कवि परिचय — सुरजन जी
इनका समय अनुमानतः विक्रम संवत् 1500-1570 है। जाम्भाणी साहित्य में सुरजन जी के नाम से तीन कवि हुए है ऐसा उल्लेख है परन्तु ये प्रथम तथा हजूरी संत कवि थे। इन्होनें एक साखी राग सुबह में गेय की रचना की है। यह जागरण की चौथी साखी प्रसिद्ध है।
जुमलै आवो गुरु भाइयो, सुपह करौ जे काय ।१।
हे गुरु भाइयों ! आप और हम एक ही गुरु के शिष्य होने से गुरु भाई है। सभी का एक ही धर्म कर्म एवं व्यवहार है। इसलिये हे भाई ! आप लोग जमे जागरण जहां पर सत्संग होता है, सत्य असत्य का विवेक होता है, ऐसी जगह पर आप क्यों नहीं जाते। वहां जाकर अपने जीवन का लक्ष्य मार्ग स्वयं ही निर्धारित करें, यही जीवन में शुभ मार्ग एवं कर्म होगा ।१।
ज्ञान श्रवणे सांभलो, शब्द सुणो हितलाय ।२।
कानों द्वारा मन लगाकर जागरण में ज्ञान श्रवण करें तथा गुरुदेव के बताये हुए शब्दों को ग्रहण करें। ये विद्या जागरण में ही मिल सकती है तथा सभी के हितकारी है ।२।
गुरु फुरमाई से करौ, कुपही करौ न काय ।३।
जैसा गुरुदेव ने फरमाया है वैसा ही करें। पाप कर्म कभी न करें तथा कुमार्ग पर कभी न चलें। यही शिक्षा जागरण में आकर ग्रहण करें ।३।
दान दया जरणा जुगति, सत व्रत शील सभाय ।४।
आठ धरम नवधा भगति, साध सेव सत भाय ।५।
आगे कवि बतला रहे है कि जागरण में हमें आठ प्रकार के धर्म अंगों को सीखना है तथा उन्हें धारण करके पूर्ण धार्मिक होना है। आठ धर्म के अंग ही धर्म कहलाते है। सर्व प्रथम दान आता है। दान का अर्थ देना है। मानव का कर्त्तव्य है कि वह अपनी कमाई से दसवां भाग धार्मिक कार्य में सुपात्र को देता रहे, उससे धन शुद्ध होता है। कहा भी है- थोड़े मांही थोड़ेरो दीजै, होते नांह न कीजै। दूसरा धर्म बतलाया है कि महापुरूषों ने दया को ही धर्म का मूल बताया है। "दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान" दीन दुःखी पर करूणा करके उसकी हर प्रकार से रक्षा करना ही दया कहलाती है। तीसरा धर्म जरणा बतलाया है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, इर्ष्या आदि सदैव हमें जलाती रहती है। किन्तु अवसर पाकर हम उन्हें जला दें। कहा भी है- "देख्या अदेख्या, सुण्या असुण्या, क्षमा रूप तप कीजै, जरिये जरणी करिये करणी" यही जरणा है। चौथा धर्म जुगति बतलाया है जिसे गीता में युक्ताहार विहार से कहा गया है। अहार-विहार आदि सभी युक्ति पूर्वक करना ही जीवन जीने का सुलभ उपाय बतलाया है। पांचवां धर्म सत्य बतलाया है। "सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्" सत्य बोलें परन्तु प्रिय भी बोलें, यदि सत्य है किन्तु प्रिय नहीं है तो ऐसी वाणी कदापि न बोलें। सत्य ही परमात्मा है, सत्य ही आत्मा है, जगत प्रपंच झूठा है। सत्य को सत्य से मिलाना ही धर्म है। छठा धर्म व्रत है। वेद विहित तथा गुरु के द्वारा बताया हुआ अमावस्यादि व्रत करना ही सत्य व्रत कहलाता है। कहा भी है कि "अमावस्या का व्रत राखणों", व्रत का अर्थ होता है सत्य प्रतिज्ञ होना। सातवां धर्म शील कहा गया है। शील शब्द बहुत ही गंभीर अर्थ को समेटे हुए है। शील का अर्थ ब्रह्मचर्य की रक्षा करना भी है। पराई स्त्री को मां-बहन सदृश देखना, नम्रता का व्यवहार करना, स्वभाव से ही शीतल सौम्य सज्जन होना, ये सभी अर्थ शील के अन्तर्गत आ जाते है। आठवां धर्म यहां पर स्वाभाविक रूप से आये हुए दुर्गुणों को खोज करके बाहर निकालना है। किसी दुर्जन की संगति से या अन्य कारणों से दुर्गुण आ जाते है, जैसे- चोरी, नशा, कठोरता, क्रूरता, नीचता, धोखा-धड़ी करना इत्यादि। इन सभी आदतों को त्याग करके इनके विपरीत सद्गुणों को धारण करना ही आठवां धर्म है। अब आगे नवधा भक्ति बतलाते है, नवधा भक्ति की व्याख्या तुलसी रामायण के अनुसार की जाती है। चौपाई- नवधा भक्ति कहौं तोहि पाहि, सावधान सुनु धरु मन मांहि। प्रथम भक्ति संतन्ह कर संगा, दूसरी रति मम कथा प्रसंगा ।८। दोहा- गुरु पदपंकज सेवा, तीसरी भक्ति अमान। चौथी भगति मम गुन गन, करइ कपट तजि गान। चौपाई- मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा, पंचम भजन सो वेद प्रकाशा ।१। छठ दम सील बिरति बहु कर्मा, निरत निरंतर सज्जन धर्मा ।२। सातव सम मोहि मय जग देखा, मोते संत अधिक कर लेखा ।३। आठव जथा लाभ संतोषा, सपनेहुं नहिं देखई पर दोषा ।४। नवम सरल सब छल हीना, मम भरोस हिय हरष न दीना ।१५। नव महु एको जिन्ह के होई, नारि पुरूष स चराचर कोई ।१६। इस प्रकार से नवधा भक्ति श्री रामचन्द्र जी ने शबरी के प्रति बतलाई थी ।५।
आचारे ब्रह्मा सही, जोग ज ध्यान दिढ़ाय ।६।
कुछ लोग केवल ब्रह्मज्ञान की बात ही करते है, किन्तु कवि कहता है कि यह ब्रह्मज्ञान केवल कहने और सुनने की ही बात नहीं है, वह तो आचरण में लाया जाता है, तभी वह ब्रह्मज्ञान है, अन्यथा तो केवल गाल बजाना ही है। ब्रह्मज्ञान को आचरण में लाने के लिये योग द्वारा ध्यान दृढ़ करना होगा, तभी उस महारस का अनुभव हो सकेगा ।६।
आण तजो विष्णु भजो, पाप रसातलि जाय ।७।
हे गुरु भाईयों ! जैसे गुरु देव ने कहा है- "विष्णु-विष्णु तूं भण रे प्राणी" उसी बात को मैं आपसे कह रहा हूं कि आन देव, यानि भूत प्रेत चौसठ योगिनी, बावन भैरूं आदि देवता कहे जाने वाले तथा कथित जन्मे हुए जीवों को छोड़कर एक ईश्वर विष्णु का ही भजन स्मरण करो, जिससे तुम्हारे पाप रसातल चले जायेंगे ।७।
जिण ओ जीव सिरजियौ, सो सतगुरु सुरराय ।८।
जिस परमात्मा विष्णु ने इस जीव के लिये यह दिव्य देह रची है, वही तो सिरजनहार यहां सम्भराथल पर विराजमान है जो सतगुरु रूप से आकर उपदेश दे रहे हैं ।८।
जुगां जुगां जीवै जको, अवगति अकल ज थाय ।९।
वह परमात्मा विष्णु तो युगों-युगों तक जीवित रहने वाले तथा उनकी गति कार्य चरित्र के बारे में थाह नहीं पाया जा सकता, बुद्धि की दौड़ वहां तक नहीं पहुंच सकती ।९।
मात पिता जाकै नहीं, पख परवार न थाय ।१०।
जोत सरूपी जग थई, सरवै रह्यो समाय ।११।
वह विष्णु स्वयं सृजनहार है, परन्तु उनके माता-पिता, भाई-बहन आदि परिवार नहीं है, क्योंकि वे स्वयं ज्योति स्वरूपी है, सम्पूर्ण जगत में कण-कण में समाये हुए हैं ।११।
अटल इडग एक जोति है, ना कही आवै न जाय ।१२।
वही विष्णु ही सम्भराथल पर स्थित होकर अटल अडिग हो चुके है, इस समय कहीं आते जाते नहीं है। कहा भी है- "अडिग ज्योति सम्भराथले" गुरुदेव ने कहा है कि मेरी ज्योति सम्भराथल पर अडिग रहेगी, भूल नहीं जाना, यदि भूल गये तो निश्चित ही दोरे दुःख में गिर जाओगे ।१२।
जन सुरजन वा परसिया, आवागुवण न थाय ।१३।
सुरजन जी कहते है कि जिसने भी सम्भराथल पर आकर दर्शन स्पर्श ज्ञान श्रवण किया है, वह तो निश्चित ही संसार के आवागवण से छूट जायेगा ।१३।