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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह170 / 156

साखी-निहालचन्द

लख चौरासी जूण, सब भगवंत की रचना

कवि: रामकरण जी पूनियां

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

लख चौरासी जूण, सब भगवंत की रचना । भरण पोषण निज हाथ, खालक घर कोई खंचना ।। दया कर पालै जीव, दयालु दया के सागर । अहित करे ना कोय, सबका हितेसी परमेश्वर ।। पापी मारे जीव, धर्मी जन रक्षा करे । पर स्वार्थ के काज, जीव सटै बिश्नोई मरे । साखी छन्दां की निहालचन्द जग मांय, बारहा करोड़ संग मानिये ।

चूरू जीला कहलाय, गांव सावंतसर जानिये ।टैक।

गांव सांवतसर जानिये नै, डूंगरगढ़ तहसील । आये शिकारी हरिण मार लिये, करी ना ऐक पल ढील ।। निहालचन्द बिश्नोई धारणियां, भगवंत ध्यान लगाय । हतियारों को जा ललकारा, जल्दी पहुंचिया जाय ।। गांव सांवतसर जानिये ।१।

शिकारी हरिण लिये मार, ऊंटों पर ले भागिया । कांकड़ टिपण दिया नांय, पीछे निहालचन्द लागिया ।। पीछे निहालचन्द लागिया नै, सब को घेरा जाय । बोला निहालचन्द हरिण मारिया, तुम्हें भागण दूं नांय ।। सजा भोगणी पड़सी तुमको, कहै दिये बचन सुनाय । बिश्नोईयों की कांकड़ में क्यों, हरिण मार लिये आय ।। पीछे निहालचन्द लागिया ।२।

जय भगवंत री बखाण, सनमुख डट गया सूरवां । सीना लिया अपणां तांण, दुष्टों का उखड़िया पेर वहां ।। दुष्टी का गया पेर उखड़ वहां, सभी गए घबराय । गोली मारी निहालचन्द के, धरणी दिया गिराय ।। भगवंत कृपा निहालचन्द पर, ओ३म् विष्णु को ध्यान । गिरा ऊंट से दुष्ट शिकारी, ऊंट लात गए प्रान ।। दुष्टों का उखाड़िया पेर वहां ।३।

आए बिश्नोई चाल, बाकी दुष्ट सब भागिया । विष्णु सिंवर ततकाल, निहालचन्द स्वर्ग सिधाविया ।। निहालचन्द स्वर्ग सिधाविया नै, पापी डूबे मंझधार । आसोज वदी सप्तमी के दिन, कहिये वार गुरुवार ।। दो हजार अरु त्रेपने में, विक्रम सम्वत् को साल । रामकरण कहे ओ३म् विष्णु जप, साखी कथी है संभाल ।। निहालचन्द स्वर्ग सिधाविया ।४।