साखी-35 राग सोरठ
ओदर वास लियो मेरा जीयो, तां दिन वार करारी
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सवैया
खट श्वासा खिण एक में पल में बावन आठ
एक घड़ी में जात है श्वासां तीन सौ साठ
छं सौ इक्कीस हजार है श्वांसा निस दिन जाय
छः लाख अड़तालीस हजार है श्वांसा मास के मांय
लाख सत्तर हजार इकतर इतरा वर्ष में फेर
हरि सुमिरण कियो नहीं वर्ष गवायो गेर
वर्ष एक सौ बीस की धरी सं या जोड
हरिदास हरि भक्ति बिना गया बानवै करोड़
ओदर वास लियो मेरा जीयो, तां दिन वार करारी
प्रगट हंस बसै मेरा जीयो, हरि सूं कवल विसारी
कबल विसारी न जाय रे जीव, अब ओ तन छीजसी
नेकी बदी दोय साथ चालै, अंत लेखो लीजसी
तिरै भगत अभेद डूबै, पाप पुण्य दोय पायसी
साच सुकरत तिरै दुस्तर, कपट जुलम करायसी (१)
जां दिन भीड़ पड़ै मेरा जीयो, तां दिन विष्णु सहाई
माया मोह तजो मेरा जीयो, भरम सभी जुग भाई
भरम सभी जुग जाण रे जीव, करम जुलम करायसी
पल पल घटै सो आयु खूटै, अन्त सो दिन आयसी
साध संगति हरि भगति बिना, संसार सागर है फना (फंदा)
विष्णु सहाई होय भाई, भीड़ पडसी जां दिनां (२)
बास उजड़ि चल्यो मेरा जीयो, आए बुग बहेला
ओ घट पारि लंघ्यो मेरा जीयो, हरि सूं जाब दुहेला
जाब दुहेला जीव अकेला, दूत दशों दिश देखिये
गांठि ग्रंथ न हाथ रे जीव, परवार साथि न पेखिये
सुक्रत पाखो मीत माया, चेत ओ तन वीसरे
उड़िया विहंगम बुग बैठा, चेत जीव इण अवसरे (३)
सागर खार मिटै मेरा जीयो, सुकरत करि रे संसारि
ओ तन खाक मिलै मेरा जीयो, पर उपकार चितारि
उपकार सार चितार रे जीव, कह्यो गुरू को कीजिये
जीवन धरिये अजर जरिये, नाम निश्चल लीजिये
स्वर्गे नो सुख अनूप अधिका, विष्णु दर्शन भेटिये
'सुरजन' जन की विनती, संसार सागर मेटिये (४)