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पहलो जम्मलो संभराथल पर, जाम्भोजी आप रचायो जीवनै ।टेक।
पन्दरहा सौ का सम्वत् तंईयाला, फागुण मास बतायो ।
सोमवार वदी चवदश मेलो, संभराथल भरवायो ।।
दूजो जम्मलो बाजे के घर, जाम्भोजी आय लगायो ।
तरड़ गोत्र जसरासर मांही, जाम्भोजी ज्ञान सुणायो ।।
सांझे जम्मो सवेरे थापण, गुरु की नाथ डरायो ।
वर्ष एक में जम्मलो करिये, हित कर शब्द सुणायो ।।
प्रेम भाव से जम्मलो रचावो, सुकरत काम भोलायो ।
साधन भजन ओ३म् विष्णु का, उनसे ही भाव बढ़ायो ।।
जेसा कर्म करे जो प्राणी, वेसो ही फल पायो ।
ओ३म् विष्णु एक साच नाम है, साचो नाम जपायो ।।
निराकार साकार वही है, भजे सो उनको पायो ।
आन देव को कभी ना पूजो, पाखंड घोर हटायो ।।
धर्म नियम गुणतीस बताकर, धारण भी करवायो ।
द्वेश भाव किणसूं नहीं राख्यो, क्रिया सार बतायो ।।
साधे मोमणे आज्ञा मान कर, रल मिल जम्मो छवायो ।
नर नारि जम्मले में आवो, राखे हेत सवायो ।।
प्रीती कर गुरु बचन निभावो, भर्म को दूर भगायो ।
रामकरण कहै ओ३म् विष्णु शरणे, साचो साच सुणायो ।।
गुरु मुख होय ज्ञान गुण धारी, शब्द गुरु दर्शायो ।
पहलो जम्मलो संभराथल पर, जाम्भोजी आप रचायो ।।
उपर्युक्त चार साखियां रामकरण जी पूनियां द्वारा रचित साभार संग्रहित की गई है ।