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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह6 / 156

साखी कणां की-6

मेरे मन हुवो हुलास, संभरथलि जाइये

कवि: आंछरे जी

कवि परिचय — आंछरे जी

जन्म विक्रम संवत् 1500-1550 के आसपास होना अनुमानित है ये बीकानेर के समीपस्थ किसी गांव के थे। गुरु जाम्भोजी के हजूरी भक्त थे। उनका सिद्ध योगी होना इस साखी से ध्वनित होता है साखी राग मल्हार में गेय है।

मेरे मन हुवो हुलास, संभरथलि जाइये ।१।

कवि कहता है कि मेरे मन में आनन्द की लहरें उठ रही है क्योंकि मैनें अमृत का पान किया है। यदि आप भी चाहें तो अवश्य ही सम्भराथल जाओ ।१।

संभराथल जाइये खरच नांही, बीच अमावस कीजिये ।२।

सम्भराथल पर पहुंचने में कुछ भी खरचना नहीं पड़ेगा, वह स्थल सभी के लिये सुलभ है। यदि जाना है तो फिर वहां पर अमावस्या की पुण्य रात्रि वहीं पर व्यतीत कीजिये। सूर्य चन्द्र एक राशि में आना ही अमावस्या रात्रि है, उस अन्धकार में भी गुरुदेव सूर्य सदृश ज्ञान का प्रकाश करते है ।२।

उतारि गहणौ होय लहणौ, बिलस लाहौ लीजिये ।३।

वहां पहुंच करके अमृत पान तथा मन की प्रसन्नता के लिये यह अहंकार रूपी अलंकार गिराना होगा। तभी ज्ञान की प्राप्ति हो सकेगी, अन्यथा वहां पर पहुंच कर भी खाली हाथ लौटना पड़ेगा। जीवन में आनन्द की प्राप्ति होना ही जीवन जीने का लाभ है ।३।

काहें का मैं करूं दीपक, काहें केरी बातियां ।४।

काहें का मैं घिरत छालूं, जगों छमासी रातियां ।५।

आगे कवि पुनः कहता है कि वहां सम्भराथल पर पहुंच कर भी मुझे दीपक आदि से गुरु पूजा करनी होगी, उसके लिये स्वयं प्रश्न करके उसका समाधान देते है कि किसका दीपक बनाउंगा और किसकी बतियां बनाउंगा, किसका घृत भर करके दीपक जलाउंगा तथा लंबी रात्रि में जागरण करके प्रभु का स्मरण करूंगा ।५।

सोने का मैं करूं दीपक, रूप वाती छलाविया ।६।

आगे स्वयं ही अपने प्रश्नों का उतर देते हुए कहते है कि इसमें कोई समस्या नहीं है। स्वर्ण का मैं दीपक बनाउंगा, अर्थात् कंचन जैसी यह उत्तम काया ही मेरा दीपक होगा, तथा रूपे की दीपक में बतियां होगी। वहां पर सुरह कामधेनु का पवित्र घृत है, वही दीपक में भरकर रखूंगा, दीपक को प्रज्वलित करने वाले देव स्वयं ही विराजमान है। ऐसा दीपक जब जल उठेगा तो फिर मन की वृतियां शांत हो जायेगी, आनन्द विभोर होकर आत्मस्थ हो जायेगी तो मैं समाधी अवस्था को प्राप्त कर लूंगा ।६।

सुरह गऊ का घिरत छालूं, जगौ छमासी रातियां ।७।

ऐसी अवस्था में छः मासी अर्थात् पूरे दक्षिणायन के छः महीने जीत लूंगा और उतरायण में इच्छित मृत्यु को प्राप्त कर लूंगा ।७।

सधि होकर करि जगों दीपक, दासी हूं मैं तेरिया ।८।

इस प्रकार से सचेत होकर मैं नित्य प्रति दीपक जलाऊंगा, समाधी को प्राप्त होता जाऊंगा। अब तो मैं आपका दास हो चुका हूं, मेरी बाह्य सांसारिक कामनाऐं निवृत हो चुकी है ।८।

अपणे धणी सूं सार खेलूं, कला राखो मेरियां ।९।

अपने स्वामी परम पिता परमात्मा के साथ ही मैं नित्यप्रति खेला करूंगा। वही मालिक ही मेरी लज्जा रखेंगे, मेरे जीवन को चलायेंगे, अब मुझे कुछ भी करना शेष नहीं रहेगा ।९।

प्रबत दोय चीर उतरया, सोने तार छलाविया ।१०।

सोई पहर धंण चौक बैठी, ईंद देखण आइयां ।११।

हे प्रभु ! जब मेरी समाधी परिपक्व अवस्था में पहुंच जायेगी तो पर्वत से, अर्थात् अलौकिक स्वर्गीय दो सिद्धियां उतरकर मेरे सामने आयेगी, ये सिद्धियां स्वर्णमय तारों से संचित चीर की भांति आकर मुझे ढकने का प्रयास करेगी। मुझे आगे बढ़ने से रोकेगी, किन्तु मैं उनका विरोध भी करूंगा, उनसे लड़ाई करने से तो मैं जीत नहीं सकूंगा क्योंकि वे तो आपकी ही माया है, मैं उनसे समझौता करके धारण कर लूंगा, यही अच्छा होगा। उन्हीं सिद्धियों को पहन, ओढ़कर मैं सभी के सामने चौक पर बैठ जाऊंगा, कहीं लुका छिपी नहीं होगी, अर्थात् मैं अपनी समाधी से विचलित नहीं होऊंगा तो स्वयं इन्द्र भी मुझे देखने के लिये आयेंगे। हो सकता है मेरी तपस्या से इन्द्र को भी खतरा हो। हे देव ! यदि आपका कृपा हस्त मेरे उपर रहेगा तो इन्द्र भी मेरी तपस्या भंग नहीं कर सकेंगे ।११।

कह आंछरै करौ करणी, पारि पहुंचो भाइयां ।१२।

आंछरे कहते है कि कर्तव्य कर्म करो तो निश्चित ही संसार सागर से पार पहुंच जाओगे, अन्यथा देखते ही रह जाओगे। हे भाई ! यही चेतावनी है ।१२।