कवि परिचय — समसदीन जी
विक्रम संवत् 1490-1550 में इन्होनें अपना जीवन यापन गुरु जाम्भोजी की शरण ग्रहण करके किया था। ये नागौर के मुसलमान थे। जाम्भोजी के दिव्य अलौकिक लीला देखकर शिष्य बन गये थे। उन्होनें अपने जीवन काल में दो साखियों की रचना की थी ये दोनों ही साखियां अच्छी मानी जाती है ये हजूरी कवि थे।
मीठा तो बोलो रे भइया निवखिव चालो, ना तोड़ो गुरु से नेहा ।१।
हे भाई ! सत्य प्रिय मधुर बोलो। इस संसार में सुखी जीवन के लिये नम्रता क्षमा भाव रखते हुए चलो। गुरु परमात्मा जाम्भोजी से प्रेम भाव रखो। एक क्षण भी परमात्मा में वृति का तार टूट न जाये ।१।
मोमण हुवै सो बीरा आपो रे मारे, अवरा मारण केहा ।२।
हे भाई ! मोमण जिन्होनें मोह और मन को जीत लिया है, मोम के समान जिनका हृदय कोमल हो गया है, ऐसा भक्त तो स्वकीय अहंकार को मिटा देता है तथा जो स्वयं को ही मार लेता है अहं भाव को मिटा देता है, वह भला दूसरों को कैसे मार सकता है ।२।
मोमण हुवै सो बीरा तूटी रे साधे, दुश्मण घातेला वेहा ।३।
हे वीर ! यदि मोमण भगवान का प्यारा भक्त होगा तो वह टूटी हुई बात को भी जोड़ लेगा। बिखरे हुए दिल को जोड़ लेगा, किन्तु दुष्ट व्यक्ति तो उल्टा ही है। जुड़े हुए को तोड़ना ही जानता है, बीच में दरार पैदा कर देता है ।३।
भरी सभा में बीरा पड़दो रे पाड़े, दोजखी जैला दुष्टी एहा ।४।
दुष्ट व्यक्ति तो भरी सभा में जाकर जो गोपनीय बात है, जो कहने योग्य बात नहीं है, वही जाकर कहेगा जिससे उपद्रव हो जाये। कवि कहता है कि ऐसे दुष्ट लोग तो निश्चित ही भयंकर नरक में गिरेंगे ।४।
हंसा तो हंदी बीरा टोली रे आवै, सरवर करण सनेहा ।५।
हे भाई ! ध्यान से देख। जो हंस सदृश पवित्रात्मा है उनकी तो अनेकों टोलियां आ रही है, क्योंकि उन्हें मानसरोवर की उपलब्धि हो चुकी है, यहां पर उनके जीवन के आधार मोती सुलभ है, तूं पीछे क्यों रह रहा है, अब अवसर आ चुका है, अर्थात् सम्भराथल पर गुरु जाम्भोजी विराजमान है, उनके पास हंस रूपी आत्माऐं पहुंचती है तो उन्हें अमृत रूपी मोती प्रदान करते है ।५।
जांहरी तो पालहि बीरा पातिक रै नासै, लहियो मोमण एहा ।६।
हे भाई ! जिस गुरु की पाहल लेने से सभी पाप भाग जाते है, ऐसी पाहल जाकर ग्रहण करनी चाहिये। सभी मोमण ले रहे है और अपने को धन्य मान रहे है ।६।
हंस चलंतै बीरा पिंड पड़ेलौ, वास कलियल केहा ।७।
हे भाई ! यदि यह समय व्यतीत हो गया तो फिर यह शरीर एवं समय तो लौट कर वापिस नहीं आयेगा। एक दिन यह हंस इस शरीर से उड़ जायेगा तो यह शरीर गिर जायेगा। इस शरीर से निकलने के पश्चात इस हंस आत्मा की न जाने क्या गति होगी। यह पवित्र हंस न जाने किस अशुद्ध निकृष्ट शरीर में जाकर वास करेगा, बिना सुकृत के निश्चित ही दुखदायी स्थिति ही होगी ।७।
कसी कुदाला लेकर रे चाल्या, घर सूं बाहिर एहा ।८।
माटी सूं माटी रलमिल जैली, कूं-कूं वरणी एहा ।९।
पीछे मृत पड़े हुए शरीर को शीघ्र ही घर से बाहर उठाकर ले जायेंगे, वहां श्मसान भूमि में ले जाकर कसी कुदाल फावड़ा से भूमि में गढ़ा खोदकर जमीन में गाड़ देंगे। वहां पर यह शरीर मिट्टी में मिल जायेगा। जीवित अवस्था की कूं-कूं वरण वाली देह कितनी सुन्दर तथा सौम्य थी, परन्तु अब इसकी यह दशा होगी, बड़ा ही आश्चर्य है ।९।
तेरी संख्या तो उपरि पुवण ढुलेलो, घण हर वर्षेला मेहा ।१०।
मिट्टी को मिट्टी में मिलाकर लोग वापिस घर लौट आयेंगे और थोड़े दिनों का शोक भी मना लेंगे ।१०।
ऊपर हाली रे भइया हल रे खड़ेलो, ढ़ोर चरेला एहा ।११।
तुम्हारी समाधी देह पर ठण्डी हवायें चलेगी, कभी अत्यधिक वर्षा होगी। हाली तुम्हारे शरीर पर हल भी चलायेंगे और कभी तेरे उपर घास उग आयेगा तब पशु भी चरेंगे। इतनी पवित्र देह की यह दशा हो जायेगी, परन्तु तुम्हारा वश कुछ भी नहीं चलेगा ।११।
नेकी रे बदी थारे साथ हुवैली, जग करो ला जेहा ।१२।
ओह महारस समसदीन बोले, मीठा दीन सनेहा ।१३।
इस जीवात्मा के साथ में तो केवल नेक कर्त्तव्य, कर्म, ईमानदारी, सच्चाई एवं परमात्मा की भक्ति ही साथ चलेगी। वही वहां पर साक्षी का कार्य करेंगे और नरक से बचायेंगे। कवि समसदीन कहता है कि मैनें यह महारस बतलाया है जो अत्यन्त ही मधुर एवं स्नेह वाला है, जो कोई धारण करना चाहे तो वह अवश्य ही निहाल हो जायेगा ।१३।