कवि परिचय — साधु जगदीशराम जी
"साधु जगदीशराम जी" जन्म संवत् 1960, ये भींयासर साथरी के भोलाराम के शिष्य थे। इनके लगभग बीस भजन, आरती, साखी, छन्द आदि प्राप्त हुए है। ये बिश्नोई प्राचीन कवियों की अन्तिम कड़ी कहे जा सकते है। आधुनिक कवियों एवं प्राचीन कवियों के बीच में सेतु का कार्य कर रहे है। नीचे एक साखी दृष्टव्य है यह साखी सरल भाषा में वेदान्त योग के विषय को उजागर करती है।
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
आवो मिलो साधो मोमणों, देखो जुमले री लोय जे।
जाग्रत को स्थूल है, विश्व नेत्र जोय जे।
बेखरी बाणी ऋगवेद की, ब्रह्मा देव पिछाण जे।
क्रिया शक्ति जाणिये, अकार मात्रा जांण जे।
स्वप्न में सूक्ष्म कही, तेजस कण्ठ रहाय जे।
मध्यमा वाणी यजुर्वेद की, सरस्वती गुरु कल्याण जे।
ज्ञान की शक्ति जाणिये, उकार मात्रा प्रवाण जे।
त्रिकुटि लख लीजिये, सही उगसी भाण जे।
कारण की सुषुप्ति, हृदय प्राज्ञ निहार जे।
पश्यन्ति वाणी साम वेद की, शिवदेव समझे सार जे।
द्रव्य शक्ति जाणिये, मकार मात्रा धर ध्यान जे।
तीनों की उपाधी तीन है, स्थूल सूक्ष्म अज्ञान जे।
तुरियां में तीनों नाहि, आत्म देव अपार जे।
परावाणी अथर्ववेद की, अचल देव निज धार जे।
रजोगुणी बेखरी जाणिये, मध्यमा सेती पहचान जे।
तमोगुण पश्यन्ति जाणिये, सतोगुण परा की जाण जे।
अनुभव आत्मा जाणिये, इनमें मीन न मेख जे।
जगदीश राम निज आत्मा, व्यापक घट में देख जे।
छपइयां
पांच पचीस दस लखे, तीन चार अरू दोय।
उणचासां रा मन मिलै, ज्ञान गोष्ठि तब होय।
जप तप तीर्थ योग है, धारण करिये कोय।
चार वेद छः शास्त्र को, सार समझले सोय।
खाणी बाणी अर्थ लखे, भेद खेद दे खोय।
जगदीशराम निज आत्मा, समझे विरला कोय।