मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह149 / 156

हरजस-148

आछो लागै जी महाराज, दरसण जाम्भोजी को

कवि: साधु जगदीशराम जी

कवि परिचय — साधु जगदीशराम जी

"साधु जगदीशराम जी" जन्म संवत् 1960, ये भींयासर साथरी के भोलाराम के शिष्य थे। इनके लगभग बीस भजन, आरती, साखी, छन्द आदि प्राप्त हुए है। ये बिश्नोई प्राचीन कवियों की अन्तिम कड़ी कहे जा सकते है। आधुनिक कवियों एवं प्राचीन कवियों के बीच में सेतु का कार्य कर रहे है। नीचे एक साखी दृष्टव्य है यह साखी सरल भाषा में वेदान्त योग के विषय को उजागर करती है।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

आछो लागै जी महाराज, दरसण जाम्भोजी को ।टेक।

जोजन धुन सबदन की सुणिये, घट परमल की बास ।१।

चहूं दिस सन्मुख पीठ नहीं दीसै, कोड़ भाण प्रकाश ।२।

चालत खोज खेह नहीं खटको, नहीं दीसे तन छांय ।३।

तिसनां भूख नींद नहीं आवै, काम क्रोध घट नांय ।४।

भगवीं टोपी भगवों चोलो, भलो सुरंगो भेश ।५।

परमानन्द की विणती, मोहे संगत पार उतार ।६।