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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित छन्दा की साखी

साखी-34

साखी छंदां की-राग सिंधू

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

मनवा भजे तो विष्णु भज, कर कर मन में सोच

बार बार नहीं पायवा, मिनख जनम की मोज

मनवा भजे तो विष्णु भज, कर मन धीर करार

कण किड़ी मण कुंजरां, दाता देवण हार

कण किड़ी मण कुंजरां, अनड़ पक्षी गज पंच

हंसां ने मोती मिलै, नहीं मालक घर खंच

साखी छंदां की-राग सिंधू

जुग जाग्यो जंभेश्वर राजा, कलयुग कायम आइयो

थल ऊपर एकलवाई, भाग परापति पाइयो

भाग परापति पायो भक्तां, पारब्रह्म परचावै

सुशब्द सुविचार सतगुरु, केवल ज्ञान सुणावै

सहज सुवाणी सुभाषा बोलै, अवगुण आलस त्याग्यो

नवखंड जाप जपो निरहारी, जंभ गुर जुग जाग्यो (१)

हरि सिंवरो मेरा भाईड़ो, नांव जपो निरहारी

पांच सात नव खड़्या उडीकै, अब बारां की बारी

बारां बारी हुई तियारी, सहज सगाही लीजै

अनहद व्रत हकीकत जाणो, हजरत लेखो लीजै

दोय काल करो संधया, हरि रसनां रस पीजै

दशबंध जीव जगत चुकावो, हिरदै हरि सिंवरीजै (२)

बारां क्रोड़ मिलो इकबीसां, धन्य दिहाड़ो सोई

रतन काया नवरंगी, कलंक न लागै कोई

कलंक न लागै कोई जीवनै, प्रीतम मिलो पियारा

आरती ले अप्सरा आवै, गावै मंगलाचारा

कामण कंत मिलै बिछड़िया, त्रिकम तिसना तोड़ी

इकबीसां मन हुवो उमाहो, मिलै ज बारां क्रोड़ी (३)

पारगिराय पहुंचावै बाबो, मोमण मन उमाहिया

सुगुरा साधा संभाल सतगुरु, नरसिंह नाव चढाइया

चड़िया नाव जके नर निरमल, भोदू भरम भुलाया

ओछा तके रहे उरवारे, पूरा पार वसाया

कारज सकल सरै, मनसा सूं, हर दिन रली बधाई

कषमल कटै कह जन 'केशो', पहुंचै पारगिराई (४)