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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह4 / 156

साखी-4 कणां की

सिंवरो उत्तम रो राव, सांई राजा मन जपिये

कवि: समसदीन जी

कवि परिचय — समसदीन जी

विक्रम संवत् 1490-1550 में इन्होनें अपना जीवन यापन गुरु जाम्भोजी की शरण ग्रहण करके किया था। ये नागौर के मुसलमान थे। जाम्भोजी के दिव्य अलौकिक लीला देखकर शिष्य बन गये थे। उन्होनें अपने जीवन काल में दो साखियों की रचना की थी ये दोनों ही साखियां अच्छी मानी जाती है ये हजूरी कवि थे।

सिंवरो उत्तम रो राव, सांई राजा मन जपिये ।१।

हे मानव ! संसार के सर्वोतम पुरूषों के भी शिरोमणी राजा स्वामी का ही स्मरण करें। उस परमात्मा सांई का जप भी मानसिक ही करें। वही उत्तम होगा। "यज्जपस्तदर्थ भावनम्" जप के साथ ही साथ उस परमात्मा-आत्मा का ध्यान भी करें तभी उत्तम जप होगा ।१।

देकर दिल को साच, जुमले रलि मिलिये ।२।

हम जागरण जुमलै सत्संग में अवश्य ही जावें किन्तु वहां पर भी सच्चाई से केवल ज्ञान ग्रहणार्थ ही जावें, अन्यथा कुछ भी लाभ नहीं मिलेगा ।२।

जित पिकर अमि कचोल, खेवट ज्यूं ढुलिये ।३।

वहां सत्संग में ज्ञानामृत घोला जाता है, उस भरपूर रस का पान करें। रसपान से जब तृप्त हो जायेंगे तो फिर दूसरों को बांटने में समर्थ हो सकेगे, जिस प्रकार से नौका चलाने वाला खेवट अपनी नौका में भरा हुआ जल बाहर फेंकता है अन्यथा नौका डूब जायेगी। उसी प्रकार से हम भी जब ज्ञानामृत से भर जायेंगे तो फिर दूसरों को बांटने में समर्थ हो सकेगे ।३।

चरियों चरणै जोग, अवचर परहरियो ।४।

करने योग्य कर्त्तव्य कर्म ही करें जो शास्त्रों में विहित है तथा जो शास्त्रों में निषिद्ध अकरणीय कर्त्तव्य है उन्हें न करें ।४।

अवचर बाढ़ेला रोग, आफिर ना मरियो ।५।

अवचर अकर्त्तव्य यानि पाप कर्म करेंगे तो वे कर्म निश्चित ही रोग बढ़ायेंगे, अनेकों प्रकार के कष्ट ही देंगे। इस प्रकार के कष्टों रोगों को झेलते हुए जीवन को समाप्त ही कर देगा ।५।

ज्यूं-ज्यूं कहै म्हारौ श्याम, आगै-आगै पग धरियो ।६।

जिस प्रकार से हमारे घनश्याम भगवान विष्णु गुरु जाम्भोजी आज्ञा दे वही कार्य करें। बिना आज्ञा के मनमुखी होकर आगे एक कदम भी न बढ़ायें ।६।

देख हरिड़ा बाग, चोरी बंदा ना करियो ।७।

चोरी है अणराय, जीवड़ा भल डरियो ।८।

यदि किसी के पास धन-दौलत है वह सुखी है यानि हरा-भरा है तो उसके धन को देखकर मन न ललचायें अर्थात् चोरी न करें क्योंकि चोरी करना पाप है, शास्त्र निषिद्ध है, इस पाप कर्म से बचें। याद रखना एक दिन अवश्य ही मरना होगा तब पाप कर्मों का दुःख उठाना ही होगा ।८।

ठाडो बेलूं को रेत, झबूकला पवण घणा ।९।

बरखत आंखें खोलि, नीपजैला जीव सरया ।१०।

मनुष्य का स्वभाव है कि वह आज के कार्य को कल पर टालने की कोशिश कर रहा है। कवि कहता है कि कल का क्या पता है, आज युवावस्था है, बुद्धि तथा शरीर स्वस्थ है तो कल का कार्य आज ही कर लेना चाहिये। कल वृद्धावस्था आ जायेगी इसी बात को स्पष्ट करते हुए कहते है कि आगामी दिनों में तो सर्दी आने वाली है उस समय बेलू रेत ठण्डी हो जायेगी तथा ठण्डी हवायें भी अत्यधिक चलेगी अर्थात् बुढ़ापा आ जायेगा। यदि कुछ करना है तो इस वर्षा ऋतु में ही सर्वोतम अवस्था है, इसी में कर लें, कल का भी तो क्या पता आयेगा कि नहीं, यदि आ भी जाये तो भी दोषों से युक्त होगा ।१०।

डूंगर तरला वास, दीसै तरू जै हर्या ।११।

इसलिये हे जीव ! आंखें खोलकर देख ! शुभ कार्य करें तभी जीव की भलाई हो सकेगी। वर्षा की भांति परोपकार के लिये तैयार हो जा ।११।

जित वै दीसै चतुर सुजाण, आवो बंदा जाय घरा ।१२।

सायर लहरा लेह, ऊंडो देखी डरया ।१३।

जिस प्रकार से पहाड़ के नीचे के वृक्ष हरे-भरे दिखाई देते है किन्तु ऊपर के वृक्ष सूख जाते है क्योंकि उन्हें जल, खाद, मिट्टी पूर्णतया नहीं मिल पाती, उसी प्रकार से वे जन भी धन्य है जो परमात्मा की शरण ग्रहण की है, स्वयं को मिटा दिया है और अपने उपर सदैव पर्वत की भांति परमात्मा की छत्र छाया मानते है, वे ही हरे-भरे पूर्ण तथा चतुर सुजान है। हे मानव ! आओ ! अपने भी उसी मार्ग को पकड़कर हरे-भरे होकर अपने घर वैकुण्ठ लोक में पहुंचे ।१३।

संबल थे जां पास, सोई मोमणा पार लंघ्या ।१४।

संबल बिहुणा वीर, झुरवै तीर खडया ।१५।

झुरवै राति र द्यौंस, घायल ज्यौं कुरहौ ।१६।

अगर चंदण की नाव, बेड़ो म्हारो श्याम सज्यो ।१७।

बोले समसदीन, खेवट पारि लंघ्यो ।१८।

आगे वहां पर अमृत सागर लहरें ले रहा है किन्तु गहराई भी बहुत है, उसमें स्नान करने से डर लगता है किन्तु जिसके पास संबल है यानि परमात्मा की शक्ति साथ है वे लोग नहीं डरते, वे तो गहराई में पहुंच करके नहा लेते है क्योंकि वे तो भक्त है। इनके विपरीत जो संबल रहित है वे तो किनारे पर ही बैठे है, समुद्र की लहरों को देखकर ही डर गये है। अन्दर प्रवेश करके स्नान करने की हिम्मत ही नहीं जुटा रहे है। कहा भी है- "तैरू तैरियत तीर, जे तीस मरे तो मरियो" कुछ लोग तो पार उतर गये किन्तु दूसरे लोग तीर पर बैठे हुए भी प्यासे है। दिन-रात कलाप कर रहे है, घायल की भांति विलाप करते हुए दुखी हो रहे है। कवि समसदीन कहते है कि हमारे श्याम विष्णु परमात्मा ने तो हमारे लिये अगर तथा चन्दन काष्ठ की नौका बनाकर खूब सजाई है। हमें तो उसी में बैठाकर स्वयं खेवट बनकर नाव चलाकर पार उतार देंगे। हम तो निश्चिन्त हो गये हैं क्योंकि हमने तो प्रत्यक्ष देवता की शरण ग्रहण की है ।१८।