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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह36 / 156

साखी राग राम गिरी-36

जागो मोमणों नां सोवो, न करो नींद पियार। जैसा सुपना रैण का, ऐसा ओ संसार

कवि: ऊदोजी नैण

कवि परिचय — ऊदोजी नैण

जन्म विक्रम संवत 1505 तथा स्वर्गवास 1593। जाम्भाणी साहित्य में ऊदोजी नैण की कथा बड़ी रोचक एवं प्रेरणादायक है। पंथ में सम्मिलित होने से पूर्व गोठमांगलोद में महमाई मन्दिर के पुजारी थे। बिश्नोइयों की जमात के साथ जाम्भोजी की महिमा सुनकर सम्भराथल पर आये थे। जमात सहित जाम्भोजी का दर्शन ऊदोजी ने भी किया था। और ज्ञान वार्ता का भी श्रवण किया था ऐसा माहौल तथा विचार ऊदे ने प्रथम बार ही देखा था। ऊदो अपराधी की भांति पीछे छुपकर बैठा था। गुरुदेव ने ऊदे के अन्दर झांककर देखा था। उसमें कवित्व शक्ति की संभावना थी। उसे उजागर करने के लिये स्वयं गुरुदेव ने ऊदे को सम्बोधन करते हुए कहा-ऊदा तूं दूर क्यों बैठा है जरा सामने तो आओ। ऊदा अपनी करणी पर लज्जित होता हुआ सामने गुरु के चरणों में हाथ जोड़कर बैठा तब गुरुदेव ने कहा-भाई! कुछ भजन साखी तो सुनाओ। ऊदा ने हाथ जोड़ दिया और क्षमा मांगते हुए कहा- यदि आप कहो तो महामाता का भजन तो सुना दूं। गुरुदेव ने कहा-नहीं भाई! कुछ पिता के भी सुनाओ। पिता के भजन ऊदा कुछ भी नहीं जानता था। समिपस्थ बैठे हुए लोग ऊदे की अज्ञानता पर हंसने लगे, ऊदे को भी अपनी अज्ञानता पर हंसी आयी। गुरुदेव ने ऊदे के सिर पर हाथ रखा, वरद हस्त का स्पर्श होते ही अनुभव जागृत हो गया और तत्काल ही ऊदे ने प्रथम साखी का उच्चारण किया। ओ गुरु आयो। ऊदा गुरुदेव का शिष्य बन गया। महमाई की पूजा छोड़कर विष्णु की उपासना करने लग गया तथा गुरुदेव की सेवा में ही रहने लगा। ऊदे ने अपने जीवन काल में लगभग पन्द्रह साखियों की रचना की थी जो प्रायः जागरणों में गायी जाती है। तथा प्रसिद्ध चार आरतियों की रचना भी की थी जो नित्य प्रति गायी जाती है। इन रचनाओं के अतिरिक्त भी हरजस, सोहलौ, कूकड़ो, जखड़ी, छन्द, आख्यान कथाऐं आदि की रचना की थी। ऊदोजी तत्कालीन तथा अद्यपर्यन्त समाज के मान्य कवि है। इनकी रचनाऐं अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक है। साहित्य कला की दृष्टि से भी वे अपना महत्व रखती है। यहां पर उनकी साखियों एवं आरतियों की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। ऊदोजी की यह प्रथम साखी।

जागो मोमणों नां सोवो, न करो नींद पियार। जैसा सुपना रैण का, ऐसा ओ संसार ।१।

हे मोमण भक्तों ! जागो ! नींद से प्रेम मत करो। जन्म जन्मान्तरों से अज्ञान रूपी निन्द्रा में सोते ही आ रहे हो। इस समय जागृत होकर कुछ करने का समय आ चुका है जिस प्रकार से रात्रि में सोने पर निंद्रावस्था में स्वप्न आते है। जब तक निंद्रा रहती है तब तक स्वप्न भी सत्य रहता है परन्तु जागने पर स्वप्न तिरोहित हो जाता है ठीक उसी प्रकार से ही यह संसार है, जब तक अज्ञानता रहती है तभी तक संसार है और जब अज्ञानता मिट जाती है तो स्वप्नवत संसार भी भान नहीं होता है ।१।

कहीं सुभागी आम्बो रोपियो, भगवत के दरबार। पींघ पड़ेला आम्बो सोहणो, हींडे कैई सुचियार ।२।

कभी किसी सौभाग्यशाली साधक ने भगवान की भक्ति प्रारम्भ की है अर्थात् आम के वृक्ष को रोपा है, अभी लगाया ही है। आम रोपने का लक्ष्य भी फूलना-फलना है उसी प्रकार से साधना का लक्ष्य भी भगवान के दरबार में पहुंचना ही है। आम बड़ा होगा उस पर झूला लगाया जायेगा, उस पर कोई-कोई पवित्रात्मा झूलेंगे भी। उसी प्रकार से भक्ति में दृढ़ता आयेगी तो कोई कोई भक्तजन हृदय में उठने वाली आनन्द की लहरों में झूलेगा ।२।

एकणि डाली हूं चढ़ी, दूजे मोमण बीर। जिण तो डाले हूं चढ़ी, तिणी घणेरी भीड़ ।३।

एक डाली पर झूलने के लिये मैं अर्थात् बुद्धि चढ़ी हुई है। तथा दूसरी डाली पर मोह और मन चढ़े हुए है। जिस डाली पर सद्बुद्धि चढ़ी हुई है अर्थात् सतकार्य में प्रेरित करती है उस मन की तरफ तो अनेक विघ्न बाधाएं आकर खड़ी हो जाती है, इस व्यर्थ के विघ्न बाधाओं की तो भीड़ लगी रहती है बुद्धि को आगे बढ़ने तथा आनन्द के हिलोरे लेने का समय ही नहीं मिल पाता तथा जिस तरफ मोह और मन चढ़े हुए है उस तरफ कोई भीड़ नहीं है। मोह मन अपना कार्य बड़ी ही सरलता से कर लेते है। जल सदा ही नीचे स्वभाव से ही बहता है उसी प्रकार मन तथा मोह की भी गति है ।३।

हाथांरो मूंदड़ों गिर पड़यो, कांना री नव रंग बीण। काज पराया ना सरै, जांह दूखे तांह पीड़ ।४।

इस प्रकार से संघर्ष करते-करते वृद्धावस्था आ जाती है। हाथ कार्य करने से रह जाते है यानि मूंदड़ा गिर पड़ता है कान सुनने से रह जाते है अर्थात् नवरंग वीण सुनायी नहीं देती है। साधना में सफलता नहीं मिल पाती यह संघर्ष सभी के लिये चलता ही रहता है। पराया कार्य कोई नहीं कर सकेगा अपना कार्य तो स्वयं को ही करना पड़ेगा क्योंकि पीड़ा तो वही होगी जहां पर दर्द होगा दूसरों को क्या किसी के कार्य से लेना-देना है। सभी अपने ही स्वार्थ के लिये ही करते है। इसलिये अपना कार्य दूसरों पर न छोड़ें, स्वयं ही करें ।४।

एकण डांडे जुग गयो राजा रंक फकीर। एह जुग अपणों कोई नहीं, संग न चले शरीर ।५।

मृत्यु सभी की निश्चित है और मरने का तरीका भी सभी का एक ही है, चाहे वह राजा हो या रंक, इस जगत में अपना कोई नहीं है, साथ में तो यह शरीर भी नहीं जाता है जिसको अपना कहता था ।५।

जो उपज्या सोई विणसणो, करणी जांणो तीर। एक सुखासणि चड़ि चल्या, एक बंध्यो जाय जंजीर ।६।

जो पैदा हुआ है वह निश्चित ही मरेगा। इसमें कोई संदेह नहीं है परन्तु यहां से जाने के पश्चात् आगे मार्ग भिन्न-भिन्न है। जो शुभ कर्त्तव्य कर्म करके जायेगा वह तो निश्चित ही संसार सागर से पार उतर जायेगा जिसको पार होना है वह तो निश्चित ही संसार सागर से पार उतर जायेगा। जिसको पार होना है वह तो सिंहासन पर बैठकर जायेगा जिन्हें नरक में जाकर चौरासी लाख जीव योनियों में भटकना है वह जंजीरों में बंधा हुआ जायेगा ।६।

दुर्लभ देशां गरजीयो बूठो घटि-घटि मांहि। बाहर थाते उबरिया, भीगा मन्दिर ये रे मांहि ।७।

आगे तीसरा मार्ग भी बताते है जिस पर चलकर योगी लोग जीवन मुक्त होकर आनन्द का अनुभव करते है। दूर देश में प्रथम गर्जना होती है, जब साधक ध्यान में बैठता है तो सर्व प्रथम दूर देश अर्थात् दसवें द्वार में नाद ध्वनि की गर्जना सुनायी देती है। जब गर्जना होगी तो वर्षा भी होगी, बिजली भी चमकेगी ही उसी प्रकार से जब योगी नाद ध्वनि को श्रवण करता है तो अमृत की वर्षा प्रारम्भ हो जाती है। यह प्रत्येक मानव के हृदय में होती है परन्तु जिनकी वृति बाह्य है एकाग्र नहीं है वह तो उस अमृत से वंचित रह जाता है परन्तु जिस योगी की वृति अन्तर है वह अमृत से भीग जाता है। अमृत पान करके कृत्य-कृत्य हो जाता है। यह हृदय रूपी मन्दिर ही अमृत प्राप्ति का केन्द्र है उस अमृत की झलक हृदय में ही होती है ।७।

छान पुराणी छज नूंवो, चुय-चुय पड़े मजीठ। लाखों इण पर चेतिया, जाय बसिया बैकुण्ठ ।८।

यह शरीर रूपी छत तो नया है और आत्मा रूपी छान पुरानी है क्योंकि आत्मा तो अजर अमर अविनाशी है। शरीर के नष्ट हो जाने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती। किन्तु शरीर रूपी छत नया है जैसे ही पुराना होगा उसे बदल दिया जायेगा। ऐसे इस झोंपड़े रूपी शरीर से ही अमृत वर्षा की बूंदें टपक टपक कर गिर रही है जो सचेत है वे तो प्राप्त कर लेते है तथा अन्य निंद्रा में सोये हुए लोग खाली ही रह जाते है, कवि कहता है कि लाखों व्यक्ति इस बात पर सचेत हुए है, साधना की है और उन्होनें वैकुण्ठ में वास किया है। जन्म-मरण के चक्कर से सदा के लिये निवृत हो गये है ।८।

नांव दे रावो देवजी, जां सै उतरां पार। उदोजी बोले बीणती, म्हारी आवागवण निवार ।९।

श्रीदेवजी जाम्भेश्वर जी ने जो नाम बताया है, मार्ग बताया है, विष्णु के नाम का जप एवं साधना बतलाई है। उसी मार्ग को पकड़कर पार उतर सकते है। ऊदो जी परमात्मा से प्रार्थना करते हुए कहते है कि हे प्रभु ! हमें तो आप किसी भी प्रकार से जन्म-मरण के चक्र से बाहर निकाल दीजिये हमें ओर कुछ नहीं चाहिये ।९।