कवि परिचय — साधु जगदीशराम जी
"साधु जगदीशराम जी" जन्म संवत् 1960, ये भींयासर साथरी के भोलाराम के शिष्य थे। इनके लगभग बीस भजन, आरती, साखी, छन्द आदि प्राप्त हुए है। ये बिश्नोई प्राचीन कवियों की अन्तिम कड़ी कहे जा सकते है। आधुनिक कवियों एवं प्राचीन कवियों के बीच में सेतु का कार्य कर रहे है। नीचे एक साखी दृष्टव्य है यह साखी सरल भाषा में वेदान्त योग के विषय को उजागर करती है।
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भगवत आय भली बुध देवे, लेना है सो लेइयो।
सतगुरु आय संतां ने तार्यो, सद्मार्ग में लाइयो।
सतयुग में जब सृष्टि रची थी, भक्त प्रहलाद सहाइयो।
हिरणाकुश को मार गिरायो, भक्त हुवो शरणाइयो।
पंथ बिश्नोई कियो स्थापन, पंथि प्रहलाद कहाइयो।
त्रेता में जब सत्य हरिचंद, सत का पथिक बनाइयो।
बिछुड़े जीवों को पार किया तब, बिश्नोई पन्थ अनुसरियो।
द्वापर में जब राव युधिष्ठिर, युद्ध में वीर कहाइयो।
बिश्नोई मार्ग सत्य का पालक, सत्य सदा द्वापुरियो।
कलिकाल कहूं कठिन कराला, संत भक्तां नै दुभरियो।
विष्णु व्यापक सदा ही सहायक, जाम्भा रूप अवतरियो।
प्रहलाद भक्त कवल के कारण, मरूधर में सुहाइयो।
ज्ञान ध्यान उपदेशक स्वामी, अद्भुत रूप दिखाइयो।
भगवां वेश भक्त भव हारी, भगतां आप भजाइयो।
जाट भाट जोगी सन्यासी, सबकूं समता सिखाइयो।
सब ही नर नारायण रूप, विश्व रूप नरहरियो।
प्रभु जी आय दर्शन दिखाये, ज्ञान सुण्या भवतरियो।
भजन बताया गुरु जाम्भेश्वर ने, विष्णु विष्णु उच्चरियो।
नियम नव बीस दिये जग पालक, आवागवण चुकाइयो।
कृष्णानन्द खड़ो कर जोड़े, अब लीज्यो अपणाइयो।
तेरे गुणों को गावण चाहूं, बुद्धि बल बिगसाइयो।
लेखक द्वारा रचित यह साखी भी इन साखियों के महा समुद्र में बूंद की भांति सम्मिलित की गई है। समुद्र में मिल जाने से बूंद का अस्तित्व नहीं रहता क्योंकि बूंद भी तो समुद्र का ही अंग है। समुद्र से मिलकर प्रसन्नता का ही अनुभव करती है। इस प्रकार से साखियों का संग्रह हुआ है। अब आगे साखियां एवं फुटकर छन्द दिये जा रहे है जो साखियों से पूर्व गाये जाते है।