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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह169 / 156

साखी (बीरबल खीचड़ की), छप्पइया, दूसरी साखी

सतयुग धर्म विशेष, चार पेर बतलाया

कवि: रामकरण जी पूनियां

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सतयुग धर्म विशेष, चार पेर बतलाया । त्रेता में पग तीन, द्वापर दोय गिंणाया ।। कलियुग में पग ऐक, डिगे है चहुं दिश भारी । धर्म हीण संसार, घात करे नर नारि ।। कलियुग बहे करूर, पाप पूरे जग छावियो । अबखी बेलां मांय, बीरबल धर्म कमावियो ।। साखी छन्दां की हरिणां तणो शरीर, बीरबल खीचड़ ने दियो ।

करोड़ तेतीसां सीर, बास बेकुठां में कियौ ।टैक।

बास बेकुठां में कियो नै, विष्णु भक्त सुजाण । फलोदी रे परगनै, अरू जीला जोधपुर जान ।। लाछां जांगु लाडलो नै, सुत बिड़दे रो वीर । गांव लोहावट ढाणियां में, हरिणा तणों शरीर ।। बीरबल खीचड़ नें दियो ।१।

सहंस दोय चौंतीस, विक्रम सम्वत् बखाणीयो । मास मिंगसर रे बीच, शनी सातम सुध जाणीयो । शनी सातम सुध जाणियो नैं, बेठो गोवल मंझार । खड़को हुवो बन्दूक रो नै, कान पड़ी भणकार ।। दोड़्यो बीरबल माला जपतो, सुमिर रयो जगदीश । मरियो मिरघो देखियो नै, सहंस दोय चौंतीस ।। विक्रम सम्वत् बखाणियो ।२।

पकड़ लिया उण वार, पापी थर्र थर्र काम्पीया । देख्यो कंध करार, हतियारा मन हांफिया ।। हतियारा मन हांफिया नै, छोड़ै नहीं लिगार । गोली मारी बुरी बिचारी, पापी हुवे फरार ।। हरिण बराबर सोयो धर्मी, छोड़ मोह परिवार । बिश्नोई पूरो खरो नै, पकड़ लिया उण वार ।। पापी थर्र थर्र काम्पीया ।३।

बूचे भक्त सुमार, साबत धर्म नें राखियो । अंत सुमिर करतार, निवंण बीरबल भाखियो ।। निवंण बीरबल भाखियो नें, चूण साथरी हेत । जीव ना मारे रूंख ना घावे, बिश्नोईयां रे खेत ।। दोजक में पापी पड्या नै, स्वर्ग गयो सुचियार । रामकरण साखी भणे नै, ओ३म् विष्णु आधार ।। साबत धर्म नें राखियो ।४।