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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी - कवि रामकरण

जाम्भोजी संभराथले, बेठा आसन धार

कवि: रामकरण जी पूनियां

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

जाम्भोजी संभराथले, बेठा आसन धार ।

स्वर्ग दिखाकर पूल्हव को, शंका दीवी निवार ।टैक।

पन्दरा सौ बंयालिये, विक्रम सम्वत् विचार ।

लागत काती मास में, आठम वदि गुरुवार ।।

ऐक पहर दिन जब चढ़ियो, ओ३म् विष्णु जप धार ।

कलश पास जम्भ विराजिया, पास में पूल्हव पंवार ।।

कलश हाथ पूल्हव दियो, जाम्भोजी मंत्र उचार ।

माला ओ३म् विष्णु नाम की, जब घूमी जल मंझार ।।

ओ३म् विष्णु के नाम से, भयो पाहल तइयार ।

बिश्नोई पंथ प्रकट कियो, पहला पूल्ह पंवार ।।

पाहल दियो ऐकल प्याले, पूंण छत्तीस संभार ।

चहुं चक का मिल मानवी, पाहल पिया उंणवार ।।

आठम अमावश बीच में, पंथ चाल्यो इकतार ।

भव सागर की जहाज है, चढ़े सो उतरे पार ।।

काज होवे भल जीव को, टले जमो की मार ।

ओ३म् विष्णु ऐक मूल है, सब जग रचने हार ।।

जाए जीव मत पूजियो, गुरु कहै दिये मंत्र उचार ।

रामकरण कहै देव है, ऐक ओ३म् विष्णु करतार ।।