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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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जागरण

पहलो जम्मलो संभराथल पर, जाम्भोजी आप रचायो जीवनै

कवि: रामकरण जी पूनियां

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

पहलो जम्मलो संभराथल पर, जाम्भोजी आप रचायो जीवनै ।टेक।

पन्दरहा सौ का सम्वत् तंईयाला, फागुण मास बतायो ।

सोमवार वदी चवदश मेलो, संभराथल भरवायो ।।

दूजो जम्मलो बाजे के घर, जाम्भोजी आय लगायो ।

तरड़ गोत्र जसरासर मांही, जाम्भोजी ज्ञान सुणायो ।।

सांझे जम्मो सवेरे थापण, गुरु की नाथ डरायो ।

वर्ष एक में जम्मलो करिये, हित कर शब्द सुणायो ।।

प्रेम भाव से जम्मलो रचावो, सुकरत काम भोलायो ।

साधन भजन ओ३म् विष्णु का, उनसे ही भाव बढ़ायो ।।

जेसा कर्म करे जो प्राणी, वेसो ही फल पायो ।

ओ३म् विष्णु एक साच नाम है, साचो नाम जपायो ।।

निराकार साकार वही है, भजे सो उनको पायो ।

आन देव को कभी ना पूजो, पाखंड घोर हटायो ।।

धर्म नियम गुणतीस बताकर, धारण भी करवायो ।

द्वेश भाव किणसूं नहीं राख्यो, क्रिया सार बतायो ।।

साधे मोमणे आज्ञा मान कर, रल मिल जम्मो छवायो ।

नर नारि जम्मले में आवो, राखे हेत सवायो ।।

प्रीती कर गुरु बचन निभावो, भर्म को दूर भगायो ।

रामकरण कहै ओ३म् विष्णु शरणे, साचो साच सुणायो ।।

गुरु मुख होय ज्ञान गुण धारी, शब्द गुरु दर्शायो ।

पहलो जम्मलो संभराथल पर, जाम्भोजी आप रचायो ।।

उपर्युक्त चार साखियां रामकरण जी पूनियां द्वारा रचित साभार संग्रहित की गई है ।