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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह26 / 156

साखी छन्दां की राग धनाश्री-26

गुरु की कथनि जुल्या मेरा बाबा, जहां का हरिया भाग

कवि: ऊदोजी नैण

कवि परिचय — ऊदोजी नैण

जन्म विक्रम संवत 1505 तथा स्वर्गवास 1593। जाम्भाणी साहित्य में ऊदोजी नैण की कथा बड़ी रोचक एवं प्रेरणादायक है। पंथ में सम्मिलित होने से पूर्व गोठमांगलोद में महमाई मन्दिर के पुजारी थे। बिश्नोइयों की जमात के साथ जाम्भोजी की महिमा सुनकर सम्भराथल पर आये थे। जमात सहित जाम्भोजी का दर्शन ऊदोजी ने भी किया था। और ज्ञान वार्ता का भी श्रवण किया था ऐसा माहौल तथा विचार ऊदे ने प्रथम बार ही देखा था। ऊदो अपराधी की भांति पीछे छुपकर बैठा था। गुरुदेव ने ऊदे के अन्दर झांककर देखा था। उसमें कवित्व शक्ति की संभावना थी। उसे उजागर करने के लिये स्वयं गुरुदेव ने ऊदे को सम्बोधन करते हुए कहा-ऊदा तूं दूर क्यों बैठा है जरा सामने तो आओ। ऊदा अपनी करणी पर लज्जित होता हुआ सामने गुरु के चरणों में हाथ जोड़कर बैठा तब गुरुदेव ने कहा-भाई! कुछ भजन साखी तो सुनाओ। ऊदा ने हाथ जोड़ दिया और क्षमा मांगते हुए कहा- यदि आप कहो तो महामाता का भजन तो सुना दूं। गुरुदेव ने कहा-नहीं भाई! कुछ पिता के भी सुनाओ। पिता के भजन ऊदा कुछ भी नहीं जानता था। समिपस्थ बैठे हुए लोग ऊदे की अज्ञानता पर हंसने लगे, ऊदे को भी अपनी अज्ञानता पर हंसी आयी। गुरुदेव ने ऊदे के सिर पर हाथ रखा, वरद हस्त का स्पर्श होते ही अनुभव जागृत हो गया और तत्काल ही ऊदे ने प्रथम साखी का उच्चारण किया। ओ गुरु आयो। ऊदा गुरुदेव का शिष्य बन गया। महमाई की पूजा छोड़कर विष्णु की उपासना करने लग गया तथा गुरुदेव की सेवा में ही रहने लगा। ऊदे ने अपने जीवन काल में लगभग पन्द्रह साखियों की रचना की थी जो प्रायः जागरणों में गायी जाती है। तथा प्रसिद्ध चार आरतियों की रचना भी की थी जो नित्य प्रति गायी जाती है। इन रचनाओं के अतिरिक्त भी हरजस, सोहलौ, कूकड़ो, जखड़ी, छन्द, आख्यान कथाऐं आदि की रचना की थी। ऊदोजी तत्कालीन तथा अद्यपर्यन्त समाज के मान्य कवि है। इनकी रचनाऐं अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक है। साहित्य कला की दृष्टि से भी वे अपना महत्व रखती है। यहां पर उनकी साखियों एवं आरतियों की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। ऊदोजी की यह प्रथम साखी।

गुरु की कथनि जुल्या मेरा बाबा, जहां का हरिया भाग । गढ़ वैकुण्ठ अलख लड़ी, चड़ी जोवै छै जी माघ । सदरंग कामण माघ जोवै, कदि साधु मोमण आयसी । नूर सतगुरु आस पूरवै, रतन काया पायसी । आरतो ले मुंध आवै, सुरगे बाजै दुंदुभी । अनन्त बधावा हुवै जां दिन, मंगल गावै मिल सही ।१।

हे मेरे बाबा ! कोई कन्या अपने पिता श्री से कह रही है कि गुरु जाम्भोजी के कथनानुसार जिन्होनें अपना जीवन जीना सीख लिया है, सभी मिलजुल कर चलने लगे है उनका तो बड़ा ही सौभाग्य है। इस संसार की मोह-माया में सार नहीं है ऐसा मानकर अपने सच्चे सुखमय घर वैकुण्ठ लोक में जाने के लिये प्रतीक्षा में खड़े है। ऐसा लगता है मानों वहां अलख के घर पर तो पंक्तिबद्ध खड़े लोग प्रतीक्षा कर रहे है। यहां संसार में भी संसार के मोह जाल से उपर उठकर उसी वैकुण्ठ का ही मार्ग देख रहे है। सच्चे रंग में ओत प्रोत युवती सदा ही मार्ग की तरफ देख रही है और प्रतीक्षा कर रही है। कोई भगवान का भक्त साधुजन आवे तो उससे मैं ज्ञान ग्रहण करूं। सतगुरु से किया हुआ प्रेम-स्नेह व्यर्थ में नहीं जायेगा। हमारी परम इच्छा जो मुक्ति की है वह पूर्ण होगी, यह काया छूट जायेगी तो कोई बात नहीं, वहां वैकुण्ठ पहुंचने के लिये तो दिव्य रतन काया मिलेगी जब वह रतन काया रूपी जीव वहां पहुंचेगा तो स्वागत के लिये अप्सराऐं आरती लेकर आयेगी तथा स्वर्ग में दुंदुभी बजाकर स्वागत करेंगे। उस दिन अनन्त बधावा गीत गाये जायेंगे, बधाइयां बांटी जायेगी ।१।

अलख लड़ी अरदास करै, मों पीव सूं कद मिले । तिहुं जुगै इकवीस कोड़ी पहुंची, हींडे सहज हींडोली । सहज हींडोलै तेरा साधु हींडै, दुख दालिद्र नां तहां । जुग चोथे विसन मेलो, इकवीस कोड़ी बाराहां । वैकुण्ठ बेड़ो विसन दीयो, सुचियारा साधां लेवसी । पार गिराय पहुंचाय स्वामी, वास निहचल देवसी ।२।

साधना में लगी हुई जीवात्मा अपने पति परमेश्वर से प्रार्थना कर रही है कि हे देव ! हे स्वामी ! आपसे मिलना कब होगा। आपके प्रिय भक्त जन तीनों लोकों में इकवीस करोड़ तो आपके पास पहुंच गये है। वहां पर स्वर्गीय सुख भोग रहे है। सहज में ही आनन्द के हींडोले पर लहरा रहे है। वहां पर तुम्हारे साधु सज्जनों को दुख नहीं है और न ही किसी वस्तु का अभाव ही है। इस चौथे कलयुग में विष्णु से भेंट हुई है तो अवश्य ही उन इकवीस से बारह को मिला देंगे ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। वैकुण्ठ में ले जाने के लिये इस ज्ञान ध्यान रूपी नाव को इस बार स्वयं विष्णु ने ही चलाई है, स्वयं खेवट बनकर भार उठाने का प्रण किया है, यह कार्य अवश्य ही पूर्ण करेंगे। यदि चलती नौका पर कोई सवार नहीं हो सका, पीछे रह गया तो फिर सदा के लिये ही रह जायेगा। स्वामी स्वयं पार पहुंचा देंगे और आगे भी सदा के लिये वैकुण्ठ में भी निवास देंगे इससे जन्म मरण का चक्कर छूट जायेगा ।२।

पार गिराय नित अजरा वर, गुरु साहिब सूं लिव लावणां । मोमणां ने मनसा भोजन, अमि कचोल पीवणां । अमि कचोल चीर पटोला, अखे खैणी बर कामणी । तेतीस गढ़ तेरा सदा निहचल, देव समर्थ तूं धणी । झणकार नेवर जोत रतना, कोड़ पायल पेखणां । दीदार आभै सभा तेरी, देव दई नित देखणां ।३।

वहां पर पहुंच जाने पर तो सदा अजर अमर हो जायेगा। वहां सदा गुरु स्वामी से प्रेम बढ़ेगा। वहां पर भक्तों को मनसा भोजन अमृत पान होगा। अमृत से बढ़कर और कोई संसार में या वैकुण्ठ में पदार्थ नहीं है। वहां सभी पदार्थों की पराकाष्ठा है तथा ओढ़नें पहनने के लिये चीर मिलेगा जो दिव्य होगा। वहां पर स्वागत सत्कार सेवा के लिये सदा अजर अमर एक रस रहने वाली अप्सराऐं होगी। हे देव ! यह तुम्हारा वैकुण्ठ गढ़ देव निवास सदा निश्चल रहने वाला है क्योंकि आप तो सर्व समर्थ सभी के स्वामी हो, आपके आसन के सामने सदा अप्सराओं द्वारा नृत्यगान, पायलों की झनकार, करोड़ों की संख्या में देखी जा सकती है। प्रेम स्नेह से भरी हुई तुम्हारी सभा सदा ही देखने योग्य है और देखने का सौभाग्य हमें प्राप्त हो सकेगा ।३।

धन्य हो म्हारा जीवड़ा रा राज, जो म्हानै सुरग मिलावै । सोई दत देई हो म्हारा कायम राजा, जो थारी गति भावै । दत देई दाता मुकति मनसा, रतन काया पार दे । देव सुरग मिलिया मोमण, सुर सभा दीदार दे । अति पात अनेक अप्सरा, हेत बहुरंग भाव । तेतीस कोड़ी मिले जानिल, बींद त्रिभुवन राव छै ।४।

हे कायमराजा ! आप सभी के स्वामी धन्य है, आप यहां आये है तो हम भी धन्य हो गये है। आप हमें स्वर्ग में ले जाने के लिये आये है। इससे बढ़कर हमारे लिये और क्या कार्य हो सकता है। हे सांई राजा ! आप हमें वही गति देना जो आपको अच्छी लगती है। वहां देव स्वर्ग में मिलेंगे, देव सभा का दर्शन होगा तो हम धन्य हो जायेंगे। अत्यधिक संख्या में वहां पर देव, अप्सराएं बहुत प्रकार से आनन्द के दाता है। वहां पर तेतीस करोड़ देवता ही बाराती है और दुल्हा स्वयं भगवान त्रिभुवन नाथ है। इस प्रकार से सदा ही उत्सव मनाया जाता है। आनन्द का आरपार ही नहीं है। हे देव ! आप हमें वहीं पहुंचा दें ।४।