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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह38 / 156

साखी राग रामगिरि-38

पायल घड़दे रे सुघड़ सुनारा, भांजण घड़ण संवारण हारा

कवि: ऊदोजी नैण

कवि परिचय — ऊदोजी नैण

जन्म विक्रम संवत 1505 तथा स्वर्गवास 1593। जाम्भाणी साहित्य में ऊदोजी नैण की कथा बड़ी रोचक एवं प्रेरणादायक है। पंथ में सम्मिलित होने से पूर्व गोठमांगलोद में महमाई मन्दिर के पुजारी थे। बिश्नोइयों की जमात के साथ जाम्भोजी की महिमा सुनकर सम्भराथल पर आये थे। जमात सहित जाम्भोजी का दर्शन ऊदोजी ने भी किया था। और ज्ञान वार्ता का भी श्रवण किया था ऐसा माहौल तथा विचार ऊदे ने प्रथम बार ही देखा था। ऊदो अपराधी की भांति पीछे छुपकर बैठा था। गुरुदेव ने ऊदे के अन्दर झांककर देखा था। उसमें कवित्व शक्ति की संभावना थी। उसे उजागर करने के लिये स्वयं गुरुदेव ने ऊदे को सम्बोधन करते हुए कहा-ऊदा तूं दूर क्यों बैठा है जरा सामने तो आओ। ऊदा अपनी करणी पर लज्जित होता हुआ सामने गुरु के चरणों में हाथ जोड़कर बैठा तब गुरुदेव ने कहा-भाई! कुछ भजन साखी तो सुनाओ। ऊदा ने हाथ जोड़ दिया और क्षमा मांगते हुए कहा- यदि आप कहो तो महामाता का भजन तो सुना दूं। गुरुदेव ने कहा-नहीं भाई! कुछ पिता के भी सुनाओ। पिता के भजन ऊदा कुछ भी नहीं जानता था। समिपस्थ बैठे हुए लोग ऊदे की अज्ञानता पर हंसने लगे, ऊदे को भी अपनी अज्ञानता पर हंसी आयी। गुरुदेव ने ऊदे के सिर पर हाथ रखा, वरद हस्त का स्पर्श होते ही अनुभव जागृत हो गया और तत्काल ही ऊदे ने प्रथम साखी का उच्चारण किया। ओ गुरु आयो। ऊदा गुरुदेव का शिष्य बन गया। महमाई की पूजा छोड़कर विष्णु की उपासना करने लग गया तथा गुरुदेव की सेवा में ही रहने लगा। ऊदे ने अपने जीवन काल में लगभग पन्द्रह साखियों की रचना की थी जो प्रायः जागरणों में गायी जाती है। तथा प्रसिद्ध चार आरतियों की रचना भी की थी जो नित्य प्रति गायी जाती है। इन रचनाओं के अतिरिक्त भी हरजस, सोहलौ, कूकड़ो, जखड़ी, छन्द, आख्यान कथाऐं आदि की रचना की थी। ऊदोजी तत्कालीन तथा अद्यपर्यन्त समाज के मान्य कवि है। इनकी रचनाऐं अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक है। साहित्य कला की दृष्टि से भी वे अपना महत्व रखती है। यहां पर उनकी साखियों एवं आरतियों की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है। ऊदोजी की यह प्रथम साखी।

पायल घड़दे रे सुघड़ सुनारा, भांजण घड़ण संवारण हारा ।१।

इस जीवात्मा का शरीर ही एक अलंकार पायल जैसा ही है। किन्तु यह शरीर सुसंस्कृत नहीं है। वैसे भी संसार में पैदा होते ही कोई सुसंस्कृत नहीं होता उसे सभ्य तो संस्कारों द्वारा बनाया जाता है। इसी बात की ओर संकेत करते हुए कवि कहता है कि हे सुघड़ सुनार ! अर्थात् हे जगत के निर्माण कर्ता परमेश्वर गुरुदेव ! आप इस मेरी पायल यानि मन बुद्धि आदि को अच्छा बना दो क्योंकि आप तो स्वयं ही उत्पति स्थिति और संहार कर्ता भी है ।१।

भांजै घड़े संवारे सोई, अलख विनाणी लखै न कोई ।२।

आप स्वयं सृष्टि कर्ता शरीर रूपी पायल के भी कर्ता हो आपकी गति को कौन जान सकता है क्योंकि आप तो अलख, अजर, अमर, अविनाशी हो ।२।

पायल पहरै कोई शुचियारा, दोजखि जौ पापी हतियारा ।३।

क्योंकि आप की बनायी हुई पायल अर्थात् नियम धर्म रूपी संहिता को कोई विरला पवित्र आत्मा ही धारण करेगा, पहनेगा। इनसे विपरीत जो पापी हत्यारे है वे तो नरक में ही गिरने लायक है वे इस पायल से क्या करेंगे ।३।

पायल सोहे भगतां पाए, ज्यों ठमकै तो स्वर्ग सिधाए ।४।

आपके द्वारा बनायी हुई पायल नियम धर्म तो कोई आपका भक्त जन ही पहनेगा उन्हीं के पैरों में शोभायमान होगी। ज्योंहि पहनकर चलेंगे और जहां पर भी पैर रखेंगे वहीं पर ही मधुर ध्वनि सुनायी पड़ेगी अर्थात् आपके भक्त जहां पर भी जिस देश में भी जायेंगे वहीं पर ही स्वर्ग हो जायेगा, आनन्द की लहरें उठने लगेगी ।४।

आसण मार बैठो रहमांणी, जीमै अन्न न पीवै पाणी ।५।

हे देव ! आप तो सम्भराथल पर आसन लगाकर बैठे है सभी के ऊपर दया करने वाले दयालु हो। यहां पर निवास करते हुए भी न तो संसार के लोगों की भांति अन्न जल ही ग्रहण करते, सर्वथा निराहारी हो ।५।

जुगां-जुगां की कहै कहाणी, जम्भदेव जुगां परवाणी ।६।

आप तो इस मरूभूमि में आकर युगों-युगों की बातें बतला रहे है। स्वयं श्री जाम्भेश्वर जी ही प्रमाण है अन्य शास्त्र प्रमाणों की आवश्यकता ही नहीं है ।६।

वासग नेतो मेर मथाणी, समंद विरोल्यो ढोए पाणी ।७।

हे देव ! आप ही ने तो समुद्र मन्थन किया था तब नाग की तो रस्सी बनायी थी। मेरू पर्वत की मथानी बनायी थी और देव दानव के रूप में आप ही ने तो समुद्र मंथन किया था। उसके हृदय में छुपे हुए चौदह रत्न निकाले थे ।७।

मध कीचक मारयो घात्यो घाणी, मीठे ते कियो खारो पाणी ।८।

आप ही ने तो मधु कीचक आदि राक्षसों को मारा था। उस समय अनेक दैत्यों का विनाश किया था और राम रूप धारण करके समुद्र के गर्व को मिटाया था, उसे मीठे से खारा होना पड़ा था। गर्व को चूर-चूर करना ही मीठे से खारा करना है ।८।

रावण मारयो तोड़ ज बांणी, लीवी लंका सीता घर आणी ।९।

लंका में जाकर रावण को मारा तथा उसकी भी जवानी के मद को चूर-चूर किया। लंका अपने हस्तगत करके सीता को वापिस लाये ।९।

विधवा कीवी मंदोदर राणी, जागो मोमणो रैण बिहाणी ।१०।

उसी समय ही मन्दोदरी को विधवा करके ऐसा चरित्र दिखाया था। कवि कहता है कि हे मोमणों ! जागो, अब तो रात्रि व्यतीत हो गयी है वही प्रकाश कर्त्ता भगवान विष्णु स्वयं आ चुके है ।१०।

ऊदो बोलै इमृत बाणी, सिंवरो मनवा सारंग पाणी ।११।

ऊदोजी इस प्रकार की अमृत बाणी बोलते हुए कहते है कि सारंगपाणी भगवान विष्णु का ही सहारा प्राप्त करो। हे मनवा ! क्यों इधर-उधर भटक रहा है ।११।