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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह37 / 156

साखी कणां की (रंगीलो) 37

एक मिलंता दोय मिलै, दोय मिलंता तीन

कवि: रंगीलो

एक मिलंता दोय मिलै, दोय मिलंता तीन ।१।

एक मिलने से दो का मिलान हो जाता है एक यानि एक सतगुरु से प्रथम भेंट हो जाये तो फिर जीव और ईश्वर का मिलान योग हो जाता है। जब ईश्वर और जीव ये दोनों मिल जाते है तो तीसरी श्री लक्ष्मी-आनन्द की प्राप्ति हो जाती है ।१।

तीन मिलंता च्यार मिलै, पांचै गुरु पहलाद ।२।

जब जीव, ईश्वर और लक्ष्मी तीनों का संगम हो जाता है तो चौथा स्वर्ग सुख अथवा देव गुरु बृहस्पति मिल जाते है। बृहस्पति अर्थात् ज्ञान की प्राप्ति ही चौथा मिलन है। इन चारों के मिलन के पश्चात् पांचवां मिलन गुरु प्रहलाद से हो जाता है। प्रहलाद यानि भक्ति की प्राप्ति पांचवें पर हो जाती है। प्रहलाद भक्ति का प्रतीक है ।२।

पांच मिलंता छव मिलै, साते हरिचंद राव ।३।

पांच मिलने के बाद में छठे पर ध्रुव मिल जाता है अर्थात् ज्ञान भक्ति में दृढ़ता अटलता आ जाती है, ध्रुव अडिग सत्यता का प्रतीक है। जब ज्ञान भक्ति में स्थिरता आ जाती है तो सातवीं अवस्था में हरिश्चन्द्र से मिलन हो जाता है अर्थात् सत्य से साक्षात्कार होना ही हरिश्चन्द्र से मिलना है। हरिश्चन्द्र स्वयं सत्य के प्रतीक है ।३।

सात मिलंता आठ मिलै, नवै दहुठल राव ।४।

सात मिलने के पश्चात् आठवें श्री कृष्ण मिल जाते है, कृष्ण का अर्थ है कि जो सर्वगुण सम्पन्न लीला धारी हो जाता है, इस प्रकार से सर्वगुण सम्पन्नता ही उल्लास आनन्द देने वाली है। आठवें कृष्ण के पश्चात् नवें युधिष्ठिर से मिलान हो जाता है। युधिष्ठिर स्वयं धर्म के प्रतीक है अर्थात् धर्म से साक्षात्कार हो जाता है ।४।

नव मिलंता दस मिलै, दस अवतार मिलाप ।५।

जब नौ का मिलन हो जाता है तो फिर दस अवतारों का साक्षात्कार हो जाता है ।५।

दस मिलंता ग्यारह मिलै, बारह जम्भराज आप ।६।

पांच सात नव बारहां, हुवो ल्हालर साथ ।७।

दस अवतारों का अभिप्रायः है कि विभिन्न शक्ति तथा कलाओं से सम्पन्न हो जाता है। जब अनेक शक्तियों से मिलन हो जाता है तो आगे ग्यारहवीं शक्ति गोरख नाम से आती है। जो पूर्णतया अवधूत है, पापों को जिन्होनें कंपायमान कर दिया है, सदा ही निश्चल निर्द्वन्द्व रूप से विचरण करते है ऐसी अवधू अवस्था हो जाती है तथा बारहवें में आकर जाम्भोजी से मिलन हो जाता है जो ऊपर की सभी ग्यारह शक्तियों का सार रूप है। सत्य, ज्ञान, भक्ति, ध्रुव, लीलाधारी तथा अवधूत आदि सभी कुछ जाम्भोजी में समाहित हो जाते है। इस प्रकार से प्रहलाद, हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर आदि के साथ मिलन हो सकेगा ।७।

वीर बटाऊ भाइयो, म्हानै पीहर पंथ बताय ।८।

कोई जीवात्मा किसी पथिक से यानि साधक से पूछ रही है कि हे बटाऊ वीर ! तूं हमारे सच्चे घर जहां से हम आये है यानि हमारे पीहर का मार्ग बता दे वहां पर हमें वापिस जाना है ।८।

डावी डांडी पर हरो, जीवणी सुरगां पुरजाय ।९।

ऐसी प्रार्थना श्रवण करके वह कहता है कि हे देवी ! बायां मार्ग छोड़कर दांया मार्ग पकड़ लो वही सीधा तुम्हारे घर अर्थात् स्वर्ग पुरी को सीधा जायेगा। कुकर्म रूपी मार्ग छोड़कर सुकर्म रूपी दाहिना मार्ग ही ग्रहण करे ।९।

भुंयजल अथघ अथाहणो, किण विध उतरां पार ।१०।

यह संसार ही अथाह सागर की भांति गहरा एवं विशाल है इससे पार कैसे उतरा जा सकता है ।१०।

कर सुकरत की नांवड़ी, लंघिये भवजल पार ।११।

कवि कहता है कि सुकर्म रूपी नौका बनाकर, उस पर बैठकर संसार सागर से पार उतरा जा सकता है ।११।

क्रोड़ तेतीस सुहावणां, उत मोमण मीत सुजाण ।१२।

वहां आगे तेतीस करोड़ देवता तथा भक्त जन शोभायमान हो रहे है। वहां पर सभी मित्र सुजान साधु ही रहते है। ऐसा घर सुख दायक है ।१२।

पार गिराये वे गया, जित जुंवर न लहसी जांण ।१३।

वे लोग तो पार उतर गये फिर कभी संसार सागर में डूबने का खतरा उन्हें नहीं है वहां पर मृत्यु की पहुंच नहीं है। इसलिये अजर अमर अविनाशी है ।१३।

अमी कचोला पीवणां, सहजै सहज हिंडाय ।१४।

वहां पर अमृत के प्याले भर-भर के पिलाये जाते है और सहज ही में आनन्द की लहरों में झूला झुलाया जाता है, यह अवस्था सहज ही में प्राप्त है। ऐसा वह दिव्य पीहर है जहां पर सभी को जाना चाहिये। सभी दुखों का एक मात्र समाधान भी वही है ।१४।

ऊदो बोलै वीणती, आवागवण चुकाय ।१५।

ऊदोजी प्रार्थना करते हुए कहते है कि हे देव ! मेरा जरा-मरण मिटा दीजिये और इस पथ का पथिक बना दीजिये ताकि मैं भी अपने घर को पहुंच सकूं ।१५।