हो जाता है वह इसी प्रकार से बिलखता है और दुखी हो जाता है, यहां पर पहुंचने पर क्षण भर के लिये मानव संसार की असारता का अनुभव करता है ।२०।

तलै उतारयो जाय, धरती रो सरणा ।२१।

आप ज मरणां होय, औरां नै क्या झुरणां ।२२।

सत बोलै शिवदास, भक्ति हरि ऊधरणां ।२३।

वहां पर उस कोमल शरीर के लिये हाथ में कसी कुदाला लेकर गड्ढा यानि घर बनाते है, उसी शरीर को वहीं पर धरती की गोद में सदा के लिये सुलाया जायेगा। उस शरीर की अन्तिम क्रिया करके जमीन में दबा करके वापिस घर लौट आते है तो रोना चिल्लाना ही शेष रह जाता है। कवि कहता है कि यह कैसा रिवाज है, जब स्वयं को भी मरना है तो दूसरों के लिये क्या रोना पीटना चिल्लाना है, यदि रोना ही है तो स्वयं के लिये ही रोयें। कबीर ने कहा है- "सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै और रोवै।।" शिवदास जी कहते है कि मैं सत्य कहता हूं कि जो हरि विष्णु की भक्ति करेगा वह निश्चित ही भवसागर से पार उतर जायेगा, जन्म मरण के चक्कर से छूट जायेगा। यह साखी विशेष रूप से बिश्नोई साधु के अन्तिम यात्रा के अवसर पर गायी जाती है। ऐसी परंपरा है ।२३।