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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह151 / 156

साखी-कथा गोपीचन्द की 150

मेल्ह बाजोट खवास बुलाया, गरम गंगोदक मंगवाया

कवि: हरियो (योगी हरिराम जी)

इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।

मेल्ह बाजोट खवास बुलाया, गरम गंगोदक मंगवाया। सेखत पाक अंग लगावै, कंचन वरणी काया ।१।

चोवा चंदण अंग पर मलै, जोवै सति माता। कां रह्यो जोवन का रही काया, है ये लेख विधाता ।२।

गोपीचन्द ज्यों न्हांण संजोयो, रोई मेणावती माई। बादल नाही ना कोई विरखा, बूंद कहां ते आई ।३।

ऊंचो देख गोपीचन्द राजा, रोवै मेणावती माई। कांय माता म्हारी अन्न धन उणों, कांय थारै अणराई ।४।

ना गोपीचन्द अन्न धन उणो, नां म्हारे अणराई। ऐसी देह थारे पिताजी री हुंती, जल बल हुई छांई ।५।

आही डंबर आही हांणी, कुं कुं वरणी थी देहा। ऐसी देह थारे पिताजी री हुंवती, जल बल हुई खेहा ।६।

कुण गुरु करि थरपूं री माता, करूं कुणां की सेवा। सोई दिश दाता होय मेरी, अमर हुवै मेरी देहा ।७।

पूर्व पछिम देश परहरो, उतर दिखण न जाई। अमर हुवै गोपीचन्द राजा, भणै मेणावती माई ।८।

उतर देश बंगाला भणीजै, पच्छिम भणीजै रोगी। बारह बरष मोये राज करण दे, पीछे होऊंगा जोगी ।९।

कहां पिता तेरो गोपीचन्द, कहां तेरा बहण अरू भाई। वे ही ज्यों तुम जावोगे, देह चर ले लो काई ।१०।

जाहुं रमियो जाहुं खेल्यो, जामण भोम सवांई। अवर सब कुछ तजस्यों माता, धोलगढ़ तज्यो न जाई ।११।

कित गया धोलागर राजा, कितना हस्ती घोड़ा। माता मेणावती इण पर बोलै, कलि मां जीवण थोड़ा ।१२।

चकवे मण्डली गया सब देखो, सुरपति नरपति सोई। आसा तिसना मार लिया सब, रहण न पावै कोई ।१३।

गोपीचन्द संजम लियो, सोर पड़यो गढ़ मांही। राज तज्यो जोगूंटो लियो, फिकर किसी की नांही ।१४।

आय आंगण थारी कुंवरी झुरवै, महल अन्तेवर राणी। मन्दिर बैठी माता झुरवै, नैणे आवे छे पाणी ।१५।

राज तज्यो जोगूंटो लियो, वनखंड किया डेरा। हाथ पतर भिछिया ने चाल्यो, मन ते छाडी मेरा ।१६।

कहे गोरख सुण गोपीचन्द, भिछिया कहां से ल्यायो। खीर खांड से पतर छलायो, जोगूंटो सझण नै आयो ।१७।

हुवो निरालंभ पहरो धोती, अंग भभूति लगावो। पहले भिक्षा घरां से ल्यावो, पाछे शहर फिरि आवो ।१८।

गोरख वचन सुण गोपीचन्द, अंग भभूति लगाई। सज सिणगार अन्तेवर आई, थारे कांसूं मन आई ।१९।

किण जोगी जोगूंटो दियो, कुण था सीख चड़ायो। किण जोगी थारो मन हर लियो, किण राजिन्द्र भरमायो ।२०।

जालंधर यो जोगूंटो दीयो, गोरख सीख चड़ायो। मोह चक्कर में हूं भरम्यो थो, सांसो सोक मिटायो ।२१।

माया मोह मेर हम छाडी, थूक्या मने न भावै। तूं जांणे राज ललचावूं, बोहड़ी धोलागढ़ आवै ।२२।

जोगी होयकर राजा हुवा, हंसे दुनिया सवाई। मन राजा उनमन धीर आणों, सुन्दरी सुमति सुहाई ।२३।

थे राजा जोगूंटो लियो, आंगण मढ़ी चिणाऊं। चोवा चंदण अंग परमल, आसण बाग लगाऊं ।२४।

सोने रो थे पतर करावूं, हीरा लाल जड़ाऊं। खीर खांड सूं पतर पुरावो, ऊपर चंवर ढुंलावूं ।२५।

बाग बगीचा इम घर हुंता, खैण धोलागिर हुंती। सोना रूपा घर ही घड़ता, आंण जम्बू में फिरती ।२६।

खीर खांड जीमता राजा, अब क्यूं भिक्षा भावे। एक घर छोड़या दोय घर मांग्या, भुगति भली पर भावै ।२७।

कड़वा मीठा और चरचरा, जिभ्या कूं रस आवै। आहार करां मन कूं वस सुन्दरी, जिभिया ना थिर होवै ।२८।

पिलंग पथरणा पोढ़ा राजा, अब क्यों निंदरा आवै। सिला सिंघासण ईंट ओसीस, सुख सूं रैण बिहावै ।२९।

मां को सीख हुवो वैरागी, मुंध पड़ी मुरझाई। कहै मेणावती सुण राजिन्दर, दर्शन दीजो आई ।३०।

तिण ज्यों तोड़ चल्यो राजिन्दर, परजा दुनि बोलावै। डावी दिसां का सूणज बोल्या, बोहड़ी धोलागढ़ नहीं आवै ।३१।

गोपीचन्द जी रामत रमंतो, पर मैं नगर गढ़ आयो। देख तमासो सूल सहर को, नायक नाद बजायो ।३२।

होय अवधूत जोगेन्दर बैठो, काया भभूति चड़ाई। दरसण परसण दुनियां आवै, सुण सुण लोग लुगाई ।३३।

निगह निगह कर नारी पूछै, कवण दिशा ते आयो। कहि नै उतपति थारी बाला, किण थानै सबद सुणायो ।३४।

के दध आखर माता कहियो, के कहियो कोई नारी। जिण कारण थे जोगी हुवा, सोई विधि कहो तुम्हारी ।३५।

ना दध आखर माता कहियो, ना कहियो कोई नारी। माता मैणावती सुपह बतायो, अमर कियो संसारी ।३६।

मरियो मरियो असड़ी माता, जिण ओ कंवर विसार्यो। दूजी दुनिया दरसण आवै, क्यों नारी नेंह निवार्यो ।३७।

रहो रहो म्हारी माई बहणा, म्हारी मां कूं दोष न देणा। माता मैणावती घणां दिन जीवो, मुख बोलो इम्रत वैणां ।३८।

सुरख बात सुणी सहर मां, राज महले राणी। सोच कियो सोहेलाली सुन्दरी, नैणे आवै पाणी ।३९।

माता मैणावती मांय भणीजै, तूं गोपीचन्द भाई। मर मर जाऊं थारी सुरत नै, बहण मिलण ने आई ।४०।

गोपीचन्द जी हित कर मिलियो, भाई भुजा पसारी। धीरज करो गहो मन गाढ़ो, गोपीचन्द भिखियारी ।४१।

गोपीचन्द बोल जो बोल्या, गह भरि नैण जो आया। एकर सौ घर चल मेरा बीरा, बहनड़ शब्द सुणाया ।४२।

बात करि सो सति करि मानी, बहनड़ बात विचारी। तुम साहेब गढ़पति राजा, हम जोगी भेष धारी ।४३।

ऊंचे मन्दिर चढ़ै और जोवै, निरख चहूं दिश न्हालौ। होय दिलगीर नै सांसौ घात्यो, पंथी पंथ संभालो ।४४।

रिण मां रहता वन मां बसता, देश दिशावर फिरता। कह भरथरी सुणों गोपीचन्द, राज ज किस गढ़ करता ।४५।

हींवर हस्ती गौड़ करंता, सिंघ वराहा लड़ता। घड़ नाऐ म्हे बस तिरंता, समंदा री लहरा लीता ।४६।

हर दिन मां हर कोड पड़न्ता, घुरत पखावज बाजा। खांडी खपरी ले निसरियो, धोलागिर को राजा ।४७।

बोह सुख तजिया राजा हवै जोगी, चुको जामण मरियो। गोरख वचनें गुरु प्रसादे, गावै जोगी हरियो ।४८।

यह साखी गोपीचन्द के योग धारण के सम्बन्ध में योगी हरिरामजी द्वारा रचित है। इस साखी में गोपीचन्द की बड़ी ही मार्मिक कथा कही है। एक राजा होकर अपनी माता के कहने पर सहर्ष योग धारण कर लिया और राज पाट को तिनके के समान त्याग दिया। वह समय था जब कोई वैराग्य को धारण करके सच्चे योगी बन करके अपने जीवन का कल्याण कर लेते थे। उस समय का ऐसा वातावरण ही था जो राज्य से भी बढ़कर योग साधना तथा अपने जीवन का कल्याण तथा जीवन मुक्त होनें की किमीया लोग जानते थे। अन्यत्र साखी में भी कह आये है कि "कलयुग दोय बड़ा राजिन्दर गोपीचन्द भरथरियो जीवनै, अमर हुवा संसार में गोपीचन्द अरू भरथरी" शब्दों के प्रसंगों से भी पता चलता है कि गुरु जाम्भेश्वरजी के पास सम्भराथल पर गोपीचन्द और भरथरी आये थे उन्होनें सैनी से कुछ वार्तालाप भी किया था। उस प्रसंग में शब्द भी सुनाया था। "सुण गुणवंता सुण बुधवन्ता मेरी उत्पति आदि लुहारू" शब्द ९६। गोपीचन्द और भरथरी की जोड़ी सदा सदा के लिये अजर अमर हो गई। कहते है कि अब भी ये दोनों जीवित है। ऐसा योग का उतम प्रभाव है जो मृत्यु को भी योग साधना के द्वारा जीता जा सकता है। किन्तु इस समय ऐसा वातावरण सुलभ नहीं है और न ही ऐसा सिद्ध पुरूष गुरु ही प्राप्त है और न ही चेला ही तैयार है। "कबही को गृह उथरी आवै, सैतानी साथे लियो"। ऐसी दशा इस समय हो चुकी है।