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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित छन्दा की साखी

साखी-33

सिंवरो सिरजणहार, कलि अलखराजा आवियो

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

कूकर मंदिर काच के छांह देख घुरराय।

ना गुरू मिल्यां ना गती हुई भूंकी-भूंकी मर जाय।।

साबण साखी साध जल सतगुरू सरवर तीर।

मन धोबी तन पाटड़ो पांवन कियो शरीर।

सकर्पण सिध खेलवा सिरे चढ़े सोह कोय।।

सुरजंन धर जरणां सहे तास पंटेतर जोय। ५।

सिंवरो सिरजणहार, कलि अलखराजा आवियो

परमेश्वर प्रगट संसार, भाग परापति पावियो

पावियो जहां भाग पुरो, पाप परले जाहीं करै

साधा पूगी श्याम आये, खबर ले खोटे खरै

दान शील तप भाव पालो, देव प्रीतम पारनै

संभराथलि आयो श्याम, सिंवरो सिरजणहार नै (१)

चेतो चेतो चतुर सुजान, सतगुरु आया सांभिल्यो

भूधरजी भक्तां रे काज, मया करि मोहन मिल्यो

मिल्यो मोहन मया कीन्हीं, प्रीत प्रहलाद तणी

जागियो जगदीश जुग मां, चार चक चरचा सुणी

सिंघ बकरी साथ चाल्यां, राव रंक परचाविया

कर्महीना रह्या कोरा, सतगुरु साध चेताविया (२)

परचै परची पवण छतीस, पारब्रह्म पोह आणियां

बाड़े हूतां बिछड़या जीव, पूरे धणी पिछाणियां

पिछाण पोह मां आणियां, सुगुरु सुपह दाखियो

तीनसौ त्रेसठ मथ मार्ग, पंथ उत्तम चालावियो

एकलवाई अलख आया, जिण नवखंड निरताविया

पवण छतीसों पाये लागै, पूरै गुरु परचाविया (३)

पाप गयो परगटियो आप, धरम धरा मां जागियो

बोले संत सुजान, झगड़ो झूठ त्यागियो

त्यागियों तहां झगड़ो झूठ, सांच शील संभालियो

आन को आराध छाडो, प्रीति हरि सूं पालियो

चार चक नवखंड निरखो, दीप दणीयर ज्यूं रह्यो,

कह 'केशो' श्याम आयो, पाप प्रकटियां गयो (४)