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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह27 / 156

साखी छन्दां की राग धनाश्री-27

मैं तो म्हारो श्याम सपीहर, सिंवरीयो

कवि: ऊदोजी नैण

कवि परिचय — ऊदोजी नैण

जन्म विक्रम संवत 1505 तथा स्वर्गवास 1593। जाम्भाणी साहित्य में ऊदोजी नैण की कथा बड़ी रोचक एवं प्रेरणादायक है। पंथ में सम्मिलित होने से पूर्व गोठमांगलोद में महमाई मन्दिर के पुजारी थे। बिश्नोइयों की जमात के साथ जाम्भोजी की महिमा सुनकर सम्भराथल पर आये थे। जमात सहित जाम्भोजी का दर्शन ऊदोजी ने भी किया था। और ज्ञान वार्ता का भी श्रवण किया था ऐसा माहौल तथा विचार ऊदे ने प्रथम बार ही देखा था। ऊदो अपराधी की भांति पीछे छुपकर बैठा था। गुरुदेव ने ऊदे के अन्दर झांककर देखा था। उसमें कवित्व शक्ति की संभावना थी। उसे उजागर करने के लिये स्वयं गुरुदेव ने ऊदे को सम्बोधन करते हुए कहा-ऊदा तूं दूर क्यों बैठा है जरा सामने तो आओ। ऊदा अपनी करणी पर लज्जित होता हुआ सामने गुरु के चरणों में हाथ जोड़कर बैठा तब गुरुदेव ने कहा-भाई! कुछ भजन साखी तो सुनाओ। ऊदा ने हाथ जोड़ दिया और क्षमा मांगते हुए कहा- यदि आप कहो तो महामाता का भजन तो सुना दूं। गुरुदेव ने कहा-नहीं भाई! कुछ पिता के भी सुनाओ। पिता के भजन ऊदा कुछ भी नहीं जानता था। समिपस्थ बैठे हुए लोग ऊदे की अज्ञानता पर हंसने लगे, ऊदे को भी अपनी अज्ञानता पर हंसी आयी। गुरुदेव ने ऊदे के सिर पर हाथ रखा, वरद हस्त का स्पर्श होते ही अनुभव जागृत हो गया और तत्काल ही ऊदे ने प्रथम साखी का उच्चारण किया। ओ गुरु आयो। ऊदा गुरुदेव का शिष्य बन गया। महमाई की पूजा छोड़कर विष्णु की उपासना करने लग गया तथा गुरुदेव की सेवा में ही रहने लगा। ऊदे ने अपने जीवन काल में लगभग पन्द्रह साखियों की रचना की थी जो प्रायः जागरणों में गायी जाती है। तथा प्रसिद्ध चार आरतियों की रचना भी की थी जो नित्य प्रति गायी जाती है। इन रचनाओं के अतिरिक्त भी हरजस, सोहलौ, कूकड़ो, जखड़ी, छन्द, आख्यान कथाऐं आदि की रचना की थी। ऊदोजी तत्कालीन तथा अद्यपर्यन्त समाज के मान्य कवि है। इनकी रचनाऐं अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक है। साहित्य कला की दृष्टि से भी वे अपना महत्व रखती है। यहां पर उनकी साखियों एवं आरतियों की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। ऊदोजी की यह प्रथम साखी।

मैं तो म्हारो श्याम सपीहर, सिंवरीयो ।टेर। जुगत सूं जाणण जोग, नाम तेरा मन भावणां । म्हानें सुर तेतीसां सूं मेल, जां मिलिया अनंत बधावणां । बधावणां स्वामी नाम तेरे, सदा जीवड़ो हरखिये । दोष दालद दुरत नासै, कंवल ज्यूं मन विगसिये । सदा वरती श्याम सिंवरो, मोमणां रो धन्य जीयो । सुरां सेती मेल सतगुरु, जीवां काजै जपियो ।१।

मेरा और तुम्हारा तो स्वामी सर्वस्व मुरारी है वही स्मरण करने योग्य है। वह श्याम सुन्दर मनोहर युक्ति से जानने के योग्य है उसी का ही नाम मन भावन है। इसी नाम का सहारा लेकर तेतीस करोड़ देवताओं से मिलना होगा। जब देवों के साथ मिलन होगा तब अत्यन्त बधाइयां बंटेगी। हे स्वामी ! तुम्हारे नाम की अनन्त बधाइयां बंटेगी तभी यह जीव हर्षित हो सकेगा। मन की प्रसन्नता ही दुख दरिद्र द्वितीय भाव का नाश करने वाली है। ऐसी प्रसन्नता में मन कमल की भांति खिल उठेगा, विकसित हो जायेगा। सदा ही नियम से श्याम सुन्दर श्री विष्णु का स्मरण करो, जो ऐसा करता है जीवन तो उसी का ही धन्य है। विष्णु का जप किसलिये ? आगे बतला रहे है कि प्रथम तो देवताओं से मिलन तथा जीव की भलाई के लिये अवश्य ही स्मरण कीजिये ।१।

सतगुरु विन मुकति न होय, गुरु विन पंथ न पाइये । सुगरां मोमणां विन गोष्ठि न होय, मिलिया एकान्तिये । मिलिया मोमण दिल चोखा, ज्ञान गुरु को बोलिये । झूठ पर हर जीव मेरा, सांच रतियां तोलिये । आप शंभू सीख देवे, सहल उतम जोविये । साच विन को पार लीधै, गुरु विन मुक्ति न होविये ।२।

सतगुरु बिना मुक्ति नहीं मिलती एवं पंथ भी नहीं मिल पाता, बिना मार्ग तो सदा के लिये भटक जायेगा। भले ही कितने मिलते रहो तथा बिछुड़ते रहो, बिना सुगुरु-सुगरा तथा भक्त बिना ज्ञान गोष्ठि तो नहीं हो पाती, यदि गोष्ठि चाहते है तो अवश्य ही एकान्त में मिलकर ज्ञान वार्ता तथा गुरु की वाणी पर ही विचार करें अन्यथा व्यर्थ की बातें तो डुबो ही देगी। हे मेरा जीव ! झूठ बोलना छोड़ दे और सत्य को रतियों से तोलकर उसे बहुमुल्य समझकर धारण करें। आप स्वंभू भगवान ही उपदेश दे रहे है। सतसंगति उतम पुरूष के साथ ही करें। सच्चे स्वामी की शरण ग्रहण किये बिना कौन मुक्ति को प्राप्त हो सका है ? यह निश्चित अटल सिद्धान्त है कि गुरु बिना मुक्ति नहीं हो सकती ।२।

जिहिं गुरु परसादे पारि पहुंचा, सो गुरु एक मन जाणिये । जुगां-जुगां को तारण जंभराज, जे हक साच पिछाणिये । हक साच जिहिं पिछाण्यो, जुगे-जुगे जरणां जरी । पांच सात नव कोड़ि बारा, वास देवे अमरापुरी । पांच सात नव कोड़ी बारा, विखम भूंयजल लांघणां । तेरा नांव लिये दुख दुरति नासै, सिंवरो साहब आपणां ।३।

जिस गुरु देव की अपार कृपा से अनन्त लोग पार पहुंच चुके है उसको एक मन एक दिल से अवश्य ही जानना चाहिये। युगों-युगों का योगी जाम्भोजी आये है यदि इसमें वास्तव में सच्चाई है तो अवश्य ही शरण ग्रहण करनी चाहिये। जिसने भी हक साच की पहचान की है उन्होनें युगों-युगों तक जरणा रखी है, जरणां जोगी वह वास्तव में योगी है। पांच सात नव की तरह देव अन्य बारह करोड़ों को भी अमरापुर के वासी बना ही देंगे, अब अवसर आ चुका है। ये इकवीस करोड़ तथा बारह करोड़ अति दुर्गम भाव से पार उतरे है। हे देव ! आपका तो नाम लेने से ही दुविध्या दोषादि नष्ट हो जाते है ऐसे श्याम सुन्दर का हम नित्य ही स्मरण भजन करें ।३।

था विन अवर न कोय, थे दिरावो थे दिवो । पिता कुटुम्ब परिवार, हलति पलति तुम्हीं शरणै । शरण शम्भु सृष्टि करता, सहल उमति जोवियो । विखम भवजल भवन चवदह, मुक्ति खेत उतारियो । आस म्हारी करो पूरी, मांग मत घातो खता । भणै ऊदौ शरण थांरी, तूंहि दाता तूंहि पिता ।४।

हे देव ! आपके बिना इस सृष्टि में हमारा निजी और कोई नहीं है। जैसा आप करोगे वैसा ही होगा। आप ही तो दिलाने वाले है और आप ही देने वाले है। अन्य सांसारिक माता-पिता, कुटुम्ब परिवार सभी कुछ है तो सही किन्तु जब तक शरीर चलता है, उठता है, बैठता है तब तक है इसके बाद में कोई किसी का साथी नहीं है इसलिये हमने तो आपकी शरण ग्रहण की है। सृष्टि कर्ता स्वयंभू की हम तो शरण में हैं। परमात्मा के संग में ही अपनी उमंग कार्य कलाप होता देख रहा हूं। चवदह भवनों में तथा सभी जगहों पर फंसने का भय बना ही रहता है संसार तो एक सागर की ही भांति है। हे गुरुदेव ! आप ही हमें अपार संसार से पार उतारिये। हमारी बस यही आशा है अवश्य ही पूर्ण करो। हमारी इस पवित्र मांग में विघ्न नहीं डाल देना, कहीं लालच में चल कर भूला दिया तो हम डूब जायेंगे। ऊदोजी कहते है कि अब तो आपकी ही शरण है। हमारे तो आप ही दाता है और आप ही पिता सर्वस्व है ।४।