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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह25 / 156

साखी राग धनाश्री छन्दां की-25

ओ गुरु आयो झांभराज देव, निज हक साच पिछाणियो

कवि: ऊदोजी नैण

कवि परिचय — ऊदोजी नैण

जन्म विक्रम संवत 1505 तथा स्वर्गवास 1593। जाम्भाणी साहित्य में ऊदोजी नैण की कथा बड़ी रोचक एवं प्रेरणादायक है। पंथ में सम्मिलित होने से पूर्व गोठमांगलोद में महमाई मन्दिर के पुजारी थे। बिश्नोइयों की जमात के साथ जाम्भोजी की महिमा सुनकर सम्भराथल पर आये थे। जमात सहित जाम्भोजी का दर्शन ऊदोजी ने भी किया था। और ज्ञान वार्ता का भी श्रवण किया था ऐसा माहौल तथा विचार ऊदे ने प्रथम बार ही देखा था। ऊदो अपराधी की भांति पीछे छुपकर बैठा था। गुरुदेव ने ऊदे के अन्दर झांककर देखा था। उसमें कवित्व शक्ति की संभावना थी। उसे उजागर करने के लिये स्वयं गुरुदेव ने ऊदे को सम्बोधन करते हुए कहा-ऊदा तूं दूर क्यों बैठा है जरा सामने तो आओ। ऊदा अपनी करणी पर लज्जित होता हुआ सामने गुरु के चरणों में हाथ जोड़कर बैठा तब गुरुदेव ने कहा-भाई! कुछ भजन साखी तो सुनाओ। ऊदा ने हाथ जोड़ दिया और क्षमा मांगते हुए कहा- यदि आप कहो तो महामाता का भजन तो सुना दूं। गुरुदेव ने कहा-नहीं भाई! कुछ पिता के भी सुनाओ। पिता के भजन ऊदा कुछ भी नहीं जानता था। समिपस्थ बैठे हुए लोग ऊदे की अज्ञानता पर हंसने लगे, ऊदे को भी अपनी अज्ञानता पर हंसी आयी। गुरुदेव ने ऊदे के सिर पर हाथ रखा, वरद हस्त का स्पर्श होते ही अनुभव जागृत हो गया और तत्काल ही ऊदे ने प्रथम साखी का उच्चारण किया। ओ गुरु आयो। ऊदा गुरुदेव का शिष्य बन गया। महमाई की पूजा छोड़कर विष्णु की उपासना करने लग गया तथा गुरुदेव की सेवा में ही रहने लगा। ऊदे ने अपने जीवन काल में लगभग पन्द्रह साखियों की रचना की थी जो प्रायः जागरणों में गायी जाती है। तथा प्रसिद्ध चार आरतियों की रचना भी की थी जो नित्य प्रति गायी जाती है। इन रचनाओं के अतिरिक्त भी हरजस, सोहलौ, कूकड़ो, जखड़ी, छन्द, आख्यान कथाऐं आदि की रचना की थी। ऊदोजी तत्कालीन तथा अद्यपर्यन्त समाज के मान्य कवि है। इनकी रचनाऐं अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक है। साहित्य कला की दृष्टि से भी वे अपना महत्व रखती है। यहां पर उनकी साखियों एवं आरतियों की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। ऊदोजी की यह प्रथम साखी।

ओ गुरु आयो झांभराज देव, निज हक साच पिछाणियो । जां साधां नै देवे लो पार, मुख बोलै इमृत बाणियो । इमरत बाणी गुरु मुख बोले, सुरग सुख लीला पती । देवां को गुरु विसन जांभो, जतियां गुरु पुरो जती । पार गिराये देवै वासो, जे हक साच पिछाणियो । मिनख रूपी विसन आयो, मुख बोले इमरत बाणियो ।१।

ये गुरुदेव जाम्भेश्वर जी आये है। अपने प्रिय सच्चे एवं इमानदार भक्तों की पहचान करते है ऊदोजी कहते है कि मैनें अपने सच्चे स्वामी को पहचान लिया है। ये गुरुदेव साधु भक्तों को संसार सागर से पार उतार देंगे तथा अमृत ज्ञानमयी वाणी बोल रहे है। गुरुदेव स्वयं स्वर्ग की लीला के अधिपति है क्यों नहीं अमृत बाणी बोलेंगे। देवताओं के भी देवता गुरु जाम्भोजी विष्णु ही है तथा जतियों में भी पूर्ण यतीश्वर है। जो भी व्यक्ति इमानदारी से गुरु को पहचान लेगा उसे निश्चित ही संसार सागर से पार उतार देंगे। मानव रूप में स्वयं विष्णु ही आये है। यह बड़ा ही आश्चर्य एवं सौभाग्य है। मुख से अमृत वाणी बोल रहे है ।१।

ओ गुरु आयो बागड़ देश, जगमां कियो बाबै चांदणों । भगवत स भगवें भेस, बारां कोड़ी संमाहणौं । बारां कोड़ी संमाहणौ नै, तेरा सेवक होय रलि आवणो । तेतीस कोड़ी पारि पहुंचै, सुरगां हुवै बधावणों । सुरां गुरु संसार आयो, रलि पूगी थारे मोमणों । बागड़ देश आवाज तेरी, जग मां कियो बाबै चांदणो ।२।

ये गुरु तो इस बागड़ देश की भूमि में आये है जहां पर अति कठिन जीवन जीना है। यहां पर आकर अज्ञान के अन्धकार को हटाकर ज्ञान का प्रकाश किया है। भगवान स्वयं इस बार भगवें वेश में आये है। इस बार तो बारह करोड़ प्रहलाद पंथी जीवों का उद्धार करना है। जो भी जहां भी प्रहलाद पंथी जीव है वे सभी मिलकर सेवक निश्चित ही आ जायेंगे। इक्कीस करोड़ तो इससे पूर्व पहुंच चुके है। अब आगे बारह करोड़ जाकर उनसे मिलेंगे तो पूरे तेतीस करोड़ हो जायेंगे। उनसे मिलकर अति आनन्द हो जायेगा। देवता के गुरु विष्णु ही इस संसार में आये है ऐसा जानकर मोमण जन मिलकर आपके दरबार पहुंचे है। हे देव ! इस बागड़ देश में तो आपकी आवाज चहुं दिश फैल चुकी है और ज्ञान का प्रकाश हो चुका है ।२।

ओ गुरु आयो पूरो साह, विणज करो व्योपारियो । थानैं हुवलौ इधिको लाभ, कारण किरिया मत हारियो । कारण किरिया मत हारियो, भरम भूला ना रहियो । कुलोभ अरू अहंकार तजियो, रतन काया यूं लहियो । साधो अजर जरियो, मेर छोड़ो ताण थके हारियो । साच सिदक म्हारे श्याम सेती, विणज करो व्योपारियो ।३।

ये गुरु तो पूर्ण सेठ साहूकार की भांति यहां पर व्यापार करने के लिये आये है। व्यापार में लेना-देना होगा। यदि पूर्ण साहू के पास जो भी आयेगा तथा अपना व्यापार लेन-देन करेगा तो अवश्य ही लाभ में रहेगा। इस लाभ को व्यर्थ में ही गंवा मत देना। तथा वस्तु धर्म नियम लेकर उसे क्रिया द्वारा करके दिखाना, कहीं हार मत जाना। कारण क्रिया हारकर भ्रम में भूल मत जाना। भ्रम तुम्हें कहीं विपरीत पथ का अनुगामी न बना दे। कुलोभ अहंकार ये सभी त्याज्य है। इनके विपरीत संतोष, निरभिमान ये गुण ग्राह्य है। रतन काया के ये अलंकार है। जिन्हें ग्रहण अवश्य ही करना। हे साधों ! अजर सदा तुम्हें जलाने वाले काम क्रोधादि है इन्हें जला डालिये तथा मेरापन छोड़ दीजिये। जो कोई हो हो करता हुआ अग्नि सदृश आता है तो आप ठण्डे जल सदृश शीतल नम्र हो जाइये। ताकत रहते हुए भी क्षमा भाव रखिये। सच्चाई इमानदारी ये ही हमारे श्याम सुन्दर को प्रिय है। इसलिये यहां गुरुदेव आये है उन्हीं के साथ व्यापार अवश्य ही करें ।३।

थारो तीरथ निज थल थान, सो गुरु आयो भालियो । जिहिं गुरु का किरियां कोल, माथे बांध र पालियो । किरिया अनहद वरत मानो, जाणि जीवन धावियो । नुगरां सेती निंव खिंव चालो, पारि पहुंचो भावियो । राव राणा भरम भूला, राज करता मालिये । गरीब रूपी पही पूरो, सो गुरु आयो भालिये ।४।

कवि ऊदो कहते है कि हे गुरुदेव ! आपका तीर्थ तो यह सम्भराथल ही है इस थल पर हरि कंकेहड़ी के नीचे विराजमान आप मुझे बड़े ही प्रिय लगते है, आपकी क्रियाएं मुझे पसन्द आयी है। ये आपके नियम धर्म मैनें सुने है और आपका जो जीवन है मैनें अपनी आंखों से देखा है। मैं इन नियमों को शिरोधार्य करता हूं। तथा इनका पालन करने का प्रयत्न अवश्य ही करूंगा। अनहद नाद रूपी क्रिया चल रही है ऐसा मैनें आपके पास आकर अनुभव किया है। मैं फिर पूर्व जीवन की भांति नहीं जीऊंगा। पहले की भांति अपने ही जीवन के साथ खिलवाड़ नहीं करूंगा। नुगरे लोग जो उद्दण्ड है उनसे मैं नम्र होकर क्षमा करते हुए बर्ताव करूंगा न कि उन्हें शाप दूंगा। मैं उन्हें भी सद्मार्ग का पथिक बनाऊंगा। वे भी तो मेरे ही भाई-बन्धु है दूसरों की क्या कहें, राजा, राणा तो राज-पाट के भरम में भूल चुके है उसी में मदमस्त हो चुके है। उन्हें धर्म-कर्म की याद नहीं है। हे देव ! आप तो स्वयं गरीबी वेश में इस धरती पर पूर्ण रूपेण अवतार लेकर आये है वे बेचारे आपको क्या समझे किन्तु मुझे तो आप पसन्द आ गये है आप से प्रिय और मेरा कोई नहीं है ।४।

थारी नव खंड हुई छै आवाज, सम्भराथल गुरु आवियो । थारा साधां रा सारे लो काज, जे पुरो गुरु ध्यावियो । जिण पुरो गुरु ध्यावियो नै, सो सुरगां पुर जायसी । अपट पटोला सुरग हिंडोला, मानों चिंता पायसी । काज संभलो चड़ो बेड़े, पारि पहुंचो भावियो । नव खंड देश आवाज थारी, सम्भराथल गुरु आवियो ।५।

हे गुरुदेव ! आपकी आवाज यानि शब्दों की ध्वनि नव खंडों तक पहुंच चुकी है सभी देश देशान्तरों के लोग आ रहे है। आपके प्रिय साधु भक्त जनों का आप कार्य अवश्य ही करोगे जो भी पूर्ण रूपेण हृदय से गुरु का ध्यान करेगा कार्य तो उसका ही होगा। जिसने भी पूर्णतया जप ध्यान किया है वह तो भगवान के पास वैकुण्ठ धाम को पहुंच जायेगा। वहां पर पहुंच जाने पर फिर उन्हें किसी बात की चिंता नहीं रहेगी, सभी स्वर्गीय सुख सुलभ हो जायेंगे। मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जायेगी। इसलिये हे भक्तों ! शीघ्रता करो यदि कुछ कार्य करना अवशेष रह गया है तो उसे पूरा कर लो और गुरुदेव के बताये हुए धर्म रूपी बेड़े पर सवार हो जाइये, सतगुरु तुम्हें संसार सागर से पार उतार देंगे। यह कोई एक स्थान या थल विशेष की बात नहीं है। नव खंडों में गुरुदेव की आवाज पहुंच चुकी है। इसलिये सर्वोच्च शिखर सम्भराथल पर गुरु आये है ।५।