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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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विविध छन्द

विसन जमै के देत ही, पाप विलय हो जाय

कवि: विविध छन्द

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

विसन जमै के देत ही, पाप विलय हो जाय । वरष एक में गुरु वचन, जमो करो चित लाय । जमो करो चित लाय, गऊ दस को पुन होई । मन इच्छित प्रवाण, सुरग में प्राप्ति सोई । अन्न धन लिछमी चौगुणी, पुत्रा हुवै हुलाश । एक गऊ को पुन हुवै, सुणे सुणावै तास ।१।

नागौर के परगने, जिले जोधपुर जांण । पींपासर में प्रकाशिया, सही जे उग्यो भांण । शीश धरणी धर करत हूं, नमस्कार सौ बार । इष्ट देव बाबो जम्भ गुरु, लीला हित अवतार । पींपासर प्रकाशिया, गुरु देवन के देव । ब्रह्मादिक पावै नहीं, अद्भुत जांको भेव ।२।

तपै गगन्दर सूर चन्द्र, पणि एको छाजै । पणी नाऊ एक पवण, पणि एको बाजै । महि पणि एको एक, वासुदेव एकलवाई । जम्भ गुरु पणि एक डरे, डर जपो रे भाई । घणां रूप आगे किया, मान गर्व दैत्या मल्यो । जम्भ सरीखो इसो गुरु, जुग जुग ओहि संभल्यो ।३।

पुरूष प्रगटयो एक, पाप पुनि भेद कथन्तो । नही भूख तिस नींद, रहयो निरंकार निरंतो । रूख बिरख विश्राम, तजि मन हूं तै माया । मेड़ी मण्डप कोट, तजि घर मन्दिर छाया । वील्हा सोच विचार अब मन, साधां गुरु सांचो मिल्यो । जम्भ सरीखो इसो गुरु, जुग जुग और न सांभल्यो ।४।

धन्य ही जंगल सम्भराथल, धन्य ही बाल गुंवाल । जां के संग सतगुरु रम्यो, लालण लिल्ल भंवाल । हरि कंकेहड़ी धन्य जहां, प्रभ कियो प्रवेश । रूंखां बल रल आवणां, रमतो बालो वेश । परच्या पशु अरू पक्षिया, जीवां उतम जात । हुवा पवित्र जोत सी, परची गुप्त न्यात । धन्य दिहाड़ौ रेण ही, प्रगट्यो गुरु संसार । वील्ह कहै जेहि ओलख्यो, तेहि उतरसी पार ।५।

दूदा दसोटो दियो, मन में घणो सधीर । कूवै ऊपर निरखियो, जग तारण जम्भ वीर । थलिये ओट दूदो मिल्यो, तुठा सारा काज । जब लग खांडो राखसी, तब लग निश्चल राज । दूदा दुर्जन पालटै, जे चढ़ आवै भूप । आज्ञा छै जम्भदेव की, अग्नि दीजै धूप ।६।

नवण करूं गुरु जम्भ को, निऊं निर्मल भाय । कर जोड़ै बंदो चरण, शीश निवाय निवाय । निवणी खिवणी विणती, सब सूं आदर भाव । कह केशो सोई बड़ा, जिहिं में घणां समाव । आम फलै नीचो निवै, ऐरण्ड ऊंचो जाय । नुगुर सुगुर की पारखा, कह केशो समझाय ।८।

देवजी तेरे नाव नै, साधु बलिहारी जाव । हूं बलिहारी जो मोमिणां, जपै जो तेरा नांव । सतगुरु विणजारो हुवो, गुण्यां छली रतनाह । सत सुकरत क्रिया धर्म, लइयो पार खुवांह ।९।

अड़वो चुगै न चुगण दै, माणस की उणियार । वील्ह कहै रे भाइयो, सूम बड़ो संसार ।१०।

सुवा सुफरा बोलिये, विफरा बोलो कांव । छन्दां ज्यांरा छाइये, जिण रे बसिये गांव । जैसे कूवा जल बिना, खिण्या ज कैसे काम । मिनखा देही पायकर, भजो नहीं भगवान । दीसण लागा रूंखड़ा, नेड़ो आयो गांव । परसा विलम्ब न कीजिये, लीजै हरि को नाम ।११।