कवि परिचय — अज्ञात कवि
हजूरी इस साखी में कवि ने संसार को गोवलवास बताते हुए अपने सच्चे घर पहुंचने के लिये उपाय एवं विधी विधान बताया है तथा सचेत भी किया है कि कहीं गोवलवास को ही सच्चा घर न मान बैठो।
जुग मां जलम लियो मेरा जीयो, वसियो आय बसेरो । कामण कोड करे मेरा जीयो, जम दल देला फेरो । जमदल फेरो आण घेरयो, पुन री पाज बंधाइये । नाम नाली ज्ञान गोली, धरम बांण चलाइये । भरम भागो जोत जागी, कोल सतगुरु सूं कियो । लाछ लछमी नांव तेरे, जीव जुग मां जलम लियो ।१।
हे जीव ! तुमनें इस जगत में आकर मानव शरीर धारण किया है और यहां पर रहने के लिये महल मकान आदि का साधन जुटा लिया है ऐसा लगता है कि यह वास सदा के लिये किया जा रहा है। इस घर में रह कर अनेक कामनाओं तथा वासनाओं में फंस गया है आगे पीछे कुछ भी नहीं सोचा है यह विचार नहीं किया कि यम दूतों ने भी घेरा डाल रखा है, न जाने कब कहां से उठाकर ले जायेंगे। हे प्राणी ! यह निश्चित ही है कि काल के दूतों ने आकर घेरा डाल दिया है इसलिये समय रहते हुए पुण्य की पाल बांधनी चाहिये। यह पाल ही रक्षा कर सकेगी। यमदूतों को भगाने के लिये परमात्मा विष्णु के नाम रूपी बन्दूक की नाली से ज्ञान रूपी गोला अवश्य ही चलाइये। यही धर्म के बाण जाकर आगे लक्ष्य का छेदन करेंगे तथा ज्ञान रूपी गोली से नाना प्रकार का भ्रम मिट जायेगा और परमात्मा की ज्योति जागृत हो जायेगी। सतगुरु से किये हुए वचनों को इस प्रकार से निभाया जा सकता है तथा सम्पूर्ण विश्व की धन सम्पति तुझे स्वयं ही मिल जायेगी। इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिये ही तो इस संसार में जन्म लिया है ।१।
गोवलवास वस्यो मेरा जीयो, सुकरत करो कमाई । कुटुम्ब कोड करे मेरा जीयो, बाजै बिड़द बधाई । हुवै बधाई मंगल गावै, हरष मन आनन्द घणों । भाट ब्राह्मण बिड़द बोलै, हुयो कुल मां चांदणों । सुरगे सुख अनन्त इधक, साध संगति रलि मिलै । साच शील संभाल रे जीव, वास वसियो गोवले ।२।
हे जीव ! इस संसार में आकर गोवलवास की तरह रहना सीख, इस जगत को अपना सच्चा घर नहीं समझ, इसी भाव से रहेगा तो शुभ कार्य हो सकेगा अन्यथा मोह माया में फंस जायेगा। जब बालक संसार में आता है तो सभी कुटुम्बी जन प्रेम करते है, बधाईयां बांटते है, मंगल गीत गाते है, नृत्य करते है अनेक प्रकार की खुशियां प्रगट करते है, भाट ब्राह्मण आकर बिड़द गान करते है। यही बड़ाई करते हुए कहते है कि यह बालक तो तुम्हारे कुल का दीपक है इसके आने से प्रकाश हो गया है। इसी खुशी पर साधु सज्जन भी आकर मिलते है और स्वर्ग से भी बढ़कर सुख को देखते है किन्तु हे जीव ! ये सभी कुछ दिखावा मात्र है, सच्चा सुख तथा अलंकार तो सत्य एवं शील ही है। इसलिये इसे ही संभालकर गोवलवास की भांति जीवन व्यतीत करें ।२।
पापा प्रीत तजौ मेरा जीयो, किरिया करौ कमाई । जम की भीड़ पड़ै मेरा जीयो, तां दिन विसन सहाई । विसन सहाई होय भाई, औघट घाट लंघावही । जीव काजै दान दीजै, अंत आडो आवही । आण को अपराध मेटो, जीव घात मत को करो । दया विहुणां जांही दोजख, प्रीत पाप पर हरो ।३।
हे मेरे जीव ! पापों से प्रीत छोड़कर शुभ क्रिया आचार विचार पर ध्यान दे। शुभ कमाई ही करें। जब यमदूतों की मार पड़ेगी तब एक मात्र विष्णु ही सहायता करनें वाले होंगे या विष्णु द्वारा बताया हुआ मार्ग सिद्धान्त । वह विष्णु ही तुम्हें दुर्गम बिहड़, जंगल से पार निकाल सकते है। इसलिये विष्णु की शरण ग्रहण अवश्य ही करें। जीव की भलाई के लिये सदा श्रद्धा सामर्थ्यानुसार दान देते रहना क्योंकि हाथ से सुपात्र को दिया हुआ दान भी परलोक में सहायक होगा दुर्गति से बचायेगा। आन देवता जैसे- खेचर, भूचर, चौसठ प्रकार की योगिनी, बावन भैरूं आदि की पूजा मत करो और न ही किसी जीव की हत्या ही करो। इस प्रकार से जीव दया हीन नर तो निश्चित ही दौरे नरक में पड़ेंगे। इसलिये हे प्राणियों ! पापों से प्रीत का परिहार करो ।३।
संता री सेवा करो मेरा जीयो, भजन करो गुरु भाई । उर मां ध्यान धरो मेरा जीयो, जाय मिलो सुरराई । सुरराय मेलो हुवै जां दिन, हरख मन कांमण करै । सिद्ध साध कुशल पूछै, वेद ब्रह्मा उच्चरै । उपकार सार विचार रे जीव, जांण मन क्यों विसरो । भजन भक्तां भेद लाभे, सेवा सतगुरु की करो ।४।
आगे कर्त्तव्य कर्म बतलाते हुए कहते है कि संत सज्जन पुरूषों की सेवा करो और विष्णु का भजन करो। हे गुरु भाइयों ! क्योंकि गुरु जाम्भोजी नें विष्णु का ही जप करना बतलाया है। सदा ही धर्म में ही ध्यान रखो हमारा जो भी कार्य बनें वह धार्मिक ही होना चाहिये। इससे आप स्वयं ही देवाधिदेव भगवान विष्णु से अवश्य ही जाकर मिल जाओगे। जिस दिन भी आपकी परमात्मा से भेंट हो जायेगी उसी दिन मन प्रसन्न हो जायेगा। आपका वहां पर भव्य सत्कार होगा, सिद्ध साधुजन आकर कुशल समाचार पूछेंगे, ब्रह्माजी वेद का उच्चारण करेंगे। हे जीव ! परोपकार के सार को समझ और इसी पर जीवन लगा दें। क्यों भूल जाता है कि गुरुदेव नें यही तो बतलाया है। भजन से ही भक्तों की पहचान होती है अथवा जो भजन सेवा करता है वही तो सच्चे अर्थों में भक्त कहलाता है। भक्त ही भगवान का अत्यन्त प्रिय जीव है ।४।