कवि परिचय — अज्ञात कवि
हजूरी इस साखी में कवि ने बतलाया है कि जिस दिन इस शरीर से हंस उड़ जायेगा तो यह देह मृत यानि अन्धकारमय हो जायेगी इसलिये जब तक ज्योति अन्दर विद्यमान है तब तक कुछ किया जा सकता है। यह साखी प्रायः सोरठ राग में गायी जाती है।
जां दिन हंस चलै मेरा जी हो, कुड़ी अंधियारो होई । गढ़ वैराय फंद पड़ै मेरा जीहो, धीरी धरै न कोई । धीरी धरै न कोय रे जीव, इत मित न भाइयां । घर वास मन्दिर लाछ लछमी, तजै सैल सगाइयां । लागा सो भागा तोड़ तागा, रहण नाही एक छिनां । अंधियारी कुड़ी होय रे जीव, हंस चाल्यो जां दिनां ।१।
जिस दिन भी इस शरीर को छोड़कर हंस रूपी जीव प्रयाण करेगा तो इस शरीर रूपी कुटिया अथवा झूठी मायावी देह में अंधकार ही छा जायेगा। शरीर में ज्योति स्वरूप जीव का ही तो प्रकाश है जब मृत्यु आयेगी तो गढ़ रूपी शरीर में जबरदस्ती प्रवेश कर जायेगी उसे रोकने का कोई उपाय नहीं है। कोई भी मृत्यु के सामने धैर्य धारण करके लड़ नहीं सकेगा आखिर हार तो निश्चित ही है। न तो उस समय स्वयं ही धैर्य धारण कर सकेगा और न ही परिवार के सदस्य भाई-बन्धु मित्र ही सहायता कर सकेंगे। घर, गांव, शहर, जमीन, जायदाद सभी कुछ छोड़कर जाना होगा। मृत्यु अथवा काल ने अपना प्रभाव डाल दिया है तो फिर यहां से भागना ही होगा। मोह माया का धागा तोड़ना ही पड़ता है एक क्षण भी नहीं ठहर सकता। रे जीव ! जिस दिन तुम्हें यहां से निकलकर जाना होगा तब इस घर रूपी शरीर में अन्धकार छा जायेगा ।१।
वासो तो रैण को मेरा जी हो, माया मोह न मंडे । तरवर पंछिड़ा मेरा जी हो, उड़ि गया किण खंडे । उड़ि गया विहंगम गया किण खंडे, बहुड़ि न कियो फेर ही । एक चिंता हमें है उनकी, तजियो मोह घणेर हो । संसार मेल्हो बहुड़ि नाहि, साच नहीं सुपन्तरे । उड़िया विहंगम गया किण खंडे, रैण वासो तरवरै ।२।
यह संसार घरबार तो एक रात्रि का ही वासा है इसलिये एक रात्रि के निवास के लिये उस भवन से मोह-माया तो नहीं होनी चाहिये। जिस प्रकार किसी तरवर पर पंछी आ बैठते है और रात्रि निवास करके प्रातः काल उड़ जाते है उन्हें किसी प्रकार का मोह नहीं होता है। न जाने वे पक्षी प्रातःकाल उड़कर किस देश में जाकर बसेरा लेते है। वापिस लौटकर फिर उसी वृक्ष पर नहीं आते है उसी प्रकार से जीव भी तो इस शरीर रूपी वृक्ष को छोड़कर चला जाता है फिर लौटकर नहीं आता है। कवि कहता है कि मुझे एक ही बात की चिंता है कि जो लोग इतने मोह-माया में डूबे हुए थे परन्तु उन्होनें भी मोह छोड़ दिया और संसार से मिलने के लिये वापिस मुड़कर नहीं आये। उन्होनें सच्चाई का मार्ग अपनाया स्वप्न में भी कभी मुड़कर नहीं देखा वे ही लोग धन्य है किन्तु जिसके पास कुछ भी नहीं है फिर भी मोह ममता तोड़ नहीं पा रहे है। जबरदस्ती चिपके हुए है केवल छोड़ने का नाटक ही कर रहे है। चिन्ता तो उन लोगों की है। मोह-माया रहित जन तो पंछी की भांति निर्द्वन्द्व तथा मुक्त है संसार को एक वृक्ष ही समझते है ।२।
साथीड़ा पार लंघ्या मेरा जी हो, हम विच भुंयजल भारी । आज कै काल्हि छिना मेरा जी हो, तलबी ऊभा बारी । तलबी तो ऊभा बारि ठाढ़ा, भरम मत कोई भूलियो । संसार राता फिरै गाफल, अंत होय दुहेलियो । जां दिन काया तजै माया, साथि न मिल है मांगियां । हम विच भुंय जल अगम है भारी, म्हारा साथि पारि लांघियां ।३।
हमारे साथी तो भवसागर से पार उतर गये है किन्तु हम लोग तो संसार सागर में डूब चुके है। बीच धारा में बहते जा रहे है। शरीर की स्थिरता का कुछ भी पता नहीं है आज कल करते हुए समय व्यतीत होता जा रहा है। जब आयु व्यतीत हो जायेगी तो यम के दूत हाथ में फांसी लिये तैयार खड़े है। इस भ्रम में कोई नहीं रहना कि कौन देखता है, तलबी जवाब पूछने वाले बाहर ही खिड़की पर खड़े प्रतीक्षा कर रहे है। गाफिल मूर्ख तो संसार के रंग में रचा हुआ घूम रहा है यह नहीं देख रहा है कि अन्त में दुर्गति हो जायेगी। जिस दिन काया के साथ ही माया को छोड़ेगा तो तुझे कोई भी साथी नहीं मिल पायेगा। अकेला ही तो जाना है, यही विचार रहना चाहिये कि हम तो भूंयजल समुद्र की तुफान में डूबे जा रहे है परन्तु हमारे साथी पार उतर गये है ।३।
विसन जी री सेवा करो मेरा जी हो, हिरदै हरि ना विसारी । जन्म दुर्लभ है मेरा जी हो, औगुण गुन्हां निवारी । औगुण गुन्हां किया घणेरा, चित चहुंदिश धावही । नव पोल खूटे आयु टूटे, मरण नैड़ो आव ही । मिनखा देही दुर्लभ रे जीव, पड़यो संकट भारियां । पाप पराछत मेटि जम्भगुरु, हिरदै हरि न बिसारियां ।४।
सदा ही भगवान विष्णु की ही सेवा करते रहना। हृदय से एक क्षण भी विष्णु विलग न हो पाये। यह मानव जीवन अति दुर्लभ है इसलिये अवगुणों को छोड़ देना, कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना। यह चित चारों दिशाओं की तरफ स्वाभाविक ही दौड़ता है ऐसा न हो कि कहीं किसी की बुराई कर बैठे। इस शरीर के नौ पोल यानि दरवाजे है ये कभी भी टूट जायेंगे। इसमें से जीवात्मा निकलकर चला जायेगा। आयु पूरी हो जायेगी तो मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। बार-बार यह दुर्लभ मानव देह नहीं मिलेगी इससे छूटने के बाद किसी भारी संकट में गिर जायेगा। इसलिये हे प्राणी ! पापों का प्रायश्चित करो, जम्भगुरुजी तुम्हारी सहायता करेंगे। पापों को काट देंगे। हृदय में हरि विष्णु का स्मरण करो। एक पल भी ना भूलो ।४।