इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
जाम्भोजी संभराथले, बेठा आसन धार ।
स्वर्ग दिखाकर पूल्हव को, शंका दीवी निवार ।टैक।
पन्दरा सौ बंयालिये, विक्रम सम्वत् विचार ।
लागत काती मास में, आठम वदि गुरुवार ।।
ऐक पहर दिन जब चढ़ियो, ओ३म् विष्णु जप धार ।
कलश पास जम्भ विराजिया, पास में पूल्हव पंवार ।।
कलश हाथ पूल्हव दियो, जाम्भोजी मंत्र उचार ।
माला ओ३म् विष्णु नाम की, जब घूमी जल मंझार ।।
ओ३म् विष्णु के नाम से, भयो पाहल तइयार ।
बिश्नोई पंथ प्रकट कियो, पहला पूल्ह पंवार ।।
पाहल दियो ऐकल प्याले, पूंण छत्तीस संभार ।
चहुं चक का मिल मानवी, पाहल पिया उंणवार ।।
आठम अमावश बीच में, पंथ चाल्यो इकतार ।
भव सागर की जहाज है, चढ़े सो उतरे पार ।।
काज होवे भल जीव को, टले जमो की मार ।
ओ३म् विष्णु ऐक मूल है, सब जग रचने हार ।।
जाए जीव मत पूजियो, गुरु कहै दिये मंत्र उचार ।
रामकरण कहै देव है, ऐक ओ३म् विष्णु करतार ।।